शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

अखंड एहसानों के इजहार का त्योहार

इसे आप अप्रैल फूल का मज़ाक कतई न समझें। तो ध्यान से सुनिए- यह त्योहार उस महान शैतान के प्रति आदमजात के अखंड एहसानों के इजहार का त्योहार है, जिस दिन उसने स्वर्ग के इकलौते आदमी और औरत को वर्जित सेव खिलाने का धार्मिक कार्य किया था। वह एक अप्रैल का ऐतिहासिक दिन था। जब सेव का मज़ा चखने के जुर्म में इस जोड़े को तड़ीपार के गौरवपूर्ण अपमान से सम्मानित करके ईश्वर ने दुनिया में धकेल दिया था। न शैतान सेव खिलाता न दुनिया बसती। मनुष्य जाति को बेवकूफ बनाने के धारावाहिक सीरियल का ये सबसे पहला एपीसोड था। आज भी धारावाहिकों के जरिए आदमी को बेवकूफ बनाने का ललित लाघव पूरी शान से जारी है। सारी दुनिया उस शैतान की एहसानमंद है जिसके एक ज़रा से मजाक ने सदियों से वीरान पड़ी दुनिया बसा दी। ज़रा सोचिए अगर ये दुनिया नहीं बसती तो आज के प्रॉपर्टी डीलरों की मौलिक प्रजाति तो अप्रकाशित ही रह जाती। इसीलिए शैतान और शैतानी को जितने पवित्र मन से यह लोग सम्मानित करते हैं, दुनिया में और कोई नहीं करता। ये दुनिया एक शैतान की शैतानी का दिलचस्प कारनामा है। जहां चोर है, सिपाही है। मुहब्बत है, लड़ाई है। बजट है, मंहगाई है। इश्क है, रुसवाई है। नेता है, झंडे हैं। मंदिर हैं, पंडे हैं। तिजोरी है, माल है। ये सब अप्रैल फूल का कमाल है। दुनिया वो भी इतनी हसीन और नमकीन कि देवता भी स्वर्ग से एलटीए लेकर धरती पर पिकनिक मनाने की जुगत भिड़ाते हैं। और अपनी लीलाओं से मानवों को अप्रैल फूल बनाते हैं, कभी-कभी खु़द भी बन जाते हैं। विद्वानों का तो यहां तक मानना है कि देवता इस धरती पर आते ही लोगों को अप्रैल फूल बनाने के लिए हैं, क्योंकि स्वर्ग में इसका दस्तूर है ही नहीं। यह तो पृथ्वीवासियों की ही सांस्कृतिक लग्जरी है। जो शैतान के सेव की सेवा से आदम जात को हासिल हुई है। देवता इसे मनाने के लिए अलग-अलग डिजायन के बहुरूपिया रूप धरते हैं। वामन का रूप धर के तीन पगों में तीन लोकों को नापकर राजा बली को बली का बकरा मिस्टर विष्णु ने पहली अप्रैल को ही बनाया था। अप्रैल फूल बनाने का चस्का फिर तो इन महाशयजी को ऐसा लगा कि अगले साल मोहनीरूप धर के भस्मासुर नाम के किसी शरीफ माफिया का बैंड बजा आए। तो किसी साल शेर और आदमी का टू-इन-वन मेकअप करके हरिण्यकश्यपु नामक अभूतपूर्व डॉन को भूतपूर्व बना आए। अप्रैल फूल की विष्णुजी की इस सनसनाती मस्ती को देखकर अपने जी स्पेक्ट्रमवाले राजा नहीं, सचमुच के स्वर्ग के, सच्चीमुच्ची के राजा इंद्र का भी मन ललचा उठा। इंद्रासन छोड़कर, सारे बंधन तोड़कर पहुंच गए मुर्गा बनकर गौतम ऋषि के आश्रम पर। ऐसी कुंकड़ूं-कूं करी कि भरी रात में ही अपने अंडर गारमेंट्स लिए बाबा गौतम पहुंच गए नदी पर नहाने। वहां आदमी-ना-आदमी की जात। समझ गए कि किसी ने अप्रैल फूल बना दिया है। मुंह फुलाए घर पहुंचे तो अपने डमी-डुप्लीकेट को बेडरूम से खिसकते पाया। अप्रैल फूल बनने की खुंदक शाप देकर वाइफ पर उतारी। शिला बन गई बेचारी। जब दैत्यों को भनक लगी कि स्वर्ग से आकर देवता अप्रैल फूल- अप्रैल फूल खेल रहे हैं तो उन्होंने भी देवताओं को अप्रैल फूल बनाने की ठान ली। सोने का हिरण बनकर, अपने पीछे दौड़ाकर जहां मारीचि ने श्रीयुत रामचंद्र रघुवंशीजी को अप्रैल फूल बना दिया, वहीं रावण ने साधु का वेश धारण कर सीताजी को लक्ष्मण-रेखा लंघवाकर हस्बैंड-वाइफ दोनों को अप्रैल फूल बना डाला। ये त्योहार है ही ऐसा। देवता और दैत्य सब एक-दूसरे से मज़ाक कर लेते हैं। फर्श ऐसा लगे जैसे पानी का सरोवर। महाभारत