बुधवार, 15 दिसंबर 2010
झूठ न बोलाए लूट
सीबीआई के 80 अधिकारियों के एक दल ने बुधवार तड़के ही राजा और अन्य अधिकारियों के आवासों पर छापे की कार्रवाई शुरू कर दी। द्रमुक सांसद राजा को 14 नवंबर को दूरसंचार मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। क्योंकि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में सरकारी खजाने को 1.76 लाख करोड़ के नुकसान को पहुंचाने के लिए कैग की रिपोर्ट में राजा को आरोपित किया गया था। राजा पर यह भी आरोप है कि उन्होंने ऐसी कंपनियों के पक्ष में नियमों में हेरफेर किया, जो स्पेक्ट्रम लाइसेंस पाने के लिए योग्यता नहीं रखती थी। बहरहाल, 2जी घोटाले की जांच में पूर्व संचार मंत्री ए राजा के खिलाफ क्या होगा यह तो वक्त बतायेगा, लेकिन हकीकत यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाला सरकारी तंत्र बड़ा लाचार है। देश की सबसे हाई प्रोफाइल जांच एजेंसी सीबीआई के पास भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ अभियानों में सफलताओं का जबर्दस्त टोटा है। पूर्व संचार मंत्री सुखराम को छोड़ यह जांच एजेंसी किसी राजनेता को सजा के कठघरे तक नहीं पहुंचा सकी है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों की खरीद, चारा घोटाला, हवाला कांड, ताज कॉरिडोर घोटाला, लालू प्रसाद और जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति से लेकर छत्तीसगढ़ में विधायकों की खरीद-फरोख्त तक सीबीआई ने बड़े राजनेताओं के खिलाफ अनेक मामले दर्ज किए, लेकिन नतीजा सिफर निकला। ए. राजा ने जो पैसे की लूट की, वो पैसा कहीं और भी गया होगा। वो ऐसी जगह गया होगा जहां से सत्ता संचालित होती है। जब स्पैक्ट्रम अलाट हुआ तभी से कांग्रेस और खासकर इसका नेतृत्व इस खेल में आकंठ शामिल है। तभी कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार ने कथित रूप से 6000 लोगों के कॉल रिकार्ड किए जिसमें से कुछ अभी लीक किए गए हैं। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि कांग्रेस आलाकमान जानता था कि इतना बड़ा राज एक न एक दिन जरूर प्रकाश में आएगा। उस वक्त कांग्रेसी आस्था के मंदिर को बचाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाएगा। भले ही इसमें अपनों की ही बलि क्यों न लेनी पड़े। वाकई सत्ता कितनी क्रूर होती है, यह मामला इसका उदाहरण भर है! गोलपोस्ट शिफ्ट करने की इस कांग्रेसी साजिश में भले ही डीएमके जैसे भरोसेमंद साथी और कुछेक 'स्वामीभक्त लेकिन अदना सेÓ पत्रकारों की बलि ही क्यों न देनी पड़े, इससे कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ता। कांग्रेस के तमाम सिपहसलार और योजनाकार इस खेल में जुटे हुए हैं कि इस आग की लपटों को आलाकमान के महल तक न आने दिया जाए। अगर वो लपटें आलाकमान तक पहुंची तो स्पेक्ट्रम घोटाला, कांग्रेस के लिए बोफोर्स से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। पार्टी जानती है अगर एक बार जनता में यह बात फैल गई तो इसमें आस्था का यह मंदिर दूषित हो जाएगा। मुमकिन है कि इसी वजह से सरकार जेपीसी की मांग स्वीकार नहीं कर रही। कांग्रेस जेपीसी की मांग पर संसद में जारी गतिरोध को लोकतंत्र की बुनियादी परंपरा से जोड़ कर विपक्ष को कठघरे में खड़ा करने में जुटी है। लेकिन आज कांग्रेस सत्ता में है। इसलिए लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा करने की जिम्मेदारी कांग्रेस पर ज्यादा है। आज कांग्रेस जीपीसी की जांच से इनकार करके लोकतांत्रिक परंपराओं को तोडऩे का काम कर रही है। दुनिया के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी लूट पर लीपापोती की इस सरकारी साजिश से जाहिर होता है कि उसे डर है कि कहीं इसमें कांग्रेस आलाकमान का नाम न सामने आ जाए। नीरा राडिया और दूसरे औद्योगिक घराने तो बहाने हैं, खेल तो कुछ और ही है। सुब्रमण्यम स्वामी को भले ही लोग खुराफाती मानें लेकिन मौजूदा हालात में वो अपनी जगह जायज लगते हैं। जब सुब्रमण्यम स्वामी कहते हैं कि ए राजा की सुरक्षा बढ़ाई जानी चाहिए, तो वो एक आशंका की तरफ इशारा कर रहे होते हैं। आखिर सत्ता जब दांव पर लगी हो तो यह स्थिति पैदा करने में क्या फर्क पड़ता है जब कहा जाने लगे कि ए राजा कभी इस महान भारत के टेलिकॉम मंत्री हुआ करते थे!
चमचों का अभिवादन
क्या समाज मैं बस दो क्लास होते हैं एक लीडर और एक चमचा? लीडर तो आज कल नजर नहीं आते, हाँ चमचे जरूर नजर आते हैं। कुछ लोग जो अपने आप को लीडर कहते हैं किसी न किसी रूप मैं वह भी चमचे ही हैं। भारत की हर राजनातिक पार्टी मैं तरक्की का एक ही मापदंड है चमचागिरी। हाँ तरक्की के साथ साथ कुछ धन भी भेंट करना होता है पर केवल धन तरक्की नहीं दिला सकता। सरकारी दफ्तरों मैं तो बिना चमचागिरी के आप साँस भी नहीं ले सकते। गैर-सरकारी दफ्तरों और कारखानों मैं भी चमचागिरी का बोलबाला हो रहा है। जनता के पैसे से छपे सरकारी विज्ञापनों मैं गैर-सरकारी लोगों के फोटो देखकर चमचागिरी की ताकत का पता लगता है। आज भारतीय समाज मैं ऊपर-से-नीचे, दांये-से-बाएं सब तरफ चमचागिरी का ही बोलबाला है। भारत का बिना लिखा राष्ट्रीय नारा है - चमचागिरी तेरा ही आसरा। जीवन में किसी न किसी की चमचागिरी किए बगैर काम नहीं चलता। वैसे तो व्यक्ति को एक ही समय में कई लोगों की, कई कारणों से एक साथ चमचागिरी करनी होती है मगर कोई बहुत सिद्धांतवादी किस्म का हो तो भी उसे एकाध की तो चमचागिरी करनी ही पड़ती है। हर अच्छा कर्मचारी जैसा भी उसका बॉस हो, उसकी चमचागिरी अवश्य करता है। वैसे मैंने ऐसे बॉस भी देखे हैं जो अपने मातहत की चमचागिरी करते हैं और अच्छा मातहत, बॉस को इसके अवसर भी खूब प्रदान करता है। जितनी भी हिस्ट्री मैंने पढ़ी है वह यही कहती है कि चमचागिरी का इतिहास अत्यंत पुराना है। ज्यादा दूर न जाएँ तो अपने राजा की तारीफ में तमाम दरबारी महाकवि, महाकाव्य लिखते रहे हैं और आज भी लालू प्रसाद यादव जैसे लोकतांत्रिक राजा की चमचागिरी करके राज्यसभा की सदस्यता पा लेने वाले मौजूद हैं इसलिए चमचागिरी के इतिहास सम्मत कर्म को करने से किसी व्यक्ति को घबराना नहीं चाहिए। जहाँ भी लाभ का मौका मिले, चमचागिरी करनी चाहिए क्योंकि जो अच्छी चमचागिरी कर सकता है, वही भविष्य में अच्छे चमचे प्राप्त करने का सच्चा अधिकारी भी होता है हालाँकि दुर्भाग्य से ऐसे उदाहरण भी कम नहीं हैं कि कुछ लोग चमचागिरी करके सिर्फ अपनी नौकरी ही बचा पाते हैं। वैसे श्रेष्ठ चमचागिरी वही कहलाती है जिसमें चमचा, जिसकी चमचागिरी कर रहा है, उसे भी यह चकमा दे सके कि वह सच्ची प्रशंसा कर रहा है। ऐसे चमचे बड़े जेनुइन ढंग से, चमचागिरी करते हैं और इतिहास गवाह है कि इस किस्म के चमचे ही ज्यादा सफल होते हैं वरना कुछ बेचारे बेहद भक्तिभाव से चमचागिरी करते हैं मगर चूँकि चमचागिरी करना उनका स्वाभाविक कर्म मान लिया जाता है इसलिए वे जीवन में कुछ हासिल नहीं कर पाते लेकिन ऐसे चमचे भी अपना स्वभाव छोड़ नहीं पाते और इस दुनिया में मनुष्यता कुछ अगर बची हुई है तो इसमें ऐसे चमचों का अधिक नहीं तो थोड़ा योगदान अवश्य है। मैं इस अवसर पर ऐसे चमचों का अभिवादन करता हूँ।
अरुंधति के बहाने कश्मीर पर कुछ और सवाल
अरुंधति राय के इस वक्तव्य कि कश्मीर भारत का अविभाज्य हिस्सा नहीं है, पर काफी बवाल मचा। भाजपा ने मांग की कि अरुंधति के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा कायम किया जाना चाहिए। भाजपा महिला मोर्चा के सदस्यों ने उनके दिल्ली स्थित निवास में तोडफ़ोड़ की और बजरंग दल ने उन्हें कई तरह की धमकियां दीं। इस वक्तव्य ने कई वर्गों को नाराज किया और अरुंधति को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए जाने की चर्चा कई दिनों तक चलती रही। अलग-अलग कारणों से, कश्मीर हमारे देश की जनता के एक बड़े हिस्से की दुखती रग बन गया है। कश्मीर समस्या का हल क्या हो, इस बारे में हमारे अरुंधति राय से मतभेद हो सकते हैं और प्रजातंत्र में ऐसे मतभेद पूरी तरह जायज भी हैं, परंतु इस मामले में दो तथ्यों को हम सभी को स्वीकार करना होगा। पहला यह कि कश्मीर का भारत में विलय कभी नहीं हुआ। कश्मीर केवल भारत का हिस्सा बना और वह भी इस शर्त पर कि रक्षा, मुद्रा, विदेशी मामलों और संचार को छोड़कर अन्य सभी मामलों में उसे पूर्ण स्वायत्ताता प्राप्त रहेगी। दूसरा यह कि कश्मीर मामले पर अरुंधति के बयानों, लेखों एवं भाषणों से कश्मीरियों की व्यथा से परिचित होने में हमें मदद मिली है। अरुंधति पर किए जा रहे हमले संबंधित लोगों की कश्मीर के भारत का हिस्सा बनने के इतिहास के बारे में अज्ञानता को प्रतिबिंबित करते हैं। धर्म आधारित राष्ट्रवाद के पैरोकार, कुछ बुद्धिजीवी एवं आमजन एक प्रकार की देशभक्ति की भावना के वशीभूत होकर यह मानते हैं कि भारत के लिए अपनी भौगोलिक सीमाओं का विस्तार करना सबसे महत्वपूर्ण है, भले ही इसके लिए कश्मीरियों की समस्याओं को दरकिनार क्यों न करना पड़े। कश्मीर भारत में कैसे मिला? हम सभी को मालूम है कि स्वतंत्रता के समय देश में सैकड़ों राजे-रजवाड़े थे। इनमें से जूनागढ़, कश्मीर एवं हैदराबाद को छोड़कर शेष सभी भारत में विलय के लिए सहर्ष राजी हो गए। देश के विभाजन के समय राजे-रजवाड़ों को यह स्वतंत्रता दी गई थी कि वे या तो भारत या फिर पाकिस्तान में शामिल हो सकते हैं, परंतु इस मामले में निर्णय लेने से पहले वे अपनी जनता की भावनाओं और अपनी भौगोलिक स्थिति का ख्याल रखें। जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद के शासकों द्वारा अपने राज्यों का भारत में विलय न करने के पीछे उनकी अलग-अलग सोच थी। जूनागढ़ के नवाब पाकिस्तान में शामिल होना चाहते थे। हैदराबाद के निजाम या तो स्वतंत्र बने रहना चाहते थे अथवा पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहते थे। इसका कारण यह था कि पाकिस्तान ने देशी रियासतों के शासकों को अधिक शक्तियां देने का वादा किया था। भौगोलिक दृष्टि से जूनागढ़ और हैदराबाद का पाकिस्तान में विलय मुश्किल था, क्योंकि वे पाकिस्तान की सीमा से बहुत दूर स्थित थे। दूसरी बात यह कि इन दोनों राज्यों की बहुसंख्यक जनता हिंदू थी। सैन्य बल का इस्तेमाल करके इन दोनों राज्यों को भारत में अपना विलय करने के लिए मजबूर कर दिया गया। इस तरह यह अध्याय बंद हुआ। अब बचा कश्मीर। कश्मीर की स्थिति इन दोनों राज्यों से अलग थी। उसकी सीमाएं भारत और पाकिस्तान दोनों से मिलती थीं। कश्मीर की 80 प्रतिशत आबादी मुस्लिम थी और वहां के निवासियों के लंबे समय से उन इलाकों में संपर्क-संबंध थे, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गए थे। कुल मिलाकर कश्मीर द्विराष्ट्र सिद्धांत के पैरोकारों का स्वर्ग था। कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने भारत या पाकिस्तान दोनों में विलय करने से इंकार कर दिया। पाकिस्तानी सैनिकों ने कबाइलियों का वेश धरकर कश्मीर में वही करने की कोशिश की, जो भारतीय सेना ने हैदराबाद और जूनागढ़ में किया था, परंतु कश्मीर के मामले में अंतर यह था कि वहां नेशनल कांफ्रेंस का व्यापक प्रभाव था और उसके नेता शेख अब्दुल्ला पाकिस्तानी शासक वर्ग की सामंती सोच से अच्छी तरह वाकिफ थे। कश्मीर पर हमला होते ही महाराजा हरी सिंह अपनी जान बचाने के लिए जम्मू भाग गए और उन्होंने अपने एक दूत को दिल्ली भेजकर भारत सरकार से मदद मांगी। भारत सरकार चाहती थी कि अपनी सेना भेजने से पहले वह कश्मीर के साथ किसी तरह का समझौता कर ले। इन परिस्थितियों में कश्मीर के साथ इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें रक्षा, संचार, मुद्रा एवं विदेशी मामलों को छोड़कर अन्य सभी मामलों में कश्मीर को पूर्ण स्वायत्ताता दी गई। इसके बाद भारतीय सेना कश्मीर पहुंची, परंतु तब तक पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर के एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद युद्ध विराम हो गया। कश्मीर में चुनाव हुए, जिसमें शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री नहीं) चुने गए। पंडितों सहित सभी कश्मीरियों की व्यथा समझने के लिए हमें यह भी जानना जरूरी है कि अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिए कश्मीर इलाके पर अपना प्रभाव जमाने का षड्यंत्र किया। इसका कश्मीर के भविष्य के घटनाक्रम पर गहरा असर पड़ा। कश्मीर अमेरिका की कम्युनिस्ट विरोधी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र था। कश्मीर सोवियत संघ और चीन के बीच स्थित था। अमेरिका कश्मीर विवाद को हवा देता रहा, ताकि पाकिस्तान के जरिए उसे वहां अपनी पैठ बनाने का मौका मिल सके। इधर भारत में सांप्रदायिक तत्व सक्रिय हो गए और कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय की मांग करने लगे। भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस मांग को जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया। महात्मा गांधी की हत्या से भारतीय गणतंत्र के धर्म निरपेक्ष मूल्यों के प्रति शेख अब्दुल्ला की आस्था को गहरा आघात पहुंचा। शेख अब्दुल्ला को भारत की धर्म निरपेक्षता, गांधी एवं नेहरू पर गहरा भरोसा था। गांधी जी की हत्या के बाद कश्मीर का भारत में जबरदस्ती विलय कराने के लिए सांप्रदायिक ताकतों का दबाव बहुत बढ़ गया। इससे भी शेख अब्दुल्ला बहुत व्यथित हो गए। उन्हें ऐसा लगने लगा कि कहीं कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाने का निर्णय गलत तो नहीं था। उस समय नेहरू लगातार इस बात पर जोर दे रहे थे कि कश्मीरियों का दिल जीतना सबसे महत्वपूर्ण है। इसके विपरीत छद्म राष्ट्रवादी अनवरत कश्मीर का भारत में बलपूर्वक विलय कराने का राग अलाप रहे थे। सांप्रदायिक तत्वों के बढ़ते शोर से पहले से ही परेशान पंडित नेहरू पर तब दबाव और बढ़ गया, जब शेख अब्दुल्ला ने अमेरिकी राजदूत और चीन से वार्ताएं शुरू कर दीं। नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर जेल में डलवा दिया और यहीं से कश्मीरियों के अलगाव की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद अमेरिका के सहयोग एवं समर्थन से पाकिस्तान ने कश्मीरियों के असंतुष्ट वर्ग को हर तरह की मदद मुहैय्या करानी शुरू कर दी। 1980 के दशक में अलकायदा के उभरने के साथ ही समस्या और विकट हो गई। अमेरिका द्वारा स्थापित मदरसों में प्रशिक्षित अलकायदा के लड़ाकों ने काफिर और जिहाद जैसे शब्दों के अर्थ को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। इससे कश्मीर समस्या का सांप्रदायिकीकरण हो गया। कश्मीर में इस्लाम के नाम पर राजनीति की जाने लगी। बची-खुची कसर भारतीय सेना ने पूरी कर दी। अतिवादियों को कुचलने घाटी में पहुंची सेना ने कश्मीरियों के रोजमर्रा के जीवन में बेजा हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। निर्दोष मारे जाने लगे। देश की रक्षा के नाम पर सेना क्रूरता करने लगी। सेनाओं की यह सोच होती है कि बंदूक ही सत्ताा का एकमात्र स्रोत है। जब कोई सेना नागरिक इलाके में लंबे समय तक रहती है, तब यह सोच मुसीबत का सबब बन जाती है। सेना की मौजूदगी मात्र से आमजनों में अलगाव का भाव पनपता है। सेना की मनमानी का शिकार अक्सर निर्दोष होते हैं। महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा दु:ख भोगते हैं। कश्मीर में सेना द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन और उसकी लगातार मौजूदगी के कारण सामान्य जीवन के पटरी से उतर जाने से आमजन इतने कुंठित हो गए हैं कि वे अपना गुस्सा व्यक्त करने के लिए पत्थर फेंक रहे हैं। कश्मीर की समस्या जटिल है, जिसका कोई आसान हल दिखाई नहीं देता। इसका एक कारण यह है कि इस मामले से कई पक्षों के हित जुड़े हुए हैं। इनमें शामिल हैं अमेरिका समर्थित पाकिस्तानी सेना, कश्मीर की आम जनता, वहां के अतिवादी, भारतीय सेना, भारत सरकार एवं कश्मीर के राजनीतिक दल और नेता। कश्मीरियों ने अतिवादियों और सेना, दोनों के घोर अत्याचार सहे हैं। उनके दु:ख और व्यथा को समझना जरूरी है। संवाद तो आवश्यक है ही, सेना की उपस्थिति भी कम की जानी चाहिए। प्रजातंत्र की जड़ें गहरी की जाएं और कश्मीर के लोगों की मन:स्थिति को सहानुभूति पूर्वक समझा जाना चाहिए। उनका अपमान या विरोध करने से काम नहीं चलेगा, इससे कश्मीरियों के कष्ट ही बढ़ेंगे।
अपमान के और कितने घूंट
हैनरी टुमैन से लेकर आइजनहॉवर तक और जॉन एफ.कैनेडी, रिचर्ड निक्सन से लेकर बुश सीनियर तक अमेरिका के विभिन्न राष्ट्रपतियों के कार्यकाल के दौरान शीत युद्ध और विश्व राजनीति के ध्रुवीकरण जैसे कुछ कारणों के चलते भारत और अमेरिका के संबंध सदैव प्रतिकूल एवं असौहार्दपूर्ण ही रहे। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, युगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो और मिस्र के गैमल अब्दुल नासिर ने मिलकर निर्गुट आंदोलन आरंभ किया और फिर बैंडंग, इंडोनेशिया में इस आंदोलन को मजबूती प्रदान की। पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका ने सदैव इस आंदोलन को संदेह की दृष्टि से देखा। अमेरिका आज भी यही करता है कि जो देश अंतरराष्ट्रीय मामलों में उसके साथ नहीं चलते, वे उसके विरोधी हैं। आतंकवाद के विरूद्ध जंग का आह्ववान करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू. बुश ने यही तो कहा था, 'या तो आप हमारे साथ हैं या विरोध में हैं।Ó अमेरिका प्रारंभ से ही यह जानता था कि अमेरिकी इशारों पर न नाचने वाले भारत को सबक सिखाने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है पाकिस्तान को भारत के विरूद्ध सैन्य मजबूती प्रदान करना। कश्मीर मुद्दे के साथ-साथ भारत के विरोध में पाकिस्तान को प्रसन्न करने के लिए अमेरिका प्रशासन द्वारा किए गए प्रयासों के कारण नई दिल्ली और वाशिंग्टन के बीच की दरार वर्षो तक बढ़ती रही। अमेरिका एक तरफ तो भारत की पीठ थपथपाता है, दूसरी तरफ खंजर भोंकने के लिए पीठ की ओर इशारे से बताता है। इज्जत तो कभी इस राष्ट्र ने की ही नहीं। भारत एकतरफा प्रेम में पागल रहा। इसी प्रेम के कारण कितनी ही बार जलालत की हद से गुजरने की नौबत आई। बातें बढ़ता देख अमेरिका अनमने मन से माफी का अस्पष्ट उच्चारण कर डालता है। सवाल है कि यह कब तक? अमेरिका में भारत की राजदूत मीरा शंकर को मिसिसिपी में असहज स्थिति से गुजरना पड़ा, जब उन्हें सुरक्षा कतार से हटा लिया गया और राजनयिक के तौर पर परिचय दिए जाने के बावजूद एक विशेष अमेरिकी सुरक्षा एजेंट ने हाथों से उनकी तलाशी ली। यह वाकया चार दिसंबर को मिसिसिपी के एवर्स अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुआ। मीरा शंकर ने साड़ी पहनी थी और वह मिसिसिपी स्टेट यूनीवर्सिटी के एक कार्यक्रम में भाग लेने के बाद बालटीमोर की उड़ान में सवार होने के लिए कतार में लगी थीं, तभी उन्हें कतार से निकालकर अलग ले जाया गया। अधिकारी ने बताया कि मीरा ने अपने राजनयिक होने का परिचय दिया। वह मिसिसिपी विकास प्राधिकरण प्रतिनिधि और हवाईअड्डे के एक सुरक्षा अधिकारी के सुरक्षा घेरे में थीं, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि उनकी तलाशी ली गई। राजनयिक के रूप में परिचय देने के बावजूद उन्हें वीआईपी वेटिंग रूम में ले जाया गया। बाद में उन्हें सुरक्षा पंक्ति से निकाला गया और एक महिला परिवहन सुरक्षा प्रशासन एजेंट ने उनकी तलाशी ली। मीरा हमेशा साड़ी ही पहनती हैं और यह पहला मौका है, जब उन्हें इस वजह से ऐसी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। अमेरिका में भारत की शीर्ष राजनयिक के तौर पर वाशिंगटन आने के बाद से मीरा पूरे अमेरिका में खूब यात्रा करती रही हैं और देशभर में विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने के लिए उन्हें आमंत्रित किया जाता है। यह पहला मौका है जब टीएसए नियम लागू होने के बाद वह वाशिंगटन से बाहर यात्रा कर रही थीं। नये टीएसए नियमों को एक नवंबर को लागू किया गया था, जिसके अंतर्गत हवाईअड्डों पर तैनात संघीय सुरक्षा अधिकारियों को जरूरत पडऩे पर हाथों से तलाशी लेने का अधिकार दिया गया है। हालांकि इसे अक्सर विवादित माना जाता है। पहले भी इस तरह हाथों से तलाशी लेने और फुल बॉडी स्कैनिंग की काफी आलोचना होती रही है, जिसपर टीएसए का तर्क है कि बढ़ते सुरक्षा खतरे को देखते हुए ऐसा किया जाता है। जैक्सन हवाईअड्डे पर अभी फुल बॉडी स्क्रीनर्स नहीं है इसलिए मीरा की गहन तलाशी की जरूरत पडऩे पर उनकी तलाशी हाथों से ली गई। यह पहला मौका नहीं है, जब भारत के विशिष्ट व्यक्तियों को अमेरिका के हवाई अड्डों पर इस तरह के असहज हालात से दो चार होना पड़ा हो। सितंबर में भारत के नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल के साथ अमेरिका के आव्रजन अधिकारियों ने शिकागो के ओ हेयर हवाईअड्डे पर पूछताछ की थी क्योंकि उनकी जन्मतिथि प्रफुल्ल पटेल नाम के एक अन्य शख्स के साथ मेल खा रही थी, जो अमेरिका में वांछितों की सूची में था। अगस्त 2009 में बॉलीवुड अभिनेता शाहरूख खान को न्यूयॉर्क लिबर्टी इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर रोककर उनसे पूछताछ की गई थी। शाहरूख भारत के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आयोजित एक परेड में भाग लेने के लिए शिकागो जा रहे थे। पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस का दावा है कि अमेरिका के राजधानी क्षेत्र में स्थित डलास हवाईअड्डे पर उनकी दो बार जामा तलाशी ली गई। उनके अनुसार 2002 के शुरू में वाशिंगटन की उनकी सरकारी यात्रा और वर्ष 2003 के मध्य में ब्राजील जाते हुए उनकी तलाशी ली गई। जवाब भारत को देना है। अगर समय रहते दो टूक से परिचय नहीं कराया गया तो विश्व विरादरी में जो किरकिरी होगी, वह तो होगी ही बदनामी का नया अध्याय जुडऩे में देर नहीं लगेगा।