काल में ऐसे ही स्पेशल डिजायन के महल में दुर्योधन को बुलाकर द्रौपदी ने उसे अप्रैल फूल बनाया था। मगर दुर्योधन हाई-ब्ल्ड-प्रेशर का मरीज था। मज़ाक में भी खुंदक खा गया। और उसने अगले साल चीर हरण के सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिए द्रौपदी को अप्रैल फूल बनाने की रोमांचक प्रतिज्ञा कर डाली। मगर द्रौपदी के बाल सखा मथुरावासी श्रीकृष्ण यादवजी को भनक लग गई। ऐन टाइम पर साड़ी का ओवर टाइम उत्पादन कर के उन्होंने कौरवों की पूरी फेमिली को ही अप्रैल फूल बना दिया। मज़ाक को मजाक की तरह ही लेना चाहिए। अब हमारे नेताओं को ही लीजिए। पूरे पांच साल तक जनता को अप्रैल फूल बनाते हैं। कभी मूड में आकर कहते हैं कि हम भ्रष्टाचार मिटा देंगे। जनता तारीफ करती है। कि नेताजी का क्या गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर है। फिर नेताजी भ्रष्टाचार, घोटाले में फंस जाते हैं। जनता हंसती है- अब नेताजी कुछ दिन सीबीआई-सीबीआई खेलेंगे। हाईकमान ने तो क्लीनचिट देने के बाद ही घोटाला करवाया है, नेताजी से। सब अप्रैल फूल का मामला है। इसका अंदाज ही निराला है। पूरा जी स्पैक्ट्रमवाला है। कसम, कॉमनवेल्थ गेम की। हम सब भारतवासी खेल के नाम पर भी खेल कर जाने वाले खिलाड़ियों के खेल को भी खेल भावना से ही लेते हैं। अप्रैल फूल त्योहार की अपनी अलग कूटभाषा है। जिसने बना दिया वो सिकंदर जो बन गया वो तमाशा है। अप्रैल फूल, मूर्ख बनाने का मुबारक जलसा, जो भारत से ही दुनिया के दूसरे देशों में एक्सपोर्ट हुआ है। हमारे आगे टिकने की किसमें दम है। न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में दोपहर के १२ बजे तक ही अप्रैल फूल का मजाक चलता है। फ्रांस, अमेरिका, आयरलैंड, इटली, दक्षिण कोरिया, जापान, रूस, कनाडा और जर्मनी में यह पूरे दिन चलता है। मगर हमारे देश में यह मज़ाक जीवन पर्यंत चलता है। अप्रैल फूल के मजाक को याद करके हम भारतवासी मरणोपरांत भी हंसते रहते हैं। और जबतक ज़िंदा रहते हैं नमक और मिर्च को बांहों में बांहें डाले अपने ही जख्म के रेंप पर डांस करता देखकर बिलबिलाकर उनके साथ भरतनाट्यम करते हुए अप्रैल फूल –जैसे प्राचीन पर्व की आन-बान-शान को हम ही बरकरार रखते हैं। अप्रैल फूल त्योहार का कच्चा माल हम भारतीय ही हैं। अप्रैल फूल मनाने का ग्लोबल कॉपीराइट भारतीयों के ही पास है। क्योंकि सबसे पहले अप्रैल फूल बननेवाले इस दुनिया में ही नहीं जन्नत में भी हम भारतीय ही थे। शैतान के सेव के सनातन सेवक। वसुधैव कुटुंबकम.. सारी दुनिया हमारी ही फेमली है। और अप्रैल फूल हमारा ही फेमिली फेस्टिवल है।

शनिवार, 26 मार्च 2011

अलग-अलग तराजू क्यों

आजकल पूरा देश बेहिसाब भ्रष्टाचार से रूबरू है। सीजन की शुरुआत कॉमनवेल्थ गेम्स से हुई। इसके बाद 2 जी स्पेक्ट्रम, कर्नाटक का नाटक, आदर्श सोसायटी विवाद और अब एकदम ताजा विवाद चीफ विजिलेंस कमिश्नर थॉमस की नियुक्ति का है। अगर इन मुद्दों को एक साथ देखा जाए, तो साफ दिखता है कि समाज के हर वर्ग के लोग-राजनेता, ब्यूरोक्रेट्स, न्यूज मीडिया, जुडिशरी और उद्योगपति कमजोरियों से ग्रस्त हैं। टीका-टिप्पणी, आलोचना और बहसबाजी से पहले यह तय कर लिया जाए कि हम इस दौरान पक्षपात नहीं करेंगे। देखा यह जाता है कि हम अलग-अलग प्रफेशन के लोगों के लिए अलग-अलग नैतिक मूल्य निर्धारित करते हैं और उन्हें उसी हिसाब से अलग-अलग तराजू में तौलते हैं। हमारे तंत्र में पारदर्शिता लाने की राह में न केवल यह सबसे बड़ा रोड़ा है बल्कि हमारे लोकतंत्र के भविष्य के लिए भी यह बेहद खतरनाक है। पीजे थॉमस की नियुक्ति पर विवाद के विश्लेषण के समय एक अघोषित नियम जो देखा गया, वह था 'तब तक दोषी जब तक कि निर्दोष सिद्ध न हो।' इसी तरह सुरेश कलमाड़ी को भी लगातार राष्ट्रीय न्यूज चैनलों पर 'स्कैमस्टर' कहा जाता रहा, वह भी तब जबकि उन पर आरोप साबित नहीं हुए थे। सामाजिक जीवन में होने के नाते मैं यह मानता हूं कि दूसरों के मुकाबले हमारे प्रफेशन के लोगों से हाई मोरल वैल्यू की अपेक्षा की जाती है। दुनिया भर में यही होता है। लेकिन, जब 2 जी स्कैम में सरकारी खजाने को लाखों करोड़ों का चूना लगाने वाले बड़े बिजनेस हाउसों की जांच हो रही है, तो उन्हीं न्यूज चैनलों ने नैतिकता के दूसरे मानदंड अपनाए - 'तब तक निर्दोष जब तक कि दोष साबित न हो।' 2 जी के परिप्रेक्ष्य में देखें तो एक लॉबिस्ट की टेलिफोनिक बातचीत के सरकारी रेकॉर्ड के जाहिर होने से पता चला कि अनेक जर्नलिस्ट और संपादक उद्योगपति और राजनेताओं की तरह ही हैं। इससे ऐसे व्यवसाय की क्रेडिबिलिटी कम हुई जिससे निष्पक्ष होकर काम करने की अपेक्षा की जाती है। इस मुद्दे को उठाकर इसे एक सही नतीजे तक लाना मीडिया की जिम्मेदारी थी, लेकिन उन चैनलों ने मुद्दे को हलका बना दिया और धीरे-धीरे यह आम जनता के जेहन से उतर गया। हाल में दुनिया के अग्रणी बिजनेस कंसल्टेंट और मैकिंजे एंड मैकिंजे के पूर्व प्रमुख रजत गुप्ता को इनसाइडर ट्रेडिंग का आरोपी पाया गया। इस मुद्दे पर कॉरपोरेट जगत ने गुप्ता को नैतिक मूल्यों के अलग तराजू में तौलकर उनका बचाव किया और उन्हें निर्दोष घोषित किया जबकि जांच अभी जारी है। 2 जी स्कैम में फंसे कुछ उद्योगपतियों के मामले में भी कॉरपोरेट जगत का रवैया कुछ ऐसा था - ' सीबीआई जांच से भारत का व्यावसायिक वातावरण खराब हो रहा है। ' मैं जनता का पैसा हड़पने वाले किसी राजनेता या बाबू का बचाव नहीं कर रहा , लेकिन मुझे शिकायत है कि प्राइवेट सेक्टर और मीडिया ( जो कि स्वयं प्राइवेट सेक्टर का हिस्सा है ) भ्रष्टाचार के विश्लेषण के लिए अलग - अलग मानदंड रखता है। एक देश होने के नाते , अगर हम भ्रष्टाचार से लड़ने और इसका खात्मा करने के प्रति वास्तव में गंभीर हैं तो हमें अपने आप से यह वादा करना होगा कि हम अपनी आलोचना , जांच और अंतत : सजा में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करेंगे। कंगारू कोर्ट और ' बनाना रिपब्लिक ' जैसे जुमले असफल संस्थानों ( कई बार देशों के लिए भी ) के लिए प्रयोग किए जाते रहे हैं , जहां के कानून और नियम वहां के ताकतवर लोग अपने हिसाब से तय करते हैं। लेकिन हम उनसे अलग हैं। हममें से हर एक के पास वह ताकत है जो रोजमर्रा की जिंदगी में घुस आए भ्रष्टाचार से लड़ सके। घूस देना या ' चलता है ' का भाव रखना एक देश की सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन करना है। भारत को हमेशा सिद्धांतों और न्याय का देश माना जाता रहा है। यह हमारे हित में है कि हम देश की जड़ों में बसे इन मूल्यों का ह्रास न होने दें।

काफिला कहा लुटा"...

आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ. सुषमा जी ने प्रधानमंत्री की तरफ निशाना साधते हुए मन को मोहने वाले मनमोहन सिंह से कुछ शायराना अंदाज़ में मुखातिब हुईं....और .और एक सवालिया शेर मनमोहन की तरफ उछल दिया. मजमून कुछ इस तरह का था "तू इधर-उधर की ना बात कर, बता की काफिला कहा लुटा"...और बहस का सिलसिला आगे बढ़ चला...एक-एक वक्‍तव्‍यों पर हमारे टीवी चैनल ब्रेकिंग न्यूज़ की बड़ी बड़ी प्लेट चला रहे थे. हर वक्‍तव्‍य पर मीडिया कुछ इस तरह रियेक्‍ट कर रही थी जैसे आरोप-प्रत्यारोप के बदले संसद में मिसाइल चल रहे हों.