गंधारी की आंखों पर पट्टी
देश नित ने घोटालों से दो-चार हो रहा है। एक-दो नहीं अनगिनत। छोटे भी नहीं विशालकाय। लेकिन सरकार मूकदर्शक बनी है। उसने गंधारी की की तरह आंखों पर पट्टी बांध ली है। इसे धृतराष्ट्रवाद का नाम दें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं। भारत की जनता महाभारतकालीन हस्तिनापुर की प्रजा की तरह हैरान है। प्रचलित लोक-मानदंडों के अनुसार, मौन होकर भ्रष्टाचार का खेल देखने वाला व्यक्ति भ्रष्टाचारी के समान ही दोषी कहा जाता है। इसलिए लोक का धन लुटता हुआ देखने वाले सोनिया और मनमोहन लोक-अपराधी हैं। इसके लिए जनता उनको कभी माफ नहीं करेगी।सारा देश जानता है कि कांग्रेस नेतृत्ववाली संप्रग सरकार में पत्ता भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के इशारे पर हिलता है, फिर भी वे चुप हैं। वे सरकार में कुछ नहीं होते हुए भी उसकी सब कुछ हैं। सत्ता की सारी शक्ति उनमें निहित है। सारे संघीय मंत्री, यहां तक कि प्रधानमंत्री भी, उनकी बातों का अक्षरश: पालन करते हैं। इसी कारण विपक्षी दलों के नेता उनको 'सुपर पीएमÓ कहते हैं और डॉ. मनमोहन सिंह को 'रबर स्टैंप पीएमÓ। यानी केंद्रीय मंत्रिपरिषद के नाम मात्र के प्रमुख डॉ. सिंह हैं, जबकि वास्तविक प्रमुख सोनिया। इसी कारण मंत्रिपरिषद के सदस्य मनमोहन की अपेक्षा सोनिया की बातों पर ज्यादा गौर फरमाते हैं। जब ए. राजा ने सरकार को ब्लैकमेल करना शुरू किया तो ऐसा नहीं है कि सोनिया इससे बे-खबर थीं। राजा ने मनमानी करने के लिए मनमोहन पर लगातार दबाव बनाया। मनमोहन ने राजपाट जाने के डर से उनकी बातें मान ली। फलत: वर्ष 2006-07 में 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन का मामला मंत्रिमंडल समूह के विषय से परे कर दिया गया। अब ए. राजा वास्तव में राजा बन गए थे। उन पर कोई बंदिश नहीं रह गई थी। वह 2जी स्पेक्ट्रम की बंदरबाँट करने के लिए स्वतंत्र हो गए थे। चूँकि, वह यूपीए सरकार की सहयोगी पार्टी के नेता थे, इसलिए उनकी स्वतंत्रता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी। वह सरकार से भी मजबूत दिखने लगे थे। उनके क्रियाकलापों पर न तो ईमानदार कहे जाने वाले मनमोहन को चिंता थी और न ही सोनिया को। बेईमानी पर पर्दा डालना बेईमानी नहीं?:दिल्ली के सत्ता के गलियारे में डॉ. मनमोहन सिंह, ए. के. एंटनी और प्रणब मुखर्जी निजी जीवन में बेहद ईमानदार माने जाते हें। क्या खुद ईमानदार रहना ही काफी है? क्या दूसरों की बेईमानी पर पर्दा डालना बेईमानी नहीं है? दरअसल, सत्ता के वैभव में एक ऐसा आलोक होता है जिसके प्रचण्ड तेज में अनेक प्रतिभावान और ईमानदार व्यक्ति विलुप्त हो गए हैं। लगता है कि मनमोहन भी इसी के शिकार हो गए थे। हालांकि मनमोहन ने जब स्पेक्ट्रम का मामला मंत्रिमंडल समूह से परे रखने का फैसला किया, तो ऐसा नहीं था कि सोनिया को इसकी जानकारी नहीं थी। इस विषय पर मनमोहन ने अकेले निर्णय ले लिया होगा, यह बात भी आसानी से हजम होने वाली नहीं है। यानी भीष्म की तरह 'राजमाताÓ सोनिया भी पापाचार के दौरान मौन रहीं और सारा खेल-तमाशा देखती रहीं। फलत: राजा ने 1.76 लाख करोड़ रुपए का चूना लगा दिया, जो देश का सबसे बड़ा घोटाला सिद्ध हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय हर दिन सरकार के कान ऐंठ रहा है। पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह न मानने के तथ्य को सर्वोच्च रेखांकित कर रहा है। 2-जी स्पेक्ट्रम घपले पर सर्वोच्च न्यायलय में याची डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी द्रविड़ मुनेत्र कषगम और कांग्रेस को संचालित करने वाले परिवारों द्वारा घपले का लाभ उठाने का आरोप लगाते हैं लेकिन वे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को सरकार का एकमेव ईमानदार व्यक्ति करार देते हैं। डॉ. स्वामी शक व्यक्त करते हैं कि स्पेक्ट्रम घपले का लाभ लेने वाले करुणानिधि परिवार के लोग ए. राजा की हत्या करवा सकते हैं। अब तो यह केंद्रीय जांच ब्यूरो ही बता सकता है कि उसे पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा और उनके सहयोगियों के यहां छापों के दौरान क्या मिला और वह कितना महत्वपूर्ण है, लेकिन देर-बहुत देर से की गई इस कार्रवाई ने इस धारणा पर मुहर लगा दी कि सीबीआई एक कठपुतली जांच एजेंसी है और वह अपने विवेक से काम नहीं करती। घोटाले के आरोपों से घिरा कोई महामूर्ख ही ऐसा होगा जो खुद को परेशानी में डालने वाले दस्तावेज अपने पास संभाल कर रखेगा। क्या सीबीआई यह कहना चाहती है कि राजा और उनके सहयोगी उसके छापों का इंतजार कर रहे थे? सीबीआई को इस पर शर्मिंदा होना चाहिए कि उसने संदिग्ध घोटालेबाजों और उनके सहयोगियों के यहां इस मामले में रिपोर्ट दर्ज होने के 13 माह बाद छापे डालने की जरूरत समझी। क्या 13 माह इस पर विचार-विमर्श करने में लग गए कि आगे क्या किया जाना चाहिए या फिर उसे कुछ करने की इजाजत ही नहीं मिली? इस पर भी गौर करें कि सीबीआइ को तब भी होश नहीं आया जब खुद सुप्रीम कोर्ट ने करीब 10 दिन पहले उससे यह पूछा था कि आखिर राजा से कोई पूछताछ क्यों नहीं हुई? अभी राजा के यहां केवल छापे ही पड़े हैं। कोई नहीं जानता कि सीबीआइ उनसे पूछताछ कब करेगी? आश्चर्य नहीं कि यह पूछताछ हो ही न, क्योंकि इसके लिए उसे केंद्र सरकार की हरी झंडी चाहिए होगी। और कोई देश होता तो शायद अब तक राजा को गिरफ्तार कर लिया जाता, लेकिन फिलहाल ऐसा कुछ होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। न केवल द्रमुक राजा का बचाव करने में लगी हुई है, बल्कि केंद्र सरकार के अनेक नेता भी यह साबित करने में लगे हुए हैं कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है। संचार घोटाले की कहानी भयानक होती जा रही है। पहले कहा गया था कि इसमें निवेश और इसकी कमाई की तलाश दस देशों में की जानी है मगर राजा और उसके सहयोगियों के यहां जो दस्तावेज और जानकारियां मिली हैं उनसे रातों रात यह सूची 22 देशों की हो गई है। सीबीआई के अधिकारी एक साथ इतने देशों में पड़ताल करने के लिए कम पड़ रहे हैं। अभी यही एक परेशानी नहीं है। आजाद भारत के इस सबसे बड़े घोटाले में देश के कई सबसे बड़े नाम जुड़े हुए हैं। नीरा राडिया के साथ उसके ग्राहकों की जो बातचीत टेप की गई है उनमें अदालत के फैसले बदलवाने से ले कर रिश्वत खिलाने तक के बहुत सारे सबूत मिले हैं और इन महाबली ग्राहकों से पूछताछ की जानी है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी सहमति दे दी है। अब इस दृश्य की कल्पना करिए कि मुकेश अंबानी अंदर स्टूल पर बैठ कर अधिकारियों से घिरे और सवालों के जवाब देते नजर आ रहे हैं। रतन टाटा बाहर बैंच पर दो हवलदारों के बीच बैठे हुए हैं। वीडियोकॉन के वेणु धूत को पुलिस की एक गाड़ी ले कर आ रही है। ए. राजा रिकॉर्ड के आधार पर याद करने की कोशिश कर रहे हैं कि कितना पैसा आया था और कितना गया था। इसमें यह भी जोड़ लीजिए कि बरखा दत्त और वीर सांघवी भी एक कमरे में बंद हैं और प्रभु चावला के आने का इंतजार किया जा रहा है ताकि पूछताछ शुरू हो सके। नीरा राडिया नकली पासपोर्ट पर फरार हो चुकी हैं। राजा के सहयोगी आईएएस अधिकारी और भूतपूर्व संचार सचिव जमानत की अर्जियों के साथ अदालतों में बैठे हैं। जो तलाशियां ली गई हैं और जो बरामदगी हुई हैं उसमें पूरा हिसाब नहीं मिल रहा है। एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए का हिसाब कंप्यूटर भी ठीक से नहीं रख सकता। विश्लेषण के लिए टैक्स विशेषज्ञों को बुलाया गया है। बहुत सारे डॉक्टरों की जरूरत पड़ी है क्योंकि पूछताछ के दौरान कई महान लोग बेहोश होने लगे हैं। यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं हैं बल्कि सीबीआई ने जो भावी दृश्य की फाइल बनाई है उसके कुछ पन्ने हैं। सीबीआई ने सरकार से कहा है कि यह मामूली मामला नहीं है, इसके लिए कई मोर्चो पर कई लोगों की एक साथ जरूरत पड़ेगी और पूछताछ तथा खोजबीन में बाधा नहीं पड़े इसलिए मौके पर डॉक्टरों और वकीलों की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। रतन टाटा और नीरा राडिया की सबसे ज्यादा घनिष्ठता थी इसलिए ये लोग सबसे विकट तौर पर फंसे हुए हैं। फिलहाल सीबीआई को नीरा राडिया पर तीन सौ करोड़ डॉलर की विदेशी मुद्रा हवाला के जरिए मंगाने का शक है और अगर यह शक सही निकला और अदालत में साबित हो गया तो नीरा को दस साल तिहाड़ जेल में काटने पड़ सकते है। वहां वे अपने मोबाइल फोन को सबसे ज्यादा मिस करेंगी। बरखा दत्त, वीर सांघवी और प्रभु चावला में जेल में रहने का अनुभव सिर्फ चावला को है और वह भी आपातकाल के दौरान कुछ महीने वे जेल में रहे थे और फिर माफी मांग कर बाहर निकल आए थे। यहां तो जीते जागते देशद्रोह के सबूत हैं, उनसे बचना आसान नहीं हैं और कोई माफी काम नहीं आएगी। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला अब दूरसंचार कंपनियों के बीच आपसी लड़ाई में तब्दील होता दिख रहा है। स्पेक्ट्रम आवंटन में पक्षपात से शुरू हुआ यह घोटाला मोबाइल टेलीफोनी की दो प्रौद्योगिकियों-सीडीएमए और जीएसएम पर मोबाइल सेवा देने वाली कंपनियों को फायदे-नुकसान पर तू-तू-मैं-मैं से जुड़ गया है। राज्यसभा सांसद एवं उद्योगपति राजीव चंद्रशेखर और टाटा समूह के प्रमुख रतन टाटा के बीच शुरू हुए आरोप-प्रत्यारोप से साफ है कि मामला अब 2जी स्पेक्ट्रम के आगे निकल गया है। रतन टाटा ने गुरुवार को राजीव चंद्रशेखर के उन आरोपों को सिरे से नकार दिया कि समूह की कंपनी टाटा टेलीसर्विसेज को हुए स्पेक्ट्रम आवंटन में नियमों की अनदेखी हुई और कंपनी को बारी से पहले आवंटन हुआ। टाटा टेलीसर्विसेज सीडीएमए आधारित मोबाइल सेवा प्रदान करती है। टाटा ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया ने दूरसंचार क्षेत्र में जीएसएम आपरेटरों के वर्चस्व को तोड़ा है। उन्होंने कहा कि कि यदि इस मामले की जांच होनी है तो वह 2001 से ही होनी चाहिए। टाटा ने कहा है कि चंद्रशेखर के आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और उनका मकसद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को असहज करना है। राजीव चंद्रशेखर मोबाइल आपरेटरों के संगठन सेलुलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) के अध्यक्ष रह चुके हैं। जीएसएम आपरेटरों के इस संगठन में भारती, वोडाफोन, आइडिया और एयरसेल अन्य ताकतवर सदस्य हैं। इसी संगठन ने सीडीएमए प्रौद्योगिकी पर मोबाइल सेवा देने वाली कंपनियों को जीएसएम स्पेक्ट्रम आवंटित करने के सरकार के फैसले का विरोध किया था। सीडीएमए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल टाटा टेलीसर्विसेज और रिलायंस कम्युनिकेशन कर रहे हैं। हालांकि टाटा का बयान आने के बाद चंद्रशेखर ने कहा कि रतन टाटा उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों को भटका रहे हैं।बीपीएल टेलीकॉम नाम की मोबाइल कंपनी चला चुके राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने दो दिन पहले ही अपने एक खुले पत्र में रतन टाटा पर आरोप लगाया था कि टाटा टेलीसर्विसेज को नियम तोड़कर स्पेक्ट्रम आवंटित किया गया। इसकी वजह से सरकार को 19074.80 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। टाटा का कहना है कि चंद्रशेखर ने उन जीएसएम ऑपरेटरों का जिक्र क्यों नहीं किया जिनके पास अतिरिक्त स्पेक्ट्रम है और वो भी मुफ्त का? केंद्र सरकार ने जानबूझकर सीबीआई को नख-शिख-दंत विहीन बना रखा है ताकि उसका मनमाना राजनीतिक इस्तेमाल किया जा सके। वैसे तो केंद्रीय सतर्कता आयोग को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह सीबीआई पर निगाह रखे, लेकिन वह खुद भी अक्षम है और अब तो इस आयोग का मुखिया उन पीजे थॉमस को बना दिया गया है जो एक मामले में खुद ही अभियुक्त हैं। इसके अतिरिक्त यह भी किसी से छिपा नहीं कि जब वह दूरसंचार सचिव थे तो राजा की जी हुजूरी करने में लगे हुए थे। बेहतर होगा कि सुप्रीम कोर्ट सीबीआई को केंद्र सरकार के शिकंजे से मुक्त कर वास्तव में स्वायत्ता संस्था बनाने की पहल करे। यदि ऐसा नहीं होता तो यह शीर्ष जांच एजेंसी और अधिक बदनाम ही होगी। कार्पोरेट घरानों ,बिचौलियों और दलालों ने मीडिया के नामचीन घोड़ों के साथ हमबिस्तरी की और सारे बिरादरी के मुंह पर कालिख पोत दिया। 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में बरखा दत्त ,वीर संघवी और प्रभु चावला का नाम सामने आने से ये तो साबित हो गया कि हिंदुस्तान में पत्रकारों की एक बड़ी जमात कारपोरेट हाथों में या तो बिक चुकी है या फिर खुद को बेचने के लिए खड़ी है,मगर आश्चर्य ये है कि इस खुलासे के बावजूद भी बेशर्मी कम नहीं हुई। राजदीप जब प्रेस कल्ब में पत्रकारों को नैतिकता की शिक्षा दे रहे थे तब भी वो बेशर्मी नजर आ रही थी। एनडीटीवी ने जब बरखा दत्त के खिलाफ लिखने वाली ओपन पत्रिका को मुकदमे में घेरने की धमकी दी तब भी वो बेशर्मी नजर आ रही थी और अब भी नजर आ रही है जब इतना कुछ होने के बावजूद अखबार और टीवी चैनल बाजार में नंगा खड़ा होकर बोली लगा रहे हैं, नि:संदेह ये शर्म से मुंह छुपाने के वक्त है अगर शर्म से मुंह नहीं छुपा सकते तो अपने गालों पर अपने ही हाथों से थप्पड़ मार लें। 2 जी स्पेक्ट्रम के खुलासे में अब तक जो कुछ भी प्रतिक्रिया स्वरुप हो रहा है वो एक दो पत्रिकाओं को छोड़कर सिर्फ वेब मीडिया में ही नजर आ रहा है, लेकिन हिन्दुस्तानी पत्रकारिता के इसे काले अध्याय में अब तक बहुत से पन्ने खोले ही नहीं गए हैं। हर डर का अपना चरित्र होता है ,पर शायद अब समय आ गया है कि सारे भय को त्यागकर ठगों चोरों और दलालों के खिलाफ हल्ला बोल दिया जाए। राजा ने अपनी ताजपोशी के लिए मीडिया के जिन अय्यारों का इस्तेमाल किया उनके चेहरे पर से पर्दा हटाना सिर्फ जरूरी ही नहीं धर्म भी है। स्पेक्ट्रम घपले से संबंधित कुछ टेलीफोन वार्ताओं के सार्वजनिक होते ही हंगाम खड़ा हुआ। इन टेपों की जो स्क्रिप्ट जारी हुई है उनमें वीर संघवी (हिंदुस्तान टाइम्स के संपादकीय सलाहकार) और एनडीटीवी की समूह संपादक बरखा दत्त की भूमिका संदिग्ध नजर आती हैं। अगर हम नीरा राडिया से हुई बातचीत के टेपों को सुने तो पता चलता है कि नीरा ने पिछले 7 जुलाई 2009 को राजदीप सरदेसाई से बात की थी। वो प्राकृतिक गैस के दामों को लेकर मुकेश अम्बानी का दाहिना हाँथ कहे जाने वाला मनोज मोदी के साथ राजदीप से मिलना चाहती थी, लेकिन राजदीप ने उससे कहा कि वो ज्वाइंट मैनेजिंग डायरेक्टर समीर मनचंदा से मिल लें। यहाँ सवाल उठता है कि राजदीप ,मनोज और समीर की क्यूँ मुलाकात कराना चाहते थे ,और सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि गैस के दामों पर चर्चाएँ टीवी चैनल के न्यज बुलेटिन्स में होनी चाहिए कि मुकेश अम्बानी के कारखास नीरा राडिया के साथ, राजदीप को जवाब देना चाहिये ये कैसी नैतिकता ,कैसा आदर्श था। नीरा राडिया ने चार कंपनियां बनाई हैं और इनमें वैष्णवी कंसलटेंट प्राइवेट लिमिटेड सबसे पुरानी है। इसके अलावा रिश्ते बेचने की नोएसिस कंसलटिंग विटकॉम और न्यूकॉम कंसलटिंग भी दलाली का अच्छा खासा कारोबार कर रही है। ये पहली बार पता चला कि पिछले साल 21 अक्टूबर को सीबीआई ने नीरा राडिया के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मुकदमा दर्ज किया है। उनकी कंपनी नोएसिस पर आपराधिक साजिश रचने का इल्जाम हैं। इस जांच की जानकारी 16 नवंबर 2009 को सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के डीआईजी विनीत अग्रवाल ने आयकर महानिदेशालय में सतर्कता अधिकारी मीराब जैन को भेज दी थी। चार दिन बाद 20 नवंबर को इसका जवाब भी आ गया और चि_ी में साफ लिखा है कि नीरा राडिया के टेलीफोन को आयकर विभाग के आदेश पर निगरानी में डाल दिया गया। नीरा राडिया जो चारों कंपनियां चलाती है उन सभी के फोन टेप हुए। पता चला कि अपने कॉरपोरेट ग्राहकों के लिए नीरा राडिया ने संचार मंत्री ए राजा से कह कर कई बड़े और महंगे सौदे अपने ग्राहकों के हक में बदलवाए। सिर्फ चार महीने में हजारों करोड़ के सौदे हो गए। नीरा राडिया ने नए टेलीफोन ऑपरेटरों को सिखाया कि विदेशी निवेश कैसे छिपाया जा सकता है। नीरा राडिया के ए राजा के साथ संदिग्ध होने की हद तक अंतरंग संबंध है। राजा और राडिया सीधे मोबाइल पर प्रेमालाप करते है। सीबीआई के अधिकारियों के अनुसार जब मनमोहन सिंह अपना दूसरा मंत्रिमंडल बना रहे थे तो गुप्तचर रिपोर्ट दी गई थी कि ए. राजा के बहुत सारे आर्थिक स्वार्थ हैं इसलिए उन्हें कोई जिम्मेदार विभाग नहीं दिया जाए। मगर राजनैतिक मजबूरियों और नीरा राडिया के ताकतवर कॉरपोरेट ग्राहकों की मदद से आखिरकार राजा संचार मंत्री बन ही गए। सबूत सामने है। कैबिनेट के शपथ ग्रहण से ग्यारह दिन पहले नीरा राडिया के फोन टेप दस्तावेजों के अनुसार कॉरपोरेट लॉबी की पहल पर नीरा राजा को संचार मंत्री बनवाने में लगी हुई थी। कई बड़े पत्रकारों के नाम भी (हिन्दुस्तान टाइम्स के पूर्व सम्पादक वीर संघवी, एनडीटीवी की प्रबंध सम्पादक बरखा दत्त का नाम नीरा राडिया के साथ और उसके लाबिंग में तथाकथित मदद को लेकर चर्चा में है , और भी सुनामधन्य खबरनवीसों के नाम हैं ) इन दस्तावेजों में है। टाटा इंडिकॉम तो चलाता ही है और नई मोबाइल कंपनी एयरसेल में मैक्सिस कम्युनिकेशन और अपोलो के जरिए टाटा ही मालिक है। रतन टाटा वोल्टास के जरिए करुणानिधि के पत्नी के चार्टर्ड अकाउंटेंट के संपर्क में भी थी। एयरटेल के सुनील मित्तल लगातार कोशिश कर रहे थे कि राजा नहीं, दयानिधि मारन दोबारा संचार मंत्री बने। इस काम के लिए भी मित्तल ने राडिया से संपर्क किया। आयकर विभाग के गुप्त दस्तावेज बताते है कि स्वान टेलीकॉम, एयरसेल, यूनीटेक वायरलैस और डाटा कॉम को लाइसेंस और स्पेक्ट्रम के लाभ भी मिले। राडिया ने अपनी सभी कंपनियों में रिटायर्ड अफसरों को रखा हुआ हैं और वे बहुत काम आते है। कहा जाता है कि झारखंड के मुख्यमंत्री मधु कोडा टाटा समूह से एक सौ अस्सी करोड़ रुपए मांग रहे थे मगर राडिया ने राज्यपाल के जरिए मुफ्त में काम करवा दिया। जाहिर है कि यह सेवा नि:शुल्क नहीं हुई होगी। नीरा राडिया की कंपनिया टाटा के अलावा यूनीटेक, रिलायंस, स्टार समूह जैसे बड़े ब्रांड के लिए जनसंपर्क यानी दलाली कर रही है। इस दलाली में भी खूब खेल हो रहे हैं। स्वान को पंद्रह सौ सैतीस करोड़ रुपए में लाइसेंस मिला और कुछ ही दिन बाद इसका सिर्फ चौवालीस प्रतिशत हिस्सा संयुक्त अरब अमीरात के ईटीसैलेट को बयालीस सौ करोड़ में बेच दिया। यूनीटेक वायरलैस को स्पेक्ट्र लाइसेंस सोलह सौ इकसठ करोड़ में मिला और उन्होंने नार्वे की टेलनोर को साठ प्रतिशत शेयर इकसठ सौ बीस करोड़ रुपए में बेच दिया। ईमानदारी की कसम खाने वाले टाटा टेली सर्विसेज ने भी सिर्फ छब्बीस फीसदी शेयर जापान के डोकोमो को तेरह हजार दो सौ तीस करोड़ रुपए में बेचे। स्वान कंपनी ने तो और भी कमाल किया। चार महीने पहले चेन्नई की जेनेक्स एग्जिम वेंचर को तीन सौ अस्सी करोड़ रुपए के शेयर एक लाख रुपए में दे दिए। घपला साफ दिख रहा है। लेकिन इस घपले को पकडऩे वाले सीबीआई के मिलाप जैन का तबादला हो चुका है और आयकर विभाग अब कह रहा है कि उसने कभी नीरा राडिया का फोन टेप करने के आदेश दिए ही नहीं थे। नीरा राडिया के ग्र्राहकों में पीसीएस हैं, टाटा स्टील है, टाटा मोटर्स है, टाटा टेली सर्विसेज है, इंडियन होटल्स है, ट्रेंट इंटरनेशनल है, टाइटन है, सन माइक्रो सिस्टम है, आईटीसी है, जीएमआर है, स्टार है, सीमंस है, कोटक महिंद्रा है, चैनल वी है, ईबे है, अरेवा पावर्स है, रेमंड्स है और भारतीय उद्योग महासंघ भी है। आप समझ सकते हैं कि नीरा जी कितनी प्रतिभाशाली हैं। नीरा की कंपनियों की बोर्ड में मध्य प्रदेश काडर के आईएएस अफसर और टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरटी के अध्यक्ष रहे प्रदीप बैजल हैं, बड़े सचिव पदों पर रहे सीएम वासुदेव हैं जो महाराष्ट्र के मुख्य सचिव थे, एस के नरुल्ला हैं जिन्हें और बड़ा दलाल माना जाता है और सीईओ के पद पर राजीव मोहन है जो दुर्भाग्य से नीरा वाडिया से पहले जेल जाएंगे। भलेमानुष(?) प्रधानमंत्री की बेचारगी साफ दिखाई देती है, वहीं द पायोनियर और दक्षिण के इक्का-दुक्का अखबारों को छोड़कर इस पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रीय मीडिया(?) की अनदेखी और चुप्पी बहुत रहस्यमयी है। यहाँ तक कि पायोनियर और द हिन्दू अखबारों ने सीबीआई अधिकारियों की आपसी आधिकारिक चिठ्ठी-पत्री को सार्वजनिक क्यों नहीं किया यह भी आश्चर्य की बात है। गत कुछ माह से द पायोनियर ने इस पूरे घोटाले की परत-दर-परत खोलकर रखी है तथा करुणानिधि, प्रधानमंत्री तथा ए. राजा को लगातार परेशान रखा है। पिछले कुछ महीनों से दूरसंचार मंत्री ए राजा सतत खबरों में बने हुए हैं, हालांकि जितना बने होना चाहिये उतने तो फिर भी नहीं बने हैं, क्योंकि जिस प्रकार लालूप्रसाद के चारा घोटाले अथवा बंगारू लक्ष्मण रिश्वत वाले मामले में मीडिया ने आसमान सिर पर उठा लिया था, वैसा कुछ राजा के मामले में अब तक तो दिखाई नहीं दिया है। जबकि राजा के घोटाले को देखकर तो लालूप्रसाद यादव बेहद शर्मिन्दा हो जायेंगे, और उस दिन को लानत भेजेंगे जब उन्होंने दूरसंचार की जगह रेलवे मंत्रालय चुना होगा। साथ ही शशि थरूर भी उस दिन को कोस रहे होंगे जब उन्होंने खामख्वाह ट्विटर पर ललित मोदी से पंगा लिया और उनकी छुट्टी हो गई। संभव है कि तमाम घपलों की तरह यह घपला भी समय के साथ भुला दिया जाए। 