खैर, ये तो मीडिया वालों की मजबूरी है. टीआरपी लानी है, चैनल के मालिक को दिखाना है की जी हम नंबर 1 हैं. खैर बहस का सिलसिला आगे बढ़ता गया और बारी आई देश के सबसे भोले भाले सरदार की, जिन्हें कुछ पता नहीं होता. आज वो भी कुछ रंग में थे. मिजाज़ उनका भी शायराना था. सुषमा जी तरफ मुखातिब होते हुए उन्होंने ने भी कुछ इस तरह एक शेर दगा... माना की तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं....पर तू मेरा शौख देख, मेरा इंतज़ार तो कर... इकबाल की लिखी ये पंक्तियां शायद मनमोहन जी को किसी ने लिख कर दिया होगा. खूब तालियाँ बजी. हर खबरिया चैनल में जैसे भूचाल आ गया. भागम दौड़ मच गई, संपादक से ले कर ट्रेनी तक सरदार की पढ़ी इस शेर पर अपने विचार और उदगार व्यक्त करने लगे.
देश की भोली भाली जनता को इस शेर के मायने समझाने लगे. भोली-भली जनता टीवी से नज़र गड़ाए टीवी पर ज्ञान बांटते तथाकथित पत्रकारों के ज्ञान सुनती रही और टीवी वालों को टीआरपी मिलती रही. पूरे दिन हंगामा चलता रहा पर किसी भी देशभक्त चैनल को ये याद नहीं आया कि आज शहीद दिवस है और आज के ही दिन आज़ादी के दीवाने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने देश पर अपनी जान कुर्बान कर दी थी, लेकिन आज उसी देश में अपने को पत्रकार और विद्वान कहलाने वाले बेशर्मी की हदें पार कर रहे थे. जहां बेहूदे शेरो-शायरी के लिए उनके पास वक़्त ही वक़्त था, वहीं आज़ादी के दीवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए उन के पास चंद लम्हें भी नहीं थे. शर्म आती है इस देश के नेताओं और चमचे पत्रकारों पर

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

धृतराष्ट्र अभी जिंदा हैं

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज दुहाई देते फिर रहे हैं कि भ्रष्टाचार के कारण भारत की छवि को नुकसान पहुंचा है। मगर, राजा पर आरोपों की बौछारें होती रहीं और बिना रीढ़ के समझे जाने वाले देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह इतना साहस नहीं जुटा सके कि वे राजा से तत्काल त्यागपत्र मांगकर उन्हें सीखचों के पीछे भेज सकें। यक्ष प्रश्न तो यह है कि अगर एक सौ छियत्तर लाख करोड़ रूपए का नंगा नाच नाचा गया तो वह पैसा गया कहां? राडिया मामले में अनेक मंत्रियों की गर्दन नपना अभी बाकी है। यही आलम कामन वेल्थ गेम्स का रहा। प्रधानमंत्री डॉ. सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की आंखों के सामने जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को हवा में उड़ा दिया गया, और ये दोनों चुपचाप ही बैठकर जनता के पैसे पर डलते डाके को देखते रहे। अनेक आरोप तो सोनिया गांधी के इटली वाले परिवार पर भी लगे हैं। राजा की गिरफ्तारी भारतीय लोकतंत्र के नस - नस में समाये भ्रष्टाचार की अमर बेल को को उखाड़ फेंकने का काम नहीं कर सकती, इस पूरे मामले में ईमानदार कार्रवाई तभी मानी जाएगी, जब उनको भी सजा मिले जिन्होंने इस महाघोटाले को अंजाम देने के लिए राजा की ताजपोशी का मार्ग प्रशस्त किया था। इस पूरे घोटाले ने एक बात और साबित कर ही दी है कि देश में बिना मीडिया के सहयोग के किसी भी बड़े घोटाले को सरंजाम दिया जाना संभव नहीं है, ये बात दीगर है कि बेहद कमजोर आत्मबल वाली सरकार और पैसा कमाने के लिए नंगई पर उतर चुके कार्पोरेट अखबारों और चैनलों के लिए मीडिया के इन चौधरियों के खिलाफ हल्ला बोलना बेहद कठिन है। पर क्या आगे यह संभव है? शायद हां।
नौकरशाहों ने पल्ला झाड़ा ---------
22, 000 हजार करोड़ का अनुमानित घाटा नौकरशाह अपना पिंड छुड़ाने में लग गए हैं। पूर्व टेलीकॉम सचिव सिद्धार्थ बेहुरा ने खुलासा किया कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में मंत्री के आदेश का पालन किया गया। बेहुरा ने बताया है कि वे लोग पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए. राजा के आदेश का पालन करते थे। दूसरी तरफ ए. राजा के वकील ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनके मुताबिक राजा और उनके दो सहयोगी ही नहीं बल्कि कई अन्य भी इस घोटाले में शामिल हैं। इस बीच, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के विशेष न्यायाधीश ओ.