1980 के दशक में बोफोर्स घपले पर देशव्यापी हंगामा खड़ा हुआ। बोफोर्स घपले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनी। सीबीआई ने भी इस मामले की जांच के लिए इंटरपोल तक से दशकों समन्वय किया। दशकों की जांच के बाद क्या हासिल हुआ? बस, वही ढाक के तीन पात। क्वात्रोची कथित कमीशन के जब्त खाते का धन भी '10 जनपथÓ के कारिंदे हंसराज भारद्वाज की मेहरबानी से पार करने में कामयाब हो गया। स्पेक्ट्रम घपलों पर बहस के बीच संसद चलाने के लिए हरसंभव प्रयास के बावजूद विफल होने वाले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने चुनौती दी और कहा कि भाजपा को भ्रष्टाचार का आरोप लगाने का नैतिक अधिकार ही नहीं है।
मुन्नी बहन भी, बेटी भी
जब से मुन्नी बदनाम हुई और शीला की जवानी.. गाना आया है, तब से इन नामों की लड़कियां और महिलाएं परेशान हो रही हैं। शरारती तत्वों ने इन नामों की महिलाओं का राह चलना मुश्किल कर दिया है। इन नामों की महिलाओं के परिवारवालों को शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है। शादी-ब्याह में भी ये गाने खूब चल रहे हैं। इससे कभी भी तनाव पैदा हो सकता है और मारपीट की नौबत आ सकती है इसलिए इन गानों पर रोक लगाना जरूरी है। मुन्नी खता किये बगैर दुनिया में बदनाम हो चुकी है। मूंछों वाले मर्द को देख कर मुंह ढक लेने वाली मुन्नी की दशा आज बगैर कुछ किये ही ऐसी हो गयी है, जैसे उसने दुनिया का सबसे बड़ा अपराध कर दिया है। वह अगर (मुन्नी बदनाम हुई...) गाने को नजरअंदाज करना भी चाहती है तो मनचले और तेज आवाज में उसका चारित्रिक शोषण करने से नहीं चूकते। ऐसे में वह खुद को असहाय महसूस कर रही है और नाम के कारण अपने जीवन पर भी रो रही है। साथ ही अंदर ही अंदर माता-पिता और उस पुरोहित को भी कोसती नजर आ रही है, जिसने उसे मुन्नी नाम दिया था। माना पूरे देश पर पश्चिमी संस्कृति का या फिल्मों का असर हुआ है, पर आज भी गांवों की अपनी अलग संस्कृति है। रहन-सहन, खान-पान, चाल-ढाल के साथ कुछ भी शहरों से मेल नहीं खाता। गांव के लोग आज भी अपनी प्रतिष्ठा को सर्वोपरि रखते हैं और मान-सम्मान, मर्यादा के लिए ही पूरा जीवन गुजार देते हैं, इसीलिए परिवर्तन के बाद भी गांव आज भी गांव ही नजर आते हैं। गांवों में आज भी लड़कियों के मुन्नी, कमला या कलावती जैसे नाम ही रखे जाते हैं, जिनको मुम्बई वाले आये दिन भुनाते रहते हैं। पैसे के लिए गांव की गरीब महिला का उपहास पहले भी उड़ाया जाता रहा है। कमला या कलावती की तरह ही इस बार मुन्नी पर हमला किया गया है, लेकिन बेचारी मुन्नी कुछ कर नहीं सकती, क्योंकि उसी के अपने मुम्बई वालों के रंग में ही रंगे नजर आ रहे हैं, जिससे वह सिर्फ अंदर ही अंदर घुटने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकती। इसके अलावा उस बेचारी को यह कौन समझाये कि उसका कसूर आम महिला होने का है और इस देश में किसी भी मुद्दे पर आम महिला-पुरुष को कुछ भी कहने का कोई अधिकार नहीं है। आम महिला-पुरुष की हैसियत यह फिल्म बनाने वाले भी अच्छी तरह जानते हैं, तभी उनके निशाने पर हर बार गांव की आम महिला ही आती है और भविष्य में भी आती रहेंगी, क्योंकि गांव के लोगों का सबसे बड़ा दोष गरीबी है, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि यह मुन्नी भी किसी की बेटी है, किसी की पत्नी है, किसी की बहन है और किसी की मां भी है।
आतंकवादियों के बहुत सारे नए रास्ते
नेपाल में जारी राजनीतिक अनिश्चितता पर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार जल्द ही नहीं चेती, तो भारत एक बार फिर से सिख आतंकवाद से दहल उठेगा। जम्मू-कश्मीर समेत देश के कई राज्य पहले से ही पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की विभीषिका से जूझ रहे हैं। अब पाकिस्तान से सिख आतंकवादियों को पूरी मदद मिल रही है और इन्हें नेपाल होते हुए भारत भेजा जा रहा है। खुफिया अधिकारियों का मानना है कि पाकिस्तान उत्तर प्रदेश को ट्रांजिट रूट के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। भारत-नेपाल की 550 किलोमीटर लंबी खुली सीमा आतंकियों के नापाक मंसूबों में मददगार साबित हो रही है। नेपाल की सीमा से आतंकियों को उत्तर प्रदेश में घुसाकर उन्हें तराई के इलाकों में शरण दिलाई जाती है। यहां से आतंकवादियों को देश के विभिन्न हिस्सों में वारदातों को अंजाम देने के लिए भेजा जाता है। पाकिस्तान की यह साजिश इस लिहाज से भी खतरनाक है कि अब सिख और मुस्लिम आतंकवादी संगठन एक साथ काम कर रहे हैं। नेपाल में पाक दूतावास से इन आतंकियों को हर तरह की मदद मिल रही है। सिद्धार्थ नगर के बढनी बॉर्डर से सिख आतंकवादी माखन सिंह उर्फ दयाल सिंह की गिरफ्तारी से पाकिस्तान के नापाक मंसूबों का खुलासा होता है। माखन सिंह से मिली जानकारी के अनुसार आतंकी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल पाकिस्तान की मदद से अपने संगठन को मजबूत करने में लगा है। माखन बब्बर खालसा इंटरनेशनल का सेकेंड लेफ्टिनेंट है, जो दर्जनों सिख युवकों को आतंकी गतिविधियों की ट्रेनिंग दिलाकर उन्हें नेपाल के रास्ते भारत भेज चुका है। उसके काठमांडू में सक्रिय आईएसआई एजेंटों से अच्छे संबंध हैं। नेपाल में वह अपनी सारी गतिविधियों को पाकिस्तानी दूतावास के संरक्षण में अंजाम दे रहा था। माखन ने जो चौंकाने वाला खुलासा किया है, वह और भी ज्यादा चिंताजनक और संवेदनशील है। इसके मुताबिक आईएसआई के संरक्षण में बब्बर खालसा इंटरनेशनल के खालिस्तानी मूवमेंट को अमेरिका के कुछ सिखों से आर्थिक मदद मिल रही है। सिद्धार्थनगर व उसके पड़ोसी महराजगंज जिले की सीमा नेपाल से सटी है। इस इलाके से अब तक करीब एक दर्जन से अधिक दुर्दांत सिख आतंकी पकड़े जा चुके हैं। खुफिया तंत्र की मानें तो नेपाल में जारी राजनीतिक अनिश्चितता का फायदा पाकिस्तान आतंकी संगठनों को मजबूती और ट्रेनिंग देने में उठा रहा है। माओवादियों के साथ आतंकियों के रिश्तों का पहले ही खुलासा हो चुका है। नेपाल में पाक दूतावास इनके लिए कई सुविधाओं के साथ ही ट्रेनिंग के लिए सुरक्षित ठिकाने भी मुहैया कराता है। आतंकी वारदातों को अंजाम देने का प्रशिक्षण पूरा होने के बाद आतंकवादियों की खेप को नेपाल के रास्ते ही वाया उत्तर प्रदेश होते हुए भारत के विभिन्न इलाकों में पहुंचा दिया जाता है। वर्ष 1997 में बढऩी बॉर्डर पर सबसे पहले सिख आतंकवादियों भाग सिंह और अजमेर सिंह को बॉर्डर पुलिस फोर्स ने गिरफ्तार किया था। दोनों ही आतंकी पंजाब में हत्या व लूट की दर्जनों वारदातों के आरोपी थे। चार माह पहले एटीएस प्रभारी अभय प्रताप मल्ल ने बटला हाउस कांड के आरोपी और पांच लाख के इनामी आतंकवादी सलमान को गिरफ्तार किया था। सलमान आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन का सक्रिय सदस्य है। बढनी सीमा पर ही पांच साल पहले शकील नामक आतंकवादी को एके-47 के साथ गिरफ्तार किया गया था। इसके पूर्व महराजगंज के सोनौली बॉर्डर पर मुंबई बमकांड के मास्टर माइंड याकूब मेनन, हार्डकोर आतंकी राजू खन्ना को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। मेनन वर्ष 1992 में हुए मुंबई बम ब्लास्ट का न केवल मास्टर माइंड था बल्कि उसने धमाके कराने के लिए आतंकियों को धन भी मुहैया कराया था। भारत-नेपाल की 550 किमी लंबी सीमा पूरी तरह से खुली है। यह आतंकवादियों के लिए काफी सुरक्षित है। मुख्य मार्गों पर ही बैरियर लगाकर चेकिंग होती है, खुले कच्चे रास्तों पर चेकिंग कर पाना मुमकिन भी नहीं है। खुफिया तंत्र की मानें तो नेपाल में जारी राजनीतिक अनिश्चितता का फायदा पाकिस्तान आतंकी संगठनों को मजबूती और ट्रेनिंग देने में उठा रहा है। माओवादियों के साथ आतंकियों के रिश्तों का पहले ही खुलासा हो चुका है। नेपाल में पाक दूतावास इनके लिए कई सुविधाओं के साथ ही ट्रेनिंग के लिए सुरक्षित ठिकाने भी मुहैया कराता है। आतंकी वारदातों को अंजाम देने का प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, आतंकवादियों की खेप को नेपाल के रास्ते ही वाया उत्तर प्रदेश होते हुए भारत के विभिन्न इलाकों में पहुंचा दिया जाता है। नेपाल के रास्ते पाकिस्तान ने भारत की अर्थव्यवस्था को चौपट करने का अभियान चला रखा है। जाली नोटों की लंबी खेप वाया नेपाल भारत पंहुचाई जा रही है। पिछले तीन माह में जाली नोट तस्करों को एटीएस गिरफ्तार कर चुकी है। यहां आतंकवादियों और जाली नोटों के तस्करों की गिरफ्तारी एटीएस करती है। नेपाल के सरहदी जिलों से अब तक करीब साढ़े तीन सौ लोगों की गिरफ्तारी इस बात की पुष्टि करती है। वह भी उन हालात में जब इन गिरफ्तार लोगों में अधिकतर की पहचान जैश-ए-मोहम्मद और अलकायदा जैसे आतंकवादी संगठनों के सदस्य के रूप में की जा चुकी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को इस बात की सूचना मिली है कि पाकिस्तान के आतंकी संगठन नेपाल की सीमा के जरिए भारत में घुसने की फिराक में है। मार्च महीने में भारत-नेपाल सीमा पर एक पाकिस्तानी, एक इसराइली व एक जर्मन नागरिक को बिना उचित दस्तावेजों के भारत में घुसते हुए सश सीमा बल के जवानों ने पकड़ा था। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के साथ मिलकर देशद्रोह की गतिविधियों में शामिल कई लोग रातों-रात धनवान हो गए, जिन पर प्रशासन की नजर तो है। लेकिन वह इन पर सीधे तौर पर कार्रवाई करने से कतरा रहा है। खुफिया तंत्र की मानें तो प्रतिबंधित संगठन का एक सदस्य इलाके की शैक्षणिक संस्था में अध्यापन का कार्य कर रहा है। इससे साफ है कि आईएसआई ने भारत-नेपाल सीमा पर अपनी जड़ें कितनी गहराई तक जमा ली है। एसएसबी के डीआईजी ब्रजसोम का कहना है कि सीमा पर एसएसबी के जवानों की सतर्क नजर है। चेकिंग की जा रही है। नेपाल से सटी सरहद पर आतंकियों की बढ़ती गतिविधियां भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत-नेपाल सीमा पर तैनात सशस्त्र सुरक्षा बल के जवानों को अब झाड़-झंखाड़ के बीच पैदल गश्त करने की दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा। अब वह सीमा के एक छोर से दूसरे छोर तक अपने वाहन से आराम से गश्त कर सकेंगे। केंद्र सरकार ने लोक निर्माण विभाग को भारत-नेपाल सीमा पर सात मीटर चौड़ी सड़क के निर्माण का प्रोजेक्ट तैयार कर उसे भेजने का निर्देश दिया है। इस योजना को मूर्तरूप देने के लिए लखनऊ में केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारियों के बीच बैठक में सहमति बन चुकी है। सड़क सीमा बिंदू से सौ गज पहले बनेगी जिसका विस्तार नेपाल से सटने वाले प्रत्येक जिले तक होगा। यह सड़क खासतौर पर एसएसबी के लिए रिजर्व रहेगी। सड़क पर हाईपावर के प्रकाशबिंदु और निगरानी के लिए विशेष उपकरण लगाए जाएंगे।