पी. सैनी ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ अभियोग है कि उन्होंने स्पेक्ट्रम लाइसेंस जारी करने के दौरान नियमों और प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया, जिसकी वजह से सरकार को 22 हजार करोड़ रूपये का अनुमानित घाटा हुआ। उन्होंने कहा कि तीनों आरोपियों के खिलाफ गंभीर मामले हैं। जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने 2जी आवंटन मसले पर याचिका दाखिल कर राजा को आरोपी बनाया था जिसे अब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला कहा जाता है। इस मसले पर सर्वोच्च न्यायालय में अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी। सर्वोच्च न्यायालय स्वयं इस मामले की जांच की निगरानी कर रहा है, जिसकी जांच कई एजेंसियां कर रही हैं. इस मामले में न्यायालय ने सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय से 10 फरवरी तक अपनी रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। हो न जाए कहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत में भी बगावत - अस्सी के दशक के उपरांत भारत गणराज्य में भ्रष्टाचार की जड़ें तेजी से पनपना आरंभ हुईं थीं। तीस सालों में भ्रष्टाचार का यह बट वृक्ष इतना घना हो चुका है कि इसकी छांव में नौकरशाह, जनसेवक और मीडिया के सरपरस्त सुकून की सांसे ले रहे हैं, किन्तु आम जनता की सांसे इस पेड़ के नीचे सूरज की रोशनी न पहुंच पाने के कारण मचे दलदल में अवरूद्ध हुए बिना नहीं हैं। भारत गणराज्य के अब तक के सबसे बड़े घोटाले अर्थात 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मुख्य आरोपी अदिमुत्थू राजा को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने तेरह महीने की लंबी मशक्कत और खोज के बाद गिरफ्तार कर लिया। राजा के खिलाफ सीबीआई ने 21अक्टूबर 2009 को 2जी मामले में जांच के लिए मामला दर्ज किया था। इसके बाद सहयोगी दलों के दबाव के चलते कांग्रेस नीत केंद्र सरकार ने इस मामले की फाईल को लटका कर रखा। विपक्ष ने जब संसद नहीं चलने दी तब कांग्रेस को होश आया और बजट सत्र में फजीहत से बचने के लिए सरकार ने सीबीआई को इशारा किया और तब जाकर कहीं राजा को सीखचों के पीछे ले जाया जा सका। तब से अब तक -टेलीकाम सहित सारे के सारे घपले घोटालों को इतिहास की पाठ्यपुस्तक के अध्याय के तौर पर ही समझा जाए। द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) कोटे के मंत्री दयानिधि मारन के त्यागपत्र के उपरांत 16 मई 2007 आदिमत्थू राजा को वन एवं पर्यावरण से हटाकर संचार मंत्री बना दिया गया। 25 अक्टूबर 2007 को केंद्र ने मोबाईल सेवाओं के लिए 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया। इसके उपरांत 15 नवंबर 2008 को तत्कालीन केंद्रीय सतर्कता आयुक्त प्रत्युष सिन्हा ने अपनी आरंभिक रिपोर्ट में इसमें अनेक खामियों का हवाला देतेह हुए दूरसंचार अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने की अनुशंसा की थी। जब घोटाला हुआ तब केंद्र की सरकार चिर निंद्रा में लीन थी। इसके बाद बरास्ता नीरा राडिया यह घोटाला प्रकाश में आया। 21 अक्टूबर 2009 को सीबीआई ने टूजी स्पेक्ट्रम मामले में जांच के लिए मामला दर्ज कर लिया। इसके अगले ही दिन 22 अक्टूबर को सीबीआई ने दूरसंचार महकमे के कार्यालयों पर छापामारी की। इसके एक साल बाद 17 अक्टूबर 2010 को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने दूरसंचार विभाग को अनेक नीतियों के उल्लंघन का दोषी पाया। नवंबर 2010 में विपक्ष ने एकजुट होकर दूरसंचार मंत्री ए.राजा को हटाने की मांग कर डाली। चारों ओर से दबाव में आई केंद्र सरकार को मजबूरन 14 नवंबर को राजा का त्यागपत्र मांगना ही पड़ा। 15 नवंबर को संचार मंत्रालय का कार्यभार कपिल सिब्बल को सौंप दिया गया। मुंह क्यों नहीं छिपाते - जब कामन वेल्थ गेम्स आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी पर आरोप लगे तो उन्होंने सरकार को हड़काया कि हमाम में वे अकेले नंगे नहीं हैं। फिर क्या था, कलमाड़ी पर शिकंजा ढीला कर दिया गया। आदर्श हाउसिंग सोसायटी में नाम आने के बाद भी विलासराव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे को सोनिया गांधी ने ए रैंक दिया है, जो आश्चर्यजनक है। सरकार में मंत्रियों के बड़बोलेपन का आलम यह रहा कि संचार मंत्रालय का भार संभालते ही मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने तो सरकार के अब तक निष्पक्ष रहे आडीटर कैग की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा डाले। देशवासी सकते में थे, कि आखिर हो क्या रहा है? क्या सरकारी तंत्र में खोट है या सरकार चलाने वाले नुमाईंदों की नजरों में? अंतत: राजा की गिरफ्तारी ने दूध का दूध पानी का पानी कर दिया। अब सिब्बल मुंह छुपाते घूम रहे हैं।