आतंकियों की नए सिरे से पैरवी
मुंबई आतंकी हमले में शहीद एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे को लेकर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयान पर भाजपा का आक्रामक होना लाजिमी है। भाजपा ने कांग्रेस पर सौहाद्र्र बिगाडऩे की साजिश में शामिल होने का आरोप लगाते हुए दिग्विजय के कारनामों की जांच कराने की मांग की है। सवाल उठता है कि मुंबई हमले की जांच में अर्से बाद ऐसे बयानों के पीछे की असली मंशा क्या है? चाहे बांग्लादेशी घुसपैठियों का सवाल हो या बाटला कांड में शहीद मोहनलाल की शहादत पर शक, प्रधानमंत्री द्वारा देश के संसाधनों पर मुस्लिमों का पहला हक होने वाला बयान हो या आजमगढ़ के आतंकवाद के आरोपियों का बचाव करने की कोशिश। आजादी के बाद पहली बार हो रहा है कि कांग्रेस आतंकवाद को भगवा रंग व धर्म से जोड़ रही है, जबकि चिल्ला-चिल्ला कर सारा देश कहता रहा है कि आतंकवाद का कोई धर्म या जाति नहीं होती। फिर इस रणनीति के पीछे क्या आशय हो सकता है? निशिचत तौर पर बेढ़ब बयान देने को लेकर खासे कुख्यात हो चुके कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने हेमंत करकरे को लेकर जो नितांत अविश्वसनीय बयान दिया , उससे यह साबित हो गया कि वह अपने राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने और खुद को चर्चा में लाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यह हास्यास्पद है कि दिग्विजय सिंह को दो वर्ष बाद यह याद आ रहा है कि हेमंत करकरे ने अपनी शहादत के कुछ घंटे पहले फोन पर उनसे कहा था कि उन्हें हिंदू उग्रपंथियों से खतरा है। आखिर खुद को करकरे का करीबी बताने वाले दिग्विजय सिंह ने इस बारे में अभी तक मौन क्यों साधे रखा? जिम्मेदार नेता न सही, एक नागरिक होने के नाते क्या उनका यह दायित्व नहीं बनता था कि वह इस बारे में महाराष्ट्र पुलिस को सूचित करते? उन्होंने अपने गैर जिम्मेदाराना बयान से उन अब्दुल रहमान अंतुले को भी पीछे छोड़ दिया जिन्होंने करकरे की शहादत पर सवाल उठाकर केंद्र सरकार को शर्मिदा किया था। कांग्रेस ने अंतुले से तो निजात पा ली, लेकिन शायद वह अभी यह समझने के लिए तैयार नहीं कि दिग्विजय सिंह उसका, उसकी सरकार और देश के सामाजिक माहौल का कितना अहित कर रहे हैं? यह पर्याप्त नहीं कि कांग्रेस ने उनके बयान से पल्ला झाड़ लिया। यदि कांग्रेस नेतृत्व को उस क्षति का तनिक भी अनुमान है जो दिग्विजय सिंह ने अपने मनगढं़त बयान से की है तो उसे उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। वह जिस तरह रह-रहकर गैर जिम्मेदाराना और उकसावे वाले बयान देते रहते हैं उससे तो यही लगता है कि वह ऐसा किसी रणनीति के तहत करते हैं और कांग्रेस को उनकी यह रणनीति रास आ रही है। चूंकि खुद हेमंत करकरे की पत्नी ने दिग्विजय सिंह के बयान को देश को गुमराह करने वाला करार देते हुए इससे इनकार किया कि उनके पति और कांग्रेसी नेता के बीच ऐसी कोई बातचीत हुई थी इसलिए इस पर कोई संदेह नहीं रह जाता कि उन्होंने खुद के अथवा अपने दल के किसी बड़े संकीर्ण स्वार्थ को पूरा करने के लिए एक हवाई बयान दे डाला। आश्चर्य नहीं कि उनका इरादा घोटालों से घिरी कांग्रेस और केंद्र सरकार की ओर से जनता का ध्यान भंग करना हो। यह भी हो सकता है कि वह संदिग्ध आतंकियों की नए सिरे से पैरवी करना चाहते हों और इसके लिए उन्हें यह जरूरी जान पड़ा हो कि पहले हिंदू संगठनों को लांछित किया जाए। आखिर यह एक तथ्य है कि वह संदिग्ध आतंकियों और उनके समर्थकों को क्लीनचिट देने का काम करते रहे हैं। कम से कम कांग्रेस को तो यह समझ आना ही चाहिए कि दिग्विजय सिंह संजरपुर के जिन आतंकियों को गले लगा रहे थे उन्हें ही वाराणसी में बम विस्फोट के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। यह ठीक है कि हमारे नेता वोट बैंक की राजनीति करते हैं, लेकिन क्या अब उन्हें इस राजनीति के तहत इसकी भी छूट दे दी गई है कि वे झूठ बोलकर देश को गुमराह करें और संदिग्ध आतंकियों का मनोबल बढ़ाएं? यह वह सवाल है जिसका जवाब कांग्रेस को देना चाहिए, क्योंकि वही है जो दिग्विजय सिंह पर लगाम लगाने के बजाय उन्हें संरक्षण दे रही है।
लोकतंत्र के चीरहरण का जलसा
चाणक्य नीति की एक सूक्ति में राजनीति को उस वेश्या के सामान बताया गया है जो कीमत के आगे हर रात अपना बिस्तर बदल लेती है। सुना था, पढ़ा था और आज देख भी रहा हूं। देश के विकास के लिए गठित पंचायत, मीडिया और लोकप्रशासन किसी बेबस विधवा की तरह लोकतंत्र के चीरहरण जलसे को चाहे अनचाहे खामोशी से देख रहा है। जनता को बेबकूफ बनाकर बेशर्मी की चादर ओढ़ ली गई है। कोई बिकने की बात को लेकर टोकेगा तो कछुए की तरह भ्रष्टाचार की दौलत से बने मोटे खोल में वह बेशर्मी से मुंह छुपा लेगा। ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जो कि शाम का थोड़ा-बहुत समय जनता को भाषण देने के लिए निकाल ही लेते हैं। वे सब बेकार हैं। हमें लेनिन जैसे जांबाज क्रांतिकारी से कुछ सीखना चाहिए, जिनकी क्रांति पाने की चाहत के अलावा कोई दूसरी महत्वाकांक्षा नहीं थी। अगर आक्रामकता से ताकत का इस्तेमाल करते हैं तो वह हिंसा कहलाती है और यह नैतिकता की दृष्टि से गलत कहलाएगी, मगर जब यही काम किसी न्याय संगत सबब को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है तो उसका एक नैतिक औचित्य होता है। आप सभी का मानना है कि इस धरती और इस सौरमंडल को चलाने वाला सर्वशक्तिमान कहीं मौजूद है। मैं जानना चाहता हूं कि आखिर वह कहां है? मैं उससे यह पूछना चाहता हूं कि आखिर उसने यह दुनिया क्यों बनाई, जो कि पूरी तरह से दु:खों और परेशानियों से भरी है, जहां पर एक भी इंसान चैन की जिंदगी नहीं जी सकता? समाज को भगवान के अस्तित्व पर वैसे ही सवाल उठाने चाहिए जैसे उसने मूर्ति पूजा और इसी तरह की सीमित अवधारणाओं पर उठाए थे। अगर ऐसा होगा तो इंसान कम-से-कम अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश तो करेगा। यथार्थवादी हो जाने के बाद वह अपनी श्रद्धा व भक्ति को दरकिनार कर विरोधियों का वीरता के साथ मुकाबला कर सकेगा। पुरानी मान्यताओं के सिद्धांतों की आलोचना करना हर उस शख्स के लिए जरूरी है, जो प्रगति के मकसद के लिए खड़ा हुआ है।
शह और मात के खेल में दिग्गी राजा
यह सही है कि कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह अपने भूतपूर्व और अभूतपूर्व राजनैतिक अभिभावक रहे अर्जुन सिंह की हर दशा और दिशा में नकल करने की कोशिश करते हैें लेकिन अपने गुरु जैसा दुस्साहस और प्रतिभा शायद दिग्विजय में उतनी नहीं हैं इसीलिए वे मुसीबतों में इतने फंस जाते हैं कि खुद भूल जाते हैं कि आखिर उनकी असली पॉलिटिक्स क्या है? मध्य प्रदेश में आप किसी भी कांग्रेसी से बात कर लीजिए। वह बगैर एक पल लगाए कहेगा कि ठाकुर दिग्विजय सिंह की शैली में ठाकुर अर्जुन सिंह की छाया और पद्चिन्ह साफ नजर आते हैं। यह बात अलग है कि अर्जुन सिंह हर बार अपने शब्दों पर टिके रहते हैं और दिग्विजय सिंह को करकरे के फोन के विवरण सामने आने के बाद बात बदलनी पड़ती है। करकरे वाले पूरे मामले पर कांग्रेस में आम धारणा यह है कि दिग्विजय सिंह मुस्लिम वोट बैंक के हिसाब से कांग्रेस के मुलायम सिंह यादव बनना चाहते हैं और उनका निशाना चिदंबरम पर हैं। अर्जुन सिंह को अप्रासंगिक मानने वाले भूल जाते हैं कि अर्जुन सिंह ने सीधे प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव से पंजा लड़ाया था। पहले बाबरी मस्जिद को नहीं बचा पाने का सवाल था और अर्जुन सिंह ने मंत्रिमंडल का सदस्य होने के बावजूद इस घटना को पाप बताया था। नरसिंह राव ने ऐलान किया था कि यह उनकी जिंदगी का सबसे दुख का दिन है। यह सब होता रहा था। नरसिंह राव कल्याण सिंह पर इल्जाम लगाते रहे थे कि उत्तर प्रदेश की सरकार ने वायदे तोड़े और विश्वासघात किया। अर्जुन सिंह उनके बयान का मजाक उड़ाते रहे लेकिन दोनों रहे एक ही मंत्रिमंडल मेंं। अर्जुन सिंह ने नरसिंह राव की कांग्रेस तब छोड़ी जब सोनिया गांधी का सवाल आ गया था। दिग्विजय सिंह तो तब भी साथ नहीं थे। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के तौर पर इसके भी दस साल पिछड़े वर्ग के विकास के लिए जब अर्जुन सिंह ने महाजन आयोग बिठाया था तो- शायद 1981 की बात है, उच्च न्यायालय ने आयोग की सिफारिशों पर रोक लगा दी थी। अर्जुन सिंह पर इल्जाम लगाया जाता है कि उन्होंने इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई नहीं लड़ी। मनमोहन सिंह की सरकार सर्वोच्च न्यायालय के कितने फैसलों के खिलाफ लड़ रही है? फिर 1990 में तिवारी कांग्रेस बनाने वाले अर्जुन सिंह 1997 में यानी राव के पराभव के बाद वापस लौट आए थे और उस समय सोनिया गांधी सीताराम केसरी को आदेश देने के हालत में आ गई थी। जहां तक दिग्विजय सिंह की बात है तो अर्जुन सिंह ने तो तेंदू पत्ता नीति बना और लागू कर के लाखों जंगल के मजदूरों का भला किया था लेकिन दिग्विजय सिंह तो ठहाके मारते रहे और ऐलान पर ऐलान करते रहे मगर उनके ऐलानों की असलियत यह थी कि दलित एजेंडा लागू करने के बावजूद दलितों के प्रति उनके ही राजकाज में सबसे ज्यादा अत्याचार हुए और विकास को अपना मूल मंत्र बनाने वाले दिग्विजय सिंह उमा भारती से 2003 में बिजली, सड़क, पानी के मुद्दे पर ही चुनाव हार गए। तब उन्होंने कोई भी राजनैतिक या सरकारी पद नहीं लेने का ऐलान किया था लेकिन कांग्रेस की महासचिव बन गए और चूंकि पार्टी के सच्चे सिपाही हैं इसलिए उन्हें अगर मंत्री बनने के लिए कहा जाएगा तो अपनी कसम भूल जाएंगे। दिग्विजय सिंह वाकई भारतीय राजनीति में अपनी पीढ़ी के सबसे सुदर्शन और सम्मोहक राजनेता हैं लेकिन उनकी राजनीति क्या है यह बताने की तकलीफ उन्होंने कभी नहीं की। वे आजमगढ़ वालों को या उनमें से कुछ को आतंकवादी मानते हैं या नहीं। बाटला हाउस मुठभेड़ के बारे में उनकी क्या राय है? चिदंबरम से उनकी असली शिकायत क्या है? जिनकी उंगली पकड़ कर राजनीति में चलना सीखे थे उन अर्जुन सिंह का खुल कर संकटों में साथ क्यों नहीं दिया? कुल मिला कर सवाल यह है कि दिग्विजय सिंह को साफ करना पड़ेगा कि उनकी राजनीति है क्या? यह सही है कि हेमंत करकरे मध्य प्रदेश के मूल निवासी हैं और इसलिए मध्य प्रदेश के बड़े नेता और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को मृत्यु के दो घंटे पहले उनका फोन किया जाना किसी को अटपटा नहीं लग सकता। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से दिग्विजय सिंह इन दिनों चौकाने वाली और गलत समय पर सही और सही समय पर गलत बात कहने वाले नेताओं में गिने जाने लगे हैं। 26/11 को शहीद हुए हेमंत करकरे के बारे में अचानक दिग्विजय सिंह ने बयान दे दिया कि मरने के दो घंटे पहले जब शायद उन्हें पता नहीं था कि मुंबई पर आतंकवादी हमला बोलने वाले हैं या बोल चुके हैं, श्री करकरे ने उन्हें फोन किया था और कहा था कि चूंकि मालेगांव हादसे की वे जांच कर रहे हैं इसलिए हिंदू आतंकवादी उन्हें लगातार धमकीयां दे रहे हैं और उनसे जान का खतरा है। अभी तक मामला यही बना हुआ है कि हेमंत करकरे पाकिस्तानी आतंकवादियों के हमले को असफल बनाने की कोशिश मे मारे गए। सरकारी रिकॉर्ड में यहीं हैं और मुंबई पुलिस के रिकॉर्ड रूम में भी यही लिखा है। ल्ेकिन एक तो दिग्विजय सिंह ने जो कहा वह कहने में इतनी देर क्यों लगाई और दूसरे जो कहा उसको कहने की जरूरत क्या थी यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है। दिग्विजय सिंह कोई सड़क छाप नेता नहीं हैं और दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। कांग्रेस में भी उन्हें खासा जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन उनकी जिम्मेदारी अचानक उन्हें उलझन मे डाल रही है। सबसे पहले तो दिग्विजय सिंह बाटला हाउस मुंबई मुठभेड़ के शिकारों या कम से कम उसमें शामिल लोगों से मिलने के लिए सरायमीर आजमगढ़ पहुंच और बयान दे डाला कि यहां के लोग निर्दोष हैं। जिस मामले की जांच चल ही रही हो और जिसमें भारत, अमेरिका, पाकिस्तान तीनों शामिल हों तो जाहिर है कि भारत में राज कर रही एक पार्टी के नेता को ऐसा तितर बितर बयान नहीं देना चाहिए। लेकिन दिग्विजय सिंह तो बयान दे चुके थे। कांग्रेस मेें भी बहुत सारे लोग उनकी इस बयानबाजी से नाराज हैं। कांग्रेस को उनका सबसे बड़ा खैरख्वाह साबित करने के लिए दिग्विजय पहले भी सीमाएं तोड़ते रहे हैं। वे बटला हाउस कांड में मारे गए आतंकियों के घरवालों से मिलने न सिर्फ आजमगढ़ गए, बल्कि उनके परिजनों को लेकर गृह मंत्रालय से लेकर कांग्रेस आलाकमान तक पैरवी करते नजर आए। साथ ही संघ परिवार और भाजपा पर हिंदू आतंकवाद के पोषण का आरोप लगाते हुए खूब हमलावर नजर आए। नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक अभियान के मुद्दे पर वह सीधे गृह मंत्री पी. चिदंबरम से टकरा गए। इस मामले में भी पार्टी ने पहले उनके बयान से कन्नी काटी, लेकिन बाद में कांग्रेस अध्यक्ष भी दिग्विजय की लाइन को पुष्ट करती दिखीं। मगर इस दफा मामला ज्यादा ही आगे निकल गया। दिग्विजय की कोशिश तो मुसलिमों के बीच पैठ बनाने की थी, लेकिन मामला कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गया। शहादत पर सियासत के आरोप के साथ-साथ कांग्रेस महासचिव पाकिस्तान को मजबूती देते दिखे। इसका परिणाम यह हुआ कि दिग्विजय को सफाई के लिए मजबूर होना पड़ा। खुद पार्टी ने तीसरी बार दिग्विजय सिंह के किसी भी बयाने से अपने आपको अलग कर लिया है। दिग्विजय ंिसह के विरोधियों का कहना है कि यह बयान श्री सिंह ने आजमगढ़ की अपनी यात्रा के संदर्भ से ध्यान हटाने के लिए दिया हैं और ऐसा इसलिए हुआ है कि वाराणसी के बम विस्फोट में आजमगढ़ के बहुत सारे लोगों के शामिल होने का पता चला है। इसलिए वे एक बड़े दुर्भाग्य को एक छोटे दुर्भाग्य की ओर ले जाना चाहते हैं। लेकिन कांग्रेस आजकल क्षमा दान के मूड में नहीं है। प्रधानमंत्री ने तो इस बार खामोशी रखी लेकिन सोनिया गांधी ने इशारे ही इशारे में कह डाला कि संवदेनशील मुद्दों पर बोलने की निजी तौर पर सबको आजादी हैं लेकिन पार्टी के पदाधिकारियों को पार्टी की इज्जत ध्यान में रखनी चाहिए।
शिव ने हलाहल उगला
एक सूबे के मुख्यमंत्री ने आवाज बुलंद की है। आलोचनाओं से परे होकर मध्यप्रदेश ने हुंकार भरी है। हो सकता है शिव को कहींफिर से इस हलाहल को पीने की जहमत न उठानी पड़े, क्योंकि मंथन की इजाजत वर्तमान तंत्र नहीं देता। बहरहाल, एक यक्ष प्रश्न तो उन्होंने खड़ा कर ही दिया। शिवराज सिंह चौहान ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दो टूक कहा कि देश के ऊपरी सदन को खत्म कर दिया जाना चाहिए। इल्जामात वही उपरोक्त। शिवराज सिंह के इस बयान की भले ही कुछ लोग आलोचना करें लेकिन शिवराज सिंह चौहान ने बहुत सटीक बात कही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधायक निधि को भंग करके ऐसा ही साहसिक और ऐतिहासिक काम किया है। दोहराने की जरूरत नहीं कि भ्रष्टाचार अपने देश के सामाजिक ताने बाने में किस तरह तरह से घुस चुका है। घूस में की गयी चोरी को बाकायदा कमाई कहा जाता है। अंग्रेजों के दौर में संस्था का रूप हासिल करने वाली संस्कृति को आज़ादी के बाद नौकरशाही ने घूस की संस्कृति में बदल दिया। आजादी के संघर्ष में शामिल नेताओं के जाने के बाद जो नेता राजनीति में आये उनके लिए घूस एक मौलिक अधिकार की शक्ल ले चुका था। नेता जब घूसखोर होगा तो अफसरों और सरकारी कर्मचारियों को घूसजीवी बनने से रोक पाना नामुमकिन है। घूस में मिली रकम के बल पर लोग ऐशो आराम की जिंदगी बसर करते हैं और कहीं चूँ नहीं होती। अब तक भ्रष्टाचार वही माना जाता रहा है जो पकड़ लिया जाय और मुकदमा कायम हो जाए। आम तौर पर इन मुकदमों में अभियुक्त बच ही निकलता है। भ्रष्टाचार के कारणों की जांच नहीं की जाती, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। सूबों से आवाजें आनी शुरु हो गई हैं। भोपाल में चुनाव सुधारों के लिए एक बैठक आयोजित की गई थी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने इस मंच से बहुत बुनियादी बात कही। उन्होंने कहा कि संसद का जो ऊपरी सदन है, वह भ्रष्टाचार के लिए आजकल बहुत बड़ी खाद का काम करने लगा है। देखा गया है कि राज्य सभा में अब वे सारे लोग पंहुच रहे हैं जो पैसा देकर टिकट लेते हैं और विधायकों को पैसा देकर उनकी वोट खरीदते हैं। शराब के व्यापारी ,सत्ता के दलाल , अन्य बे-ईमानी का काम करने वाले लोग राज्य सभा में पंहुच रहे हैं और ऐलानियाँ ऐसा काम कर रहे हैं जो किसी भी कीमत पर सही नहीं है। आम आदमी के विरोध में जो भी नीतियाँ बन रही हैं, यह लोग उसे समर्थन दे रहे हैं, लिहाजा राज्य सभा को ही खत्म कर देना चाहिए। जाहिर है कि यह विचार मौलिक परिवर्तन की बात करता है और भ्रष्टाचार के प्रमुख कारणों को दबा देने की ताकत रखता है। इस बात में दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए राजनीतिक पहल के जरूरत है और निहित स्वार्थ वाले उसका पूरी तरह से विरोध करेगें। लेकिन अगर भ्रष्टाचार पर सही तरीके से हमला किया गया तो देश के विकास को बहुत बड़ी शक्ति मिल जाएगी। देश को उसी का इंतजार भी है, क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े लोकत्रांतिक देश भारत को भ्रष्टाचार का घुन लग चुका है। ये घुन दिल्ली की संसद में बैठ कर देश के लिए कानून बनाने वाले सांसदों से होते हुए देश की सबसे छोटी लोकत्रांतिक इकाई ग्राम पंचायत यानि की मिनी संसद तक पहुच चुका है। सांसदों के सारे बुरे गुण प्रधानों ने अपना लिए है। वहां करोड़ों-अरबों का खेल होता है यहाँ लाखों-करोड़ों का हो रहा है। तरीका वही, सलीका वही और भ्रष्टाचार का हौसला भी वही। संसद हो या मिनी संसद दोनों में चुने जाने के हथकंडे भी वही और तरीका सलीका भी वही- शराब, कबाब, शबाब, नोटों की बरसात और वोटो की खरीददारी। सांसद हो या प्रधान दोनों चुनाव आयोग की निर्धारित चुनावी खर्च की सीमा से कई गुना खर्च करते है ंऔर उसे वापस पाने के लिए भ्रष्टाचार की गंगा में गोते लगाते हैं। सांसद निधि बेचता है, संसद में सवाल पूछने के पैसे लेता है, एनजीओ बनाकर करोड़ों बटोरता है तो प्रधान यानि मिनी संसद का मिनी सांसद मिड डे मील चुराता है, नरेगा में घपला करता है, ग्रामीणों को इंदिरा आवास दिलाने में कमीशन खाता है और गाँव की विकास योजनाओं के पैसे को बिना किसी पाचन चूर्ण के पूरा पचाता है। और जो जनता के टैक्स से रोजी रोटी पाते हैं वो जनता के नौकर इन सब पर निगाह रखते हैं। भूखे भेडिय़े की तरह अपना शिकार पचाने के बाद इनके शिकार में से हिस्सा नोंच कर डकार तक नहीं लेते। वहां सीबीआई है, लोकायुक्त है, सतकर्ता आयोग है, संसद की तमाम पैसा उगाहू निगरानी समिति है यहाँ ग्राम सचिव है, खंड विकास अधिकारी है, जिला विकास अधिकारी है, जिला प्रबन्धक है, आर्थिक अपराध शाखा है, घपलों और घोटालों के उजागर मामलो में जाँच के नाम पर सिर्फ हिस्सा बटोरने वाली कई अधिकृत और गैर अधिकृत समितियां और संगठन हैं। दोनों शपथ लेते हैं देश के सविधान की- मैं सच्चे मन से लोकतान्त्रिक गणराज्य भारत के सविधान की रक्षा करते हुए ऐसा कोई कृत्य नहीं करूंगा को सविधान का उल्लंघन करता हो या राष्ट्र की एकता अखंडता नष्ट करता हो। करते क्या है दोनों- एक दिल्ली में बैठ कर संविधान की धज्जियां उड़ाता है तो दूसरा गाँव में बैठ कर दिल्लीवाले का अनुसरण करता है। बोलता है पहले दिल्ली साफ करो।
बेईमान पहाड़ी पर ईमानदार