अब जबकि राजा सीखचों के पीछे हैं तब केंद्र सरकार के नुमाईंदों पर जनता के धन के अपराधिक दुरूपयोग का मामला चलना चाहिए, क्योंकि सरकार के अडियल रवैए के चलते ही संसद का शीतकालीन सत्र बह गया और देश के गरीबों के खून पसीने के लाखों करोड़ों रूपए उसमें डूब गए। सरकार के नुमाईंदों का तो शायद कुछ न गया हो, उनकी जेबें पहले से अधिक भारी हो गई हों, पर इसका सीधा सीधा बोझ तो आम जनता पर ही पडऩे वाला है। शर्म मगर आती नहीं - इसके पहले आजाद भारत में अनेक मंत्रियों को सीखचों के पीछे भेजा जा चुका है। 1991 से 1996 तक संचार मंत्री रहे सुखराम इसकी जद में आ चुके हैं। पूर्व में 16 अगस्त 1996 में तत्कालीन केंद्रीय संचार मंत्री सुखराम के दिल्ली स्थित आवास पर सीबीआई ने छापा मारकर उनके पास से पौने तीन करोड़ रूपए नकद बरामद किए थे। इनके हिमाचल स्थित आवास से सवा करोड़ रूपए भी मिले थे। इन्हें 18 सितम्बर 1996 को गिरफ्तार किया गया था। तांसी जमीन घोटाले में तमिलनाडू की मुख्यमंत्री रह चुकी जयललिता को अक्टूबर 2000 में चेन्नई की एक अदालत ने सजा सुनाई थी। इसके अलावा अरूणाचल प्रदेश के सीएम रहे गेगांप अपांग को एक हजार करोड़ रूपए के पीडीएस घोटाले में गिरफ्तार किया गया था। झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा पर चार हजार करोड़ रूपयों के घोटाले का आरोप है। इन्हें सितम्बर 2009 में गिरफ्तार किया गया था, वे आज भी जेल में ही हैं। कोयला मंत्री रहे शिबू सोरेन को अपने ही सचिव के अपहरण और हत्या की साजिश रचने के आरोप में दोषी ठहराया था। सोरेन पर आरोप था कि उन्होंने अपने सचिव शशिनाथ झा के साथ यह सब किया था। अदालत के फैसले के बाद सोरेन को गिरफ्तार कर लिया गया था। बीसवीं सदी में स्वयंभू प्रबंधन गुरू बनकर उभरे लालू प्रसाद यादव ने तो कमाल ही कर दिया था। चारा घोटाले के प्रमुख आरोपी लालू यादव को 30 जुलाई 1997 को 134 दिनों के लिए,28 अक्टूबर 1998 को 73 दिनों के लिए, फिर पांच अप्रैल 2000 को 11 दिनों के लिए जेल भेजा गया था। इन पर आय से अधिक संपत्ति का मामला है। बावजूद इसके ये सारे नेता आज भी अपनी कालर ऊंची करके सरकार में शामिल होने लालायित हैं। कहने को तो देश की जांच एजेंसियां भ्रष्टाचारियों, कालाबाजारियों पर कड़ी कार्रवाई का दिखावा करती हैं। याद नहीं पड़ता कि सुखराम के अलावा किसी अन्य का प्रकरण परवान चढ़ पाया हो। एक दूसरे की पूंछ अपने पैंरों तले दबाकर रखने वाले सियासी दलों के नेताओं द्वारा जनता को इस तरह की कार्रवाईयों के जरिए भरमाया जाता है। केंद्र सरकार इस बात को समझ नहीं पा रही है कि भ्रष्टाचार से आम जनता भरी बैठी है। रियाया चाह रही है कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़े से कड़े कदम उठाए जाएं। अगर केंद्र या राज्यों की सरकारों ने भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाए तो भरी हुई जनता सड़कों पर उतर सकती है, और तब उपजने वाली स्थिति इतनी बेकाबू होगी जिससे निपटना किसी के बूते की बात नहीं होगी। सारी हदें पार करने वाले - अगर गहराई से देखा जाए तो राजा भ्रष्टाचार के इस ब्रेन गेम में सिर्फ और सिर्फ एक मोहरा थे, वो मोहरा जिसने अंधाधुंध पैसे कमाने के लालच में दिमाग का इस्तेमाल करना बंद कर दिया था ,वो मोहरा जिसका इस्तेमाल देश के उद्योगपतियों, मीडिया और कार्पोरेट जगत के दलालों ने अपनी झोली भरने के लिए किया और जब मामले खुला तो पहले गर्दन भी राजा की पकड़ी गयी। मगर बरखा दत्त और बीर संघवी जैसे पत्रकारों एवं टेलीकाम कंपनियों के उन मालिकानों से अभी तक पूछताछ किये जाने को लेकर कोई चर्चा भी नहीं हो रही जिन्होंने राजा को संचार मंत्री बनाने के लिए सारी हदें पार कर दी। अपनी करतूतों को ,अपने काम का हिस्सा बताने वाली बेशर्म बरखा दत्त के लिए राजा की गिरफ्तारी क्या एक सामान्य खबर की तरह ही होगी ?