झूठ के पीछे के सच को अगर बाहर न लाया जाए तो झूठ खतरनाक आकार ले लेता है। सच्चाई का चेहरा विकृत हो जाता है और अराजकता घर करने लगती है। पुरानी कहावत है कि झूठ को अगर लगातार और कई तरीकों से फैलाया जाता है तो वह सच बन जाता है या फिर कम से कम सच को डुबो तो देता ही है। खुद ही ये मान लेना कि आम लोगों के मुद्दों को उठाने वाले लोग भ्रष्ट हैं, हमारे बारे में कई गंभीर पहलुओं की पोल खोलता है। इस विकृति का कुछ लेना-देना हमारी गुलामी के समय से भी है—वह दौर जब हम ईष्र्या, चालाकी, साजिश, चुगली या धोखा, किसी भी तरह से गोरे मालिकों को खुश करने के लिए बैचैन रहते थे। आदर्श भारत का ये विचार कभी कांग्रेस के पुरोधाओं द्वारा रचा गया था लेकिन आज की कांग्रेस से जुड़े दिग्गज शायद इसका मतलब भी भूल चुके हैं। अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं। प्रधानमंत्री को भी कोसने का क्या फायदा। उनके पास जिम्मेदारी तो है पर शक्तियां नहीं। बेईमानी के पहाड़ की चोटी पर बैठा ईमानदार व्यक्ति। कांग्रेस के उन बड़े रणनीतिकारों पर नजर डालते हैं जो खुद तो कोई चुनाव नहीं जीत सकते मगर कईयों को चुनाव जितवाने के रहस्य जानते हैं। वास्तविकता ये है कि कांग्रेस को आज कुछ ऐसे छुटभैये रणनीतिकार चला रहे हैं जो ये भूल चुके हैं कि सही कदम उठाना क्या होता है। उनके पास न तो इतिहास के अनुभवों का प्रकाश है और न ही भविष्य के लिए दृष्टि। वे यह देख पाने में असमर्थ हैं कि एक जमाने में महान विभूतियों ने धर्म, जाति, भाषा, नस्ल आदि जैसी खाइयों को पाटते हुए इस देश के विचार को शक्ल दी थी। मूर्खतापूर्ण तरीके से वे अब इन्हीं दरारों को फिर से उभार रहे हैं। वे उन संकटों को देख पाने में असमर्थ हैं जो इसके परिणामस्वरूप सामने आएंगे। उन्हें ये नहीं पता कि राजनीति में नैतिकता को हथियार कैसे बनाया जा सकता है और उनमें नैतिकता के रास्ते पर चलने की हिम्मत भी नहीं है। ये लोग और कुछ नहीं ज्यादा से ज्यादा बस चुनावों में वोटों की तिकड़म भिड़ाने वाले एकाउंटेंट हैं जो चुनावी लाभ और हानि के बीच झूला झूलते रहते हैं। आखिर कब तक आकंठ पैसे में डूबे हुए और भूख से मर रहे लोग बगैर टकराव के साथ-साथ रह सकते हैं।
लिटमस पर लोकतंत्र
संसद का पूरा शीतकालीन सत्र सत्तापक्ष-विपक्ष के अडिय़ल रवैये का शिकार हो गया। इससे अधिक खेदजनक और क्या हो सकता है कि जो संसद सिर्फ विचार-विमर्श के लिए जानी जाती हो वहां सत्तापक्ष-विपक्ष में संवाद के नाम पर सिर्फ तकरार हुई। शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन तो ऐसी स्थिति बनी कि दोनों पक्षों के पास एक-दूसरे के लिए कुछ कहने को ही नहीं था। यह सत्र जिस तरह समाप्त हुआ वह एक प्रकार से संसदीय व्यवस्था की पराजय का सूचक है। संविधान क्या इसकी इजाजत देता है। क्या देश की जनता ने इसी उम्मीद को लेकर जनप्रतिनिधियों को वहां तक पहुंचाया। लोग नहीं बदलना चाहते, सुुविधा के लिए तंत्र को बद देना चाहते हैं। ऐसे लोगों के भरोसे संविधान की गरिमा कब तक अक्षुण्ण है? क्या डॉ. बाबा साहब आंबेडकर द्वारा रचित भारत का संविधान साठ वर्ष उपरान्त इतना कमजोर हो गया है कि उसे पूर्ण कायाकल्प कर बदल दिया जाये? क्या वह संविधान सभा जिसकी अध्यक्षता डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे व्यक्तित्व ने की हो आज के राजनेताओं और नौकरशाहों के द्वारा पुनरीक्षण या बदलाव के योग्य है ? आजादी के इतने लंबे समय के बाद देश में कई क्षेत्रों में बदलाव की बयार चली है, जिसमें हमारी संस्कृति, वेश-भूषा, रहन-सहन, पाठन-पठन मे काफी तब्दीली आ चुकी है पर शायद संविधान कोई वस्त्र, भोजन या संस्कृति नहीं है जिसे आसानी से या कठिनाई से बदला जा सके। वस्तुत: हमारा संविधान हमारी आत्मा है जिसने इतनी विषमताओं से जूझने के बाद बड़ी मजबूती से भारत में लोकतन्त्र को जिन्दा रखा है और अब शायद यह लोकतन्त्र परिपक्वहो चुका है। यदि हम अपने लोकतन्त्र की तुलना अपने पड़ोसी देशों के साथ करें। फिर चाहे वह पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका या नेपाल हो, इन सब स्थानों पर लोकतन्त्र में लोक का तन्त्र से संघर्ष सबके सामने है । इस संविधान परिवर्तन की चर्चा में सकारात्मक एवं सार्थक क्या हो सकता है? यदि इस दिशा में सोचा जाये तो बहुत कुछ सम्भव है । ऐसा कहा जाता है कि लोकतन्त्र या गणतन्त्र जनता का, जनता द्वारा एवं जनता के लिये है । सवाल यह है कि क्या सही मायनों में ऐसा ही है? यद्यपि हम विश्व के सबसे सफल गणतान्त्रिक राष्ट्रों में शामिल हैं किन्तु कमी सिर्फ है तो इस गणतन्त्र को पूर्ण रूप से जनहित में बदलने की और यदि कहीं भी किसी बदलाव की आवश्यकता है तो वह इस संविधान को पालन करने और कराने की व्यवस्थाओं में बदलाव की है। जिस भावना और सोच के साथ डॉ. आंबेडकर जैसे विद्वान लोगों ने इसका मसौदा तैयार किया था, वैसी व्यवस्था दुर्भाग्यपूर्णरूप से आज तक इस देश मे नहीं बन पायी है। आज भी इस देश का आदमी रोजी-रोटी और रहने-पहनने की बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। सबसे पहले परिवर्तन या बदलाव उस व्यवस्था में हो जो आम आदमी के हित का दिखावा कर उसे परेशान कर रही हैं । भ्रष्टाचार आज शिष्टाचार का रूप ले चुका है । वहीं इस लोकतन्त्र पर राजनेता और अफसरशाही सवार हैं, जिन्होंने आम जनता के अधिकारों को कुचल डाला है । और सच यह है जिसे हमें स्वीकार करना चाहिये कि देश का सबसे कमजोर व्यक्ति वह चाहे किसी भी समाज या जाति का हो, इस संविधान से उत्पन्न विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के द्वारा छला एवं ठगा जा रहा है और यह सब उस सड़ी-गली और गन्दी व्यवस्था के मजबूत अंग हैं जो अब भ्रष्ट लोगों के आगे लचर एवं लाचार हो चुकी है । यदि कोई बदलाव करना है तो सबसे पहले उस अफसरशाही पर करें जो आज भी अंग्रेजों की मानसिकता से ग्रसित है और वह अपने आपको इस देश का मालिक मानती है और देश की जनता को गुलामों का दर्जा देकर रखा है। संविधान की जनकल्याण की मूल भावना में सबसे बड़ा रोड़ा यह लालफीताशाही ही है, जिसने कई बार जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधियों को भी निकम्मा और नकारा साबित कर दिया है। ऐसा ही कुछ हाल हमारी पुलिस व्यवस्था का भी है जो जनता की रक्षक नहीं भक्षक बन चुकी है । इसी क्रम में हमारी न्यायपालिका भी है । जहां आज कोर्ट में जज के सामने बैठा उसका मातहत कर्मचारी खुलेआम रिश्वत लेकर अगली तारीख देता हो ऐसी न्यायपालिका से इंसाफ की क्या उम्मीद की जा सकती है। ऐसा ही सब कुछ तहसील, नजूल, बिजली, अस्पताल, सिंचाई, सड़क और अनगिनत जगह है । तो हमें देश के इस भ्रष्ट चरित्र को बदलने की आवश्यकता है, ना कि अपने संविधान को।भारतीय लोकतंत्र ने स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारंभिक वर्षो में विश्व भर में अपनी गहरी होती जड़ों के लिए प्रशंसा प्राप्त की थी। तब स्वतंत्रता सग्राम के तपे और त्यागी व्यक्तित्व के मनीषी राजनीति में प्रवाह की निरंतरता में आए और उन्होंने अपने सिद्धांत तथा मूल्य नहीं बदले। जवाहरलाल नेहरू का इस सबमें महत्वपूर्ण योगदान था। उनके अनेक निर्णयों तथा नीतियों के आलोचक भी इसे स्वीकार करते हैं। उन्होंने प्रधानमत्री पद की गरिमा स्थापित करने में कोई कसर नहीं रखी। इधर वर्तमान प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व के अनेक पक्षों की सराहना करने वाले बड़ी दुविधा में रहे हैं। देश की बागडोर हाथ में रखने वाले व्यक्ति की अपनी ईमानदारी ही क्या उसकी श्रेष्ठता का मापदंड बन सकती हैं? क्या वह बड़े-बड़े घोटालों, जनता के कोष का अपव्यय तथा पद के अधिकारों, कर्तव्यों तथा गरिमा से रंच मात्र भी समझौता कर सकता है? आज सविधान के वायदों और निहितार्थो तथा प्रजातंत्र की वास्तविकताओं तथा व्यवहार में जो अंतर भयावह रूप से हर भारतीय के सामने आकर खड़ा हो गया है उससे अब और आख मूंदना देश के लिए घातक होगा। जब देश राष्ट्रमडल खेल, आदर्श सोसाइटी, टेलीकॉम घोटाले पर सारा ध्यान केंद्रित करता है तब वास्तविक राष्ट्रीय प्राथमिकताएं कहीं दूर पीछे छूट जाती हैं। भूखे लोग, कुपोषित बच्चे, कागजों पर चलते स्कूल, जबर्दस्त धन उगाहते प्राइवेट सस्थान आखिर प्राथमिकता सूची में कहां है? 60 प्रतिशत युवा विदेश जाकर शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में आने के आमत्रण दिए जा रहे हैं। हमारे अपने विश्वविद्यालयों की स्थिति में सुधार की केवल घोषणाएं होती हैं। 15-20 प्रतिशत भारतीयों, बच्चों तथा युवाओं के लिए इंडिया शाइनिग, इमर्जिग इंडिया, इकनामिक पावर इंडिया जैसे जुमले सार्थक है। बाकी के लिए योजनाएं, घोषणाएं तथा वायदे हैं। इस स्थिति का घोटालों, भ्रष्टाचार तथा कदाचार से कितना संबंध है या नहीं है, इस पर चर्चा देश भर में आवश्यक है। सवाल है कि क्या सत्ता में बने रहने के लिए प्रजातंत्र के नाम पर सिद्धांतों, मूल्यों तथा सामान्यजन की अपेक्षाओं को नजरअंदाज करना स्वीकार्य हो सकता है? पिछले दशकों में जो कुछ हुआ है उसका प्रभाव कहा-कहा नहीं पड़ा है? उसका प्रभाव व्यवस्था के हर अंग पर पड़ा है, हर व्यक्ति पर पड़ा है और इस सबसे अधिक चिंताजनक है कि इसका प्रभाव स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में बच्चों तथा युवाओं पर पड़ा है। वहा की कार्यसंस्कृति बदल गई है, मानवीय मूल्यों की आवश्यकता पर जोर कम हुआ है। उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों को लोग कई बार अपना नायक मान लेते हैं। जब वे नई पीढ़ी के प्रति अपने कर्तव्यों के पालन में कोताही बरतते हैं, पद पर अशोभनीय कृत्य करते हैं तब नई पीढ़ी की राह कठिन हो जाती है। उन्हें ऐसा क्षेत्र तथा व्यक्ति ढूंढने में कठिनाई होती जिसको वह अनुकरणीय मानें। वे यह भी जानते हैं कि व्यवस्था में कोई काम कराना हो या उसका अंग बनना हो तो बीच में इतने गति अवरोधक आते हैं कि उन्हें पार करने के लिए उन तत्वों की शरण में जान पड़ता है जहा मानवीयता तथा मानव मूल्यों का कोई महत्व नहीं होता है। आज देश के सामने एक अभूतपूर्व अवसर आया है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध इतना देशव्यापी आक्रोश तथा व्यक्त आक्रोश पहले कभी नहीं देखा गया। इस भ्रष्टाचार का उन्मूलन करने में कठिन से कठिन कदम उठाने का साहस दिखाने का समय आ गया है। लोग उस व्यक्ति के साथ खड़े होने को उत्सुक तथा तैयार हैं जो यह साहस दिखा सकें।
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