क्या उनकी आँखों में आधी रात के वो मंजर फिर से कौंधे होंगे जब वो नीरा से राजा की ताजपोशी के लिए निश्चिंत रहने की बात कह रही थी। क्या वीर संघवी को अपने लिखे वो शब्द याद आये होंगे जब उन्होंने नीरा से कहा था कि जैसा तुमने कहा मैंने वैसा ही लिखा था न? शायद नहीं। इसकी वजह भी है बरखा दत्त और वीर संघवी समेत इस घोटाले कि प्रस्तावना लिखने वाले मीडिया कर्मी और कार्पोरेट जगत के मठाधीश ये जानते थे कि इस लड़ाई में राजा अकेले भले पड़ जाए लेकिन वो अकेले नहीं पड़ेंगे क्यूंकि उनके पीछे उस बड़े समूह की ताकत जुडी है जो देश में राजनेताओं और राजनैतिक दलों का भविष्य बनाने - बिगाडऩे का मुगालता पाल रखे हैं। राजा मंत्री थे पद के दुरुपयोग का मामला उन पर ठोंक दिया गया ,निस्संदेह कांग्रेस इस एक कदम पर अपना सीना चौड़ा कर के कह सकेगी कि लीजिये हमने अपने ही मंत्री के खिलाफ कार्यवाही कर दिया, लेकिन हमने क्या किया ? चौंका देने वाला गठजोड़ -टेलीकाम घोटाले में मीडिया, महाजनों और माननीयों के गठजोड़ का जो चौंका देने वाला सच सामने आया था उसका आदि और अंत यहीं नहीं होता ,संचार मंत्रालय आज ही नहीं लम्बे समय से आर्थिक अपराध का केंद्र बना रहा है ,लेकिन ऐसे छोटे बड़े घोटालों की फेहरिस्त काफी लम्बी है जो अभी तक सामने नहीं आये हैं और अगर आये भी हैं तो उनमे मीडिया की भूमिका के बारे में सोचा भी नहीं जाता ,लेकिन अब हमें अपनी आँखों पर बंधी पट्टी खोलनी होगी ,मीडिया भी मीडिया के जेरे-गौर होनी चाहिए, राजा की गिरफ्तारी इस बात का प्रतीक है कि चाहते न चाहते हुए भी राजनीति में गलतियों की कोई माफ़ी नहीं होती ,सजा छोटी हो या बड़ी मिलती जरुर है। ठीक यही सिद्धांत पत्रकारिता पर भी लागू होता है ,हम लाख कोशिश करके भी अपने दागदार दामन को साफ नहीं कर सकते। वो बरखा जो एक व्यक्ति द्वारा बरखा दत्त डाट काम नामक वेबसाईट का रजिस्ट्रेशन कराने पर उसे अदालत में खिंच लेती है ,वही बरखा किसी गाँव कस्बे के आम पत्रकार के द्वारा गरियाये जाने पर भी होंठ सिले रखने को मजबूर है, वो वीर संघवी जिन्हें सुनना भी युवाओं के लिए फख्र की बात होती थी उनका जिक्र छिड़ते ही आवाज आती है -मारो दलाल है सा.......। स्पेक्ट्रम घोटालों के आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही देश में भ्रष्टाचार के उन्मूलन की प्रक्रिया का हिस्सा तभी बन सकती है ,जब हम उनको भी कानून के दरवाजे पर ला खड़ा करें जिनकी वजह से राजा जैसा धूर्त सिंहासन पर जा बैठा ,जनता के मन में गुस्सा जितना राजा के खिलाफ है उससे ज्यादा इन कार्पोरेट पत्रकारों के खिलाफ, ये सच हमें जान लेना चाहिए।सबक लोने की जरूरत-इसमें कोई दो राय नहीं कि मनमोहन सिंह के आर्थिक उदारीकरण ने गरीबों की कमर तोड़ दी है। हालात मिस्र से कम नहीं। आम आदमी को दो टाइम खाने के लिए नहीं है। लेकिन 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपये कुछ लोग ही खा गए। शासन को मिस्र के विद्रोह से सबक लेना चाहिए। देश के नेताओं, अधिकारियों को तुरंत जनता के हितों में कदम उठाना चाहिए। महंगाई और बेरोजगारी के कारण अगर भूखमरी बढ़ी तो आने वाले दिनों में भारत में भी वही होगा जो मिस्र और टयूनिशिया में हुआ। लोगों की भूख की चिंता नेताओं को नहीं, राजनीतिक दलों को नहीं। सिर्फ अपनी राजनीति और कुर्सी की चिंता है। तो फिर यह भी स्थिति आएगी कि सिंहासन खाली करो, जनता आती है। महंगाई ने लोगों के हालत खराब कर रखी है। लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। अभी भी सम्हलने का मौका है। दो बड़ी मोबाइल कंपनियों की तबाही तय- महीनों से सुलग रहे 2 जी स्पेक्ट्रम विवाद में आज पहली बार दो कंपनियों के नाम का खुलासा हुआ। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के सरकारी वकील ने यूनिनॉर (पुराना नाम यूनिटेक वायरलेस) और एतिसालात डीबी के नाम लिए और कहा कि ए राजा के संचार मंत्री रहते समय नए यूएएसएल लाइसेंस देने में इन कंपनियों को तरजीह दी गई थी। आरोप है कि राजा ने उन्हें दूसरी कंपनियों को हिस्सेदारी बेचते समय जबरदस्त मुनाफा कमाने का मौका दिया था। विशेष सरकारी वकील अखिलेश ने अदालत से कहा, स्पेक्ट्रम का आवंटन करते वक्त बेवजह पक्षपात किया गया। इन कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया और स्पेक्ट्रम तथा लाइसेंस बेहद कम कीमत पर दिए गए। नॉर्वे की कंपनी टेलीनॉर की यूनिनॉर में 67.25 फीसदी हिस्सेदारी है और कंपनी पहले ही 6,135 करा़ेड रुपये का निवेश कर लगभग 1.85 करोड़ ग्राहक बटोर चुकी है। एतिसालात ने भी एतिसालात-डीबी में 45 फीसदी हिस्सेदारी लगभग 90 करा़ेड डॉलर में हासिल की है। लेकिन उसके पास बमुश्किल एक लाख ग्राहक हैं। यूनिनॉर ने इस मसले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और एतिसालात के अधिकारियों से संपर्क नहीं हो सका। दोनों कंपनियों को विपक्षी दल पहले भी निशाना बना चुके हैं। उनका कहना था कि रियल्टी समूह यूनिटेक और डीबी रियल्टी ने भारी भरकम कीमत पर विदेशी साझेदारों को हिस्सेदारी बेचकर चोखा मुनाफा कमाया है क्योंकि राजा ने कीमती स्पेक्ट्रम उन्हें कौडिय़ों के भाव बेच दिया था। उन्हें स्पेक्ट्रम उसी भाव पर मिला था, जिस भाव पर उसे 2001 में कंपनियों ने खरीदा था। इसके बाद नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया। कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि यूनिनॉर और एतिसालात उन कंपनियों में शामिल हैं, जो अधिकृत शेयर पूंजी के आधार पर आवंटन के योग्य नहीं थीं और उन्होंने कई तथ्यों के साथ छेड़छाड ़की, जिसके बावजूद उन्हें यूएएसएल दे दिया गया। कैग ने कहा कि यूनिटेक समूह से संबंधित 6 नई कंपनियों ने 20 लाइसेंस हासिल करने के लिए 24 सितंबर 2007को आवेदन किए थे। उन्होंने आवेदन पत्र के साथ योग्यता के संबंध में दस्तावेज भी दाखिल किए गए थे। लेकिन पंजीकरण संबंधी विवाद के कारण बाद में इन कंपनियों ने नए नाम के साथ मई 2008 में पंजीकरण कराया। कैग के मुताबिक इस तरह कंपनियां सितंबर 2007 को दूरसंचार क्षेत्र में कारोबार के लिए पात्र ही नहीं थीं। इस बीच पूर्व वित्त सचिव और रिजर्व बैंक के वर्तमान गवर्नर डी सुब्बाराव 2जी स्पेक्ट्रम पर लोक लेखा समिति के सामने आज पेश हुए। उनके जाने के बाद समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि इस मामले में प्रधानमंत्री को भी बुलाया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि दूरसंचार विभाग के कुछ पूर्व निर्णयों पर वित्त मंत्रालय अपनी राय दे चुका है। उसी के सिलसिले में सुब्बाराव से बातचीत की गई। जोशी ने कहा कि कैग की रिपोर्ट पर आपत्ति जताने वाली यूनिनॉर और एतिसालात-डीबी को भी जरूरत पडऩे पर तलब किया जा सकता है।

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

नफरत और कट्टरवाद का शैतान समंदर किनारे

केरल की हरियाली और बेशुमार खूबसूरत तटों की वजह से उसे गॉड्स ओन कंट्री का खिताब दिया गया है लेकिन अब यहां की तस्वीर बदल रही है समंदर के किनारे इस खूबसूरत सूबे में नफरत और कट्टरवाद का शैतान पहुंच चुका है। भगवान के इस देश में नारा गूंज रहा है-नया कारवां, नया हिंदुस्तान। ये नारा है केरल के धार्मिक ढांचे को तोडऩे में जुटी ताकत पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई का। दलितों और कमजोरों के हक की लड़ाई के लिए बना संगठन पीएफआई आज जेहाद की वकालत कर रहा है। अपने सबसे बड़े विरोधी आरएसएस की तर्ज पर उसका अपना काडर है, अपना झंडा और अपना लिबास भी। पीएफआई ने अपनी मौजूदगी का ताजा अहसास कराया कोट्टायम में एक प्रोफेसर का हाथ कलम करके। 4 जुलाई 2010 की सुबह, कोट्टायम जिले का मुवात्ताुपूझा इलाका। न्यूमैन कॉलेज के प्रोफेसर टीजे जोसेफ की कार पर 8 लोगों ने चाकुओं, तलवारों, कुल्हाडिय़ों और देसी बमों से हमला किया और प्रोफेसर का दायां हाथ काटकर पड़ोस के एक घर में फेंक दिया। प्रोफेसर पर आरोप था इम्तिहान के सवाल के जरिए पैगंबर साहब की शान में गुस्ताखी। जोसेफ ने बताया कि उन्होंने ये सवाल एक इन्टर्नल इम्तिहान के लिए डाला था। किसी ने ये पर्चा बाहर लीक कर दिया और ये मुद्दा बन गया। मेरे सवाल को गलत तरीके से पेश किया गया जिसके लिए मुझे बहुत अफसोस है। ये कुछ कट्टरपंथी लोग थे जिन्होंने मुझ पर हमला किया। इतनी नफरत कैसे पनपी उस राज्य में जहां पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार बनी थी और जहां कम्युनिस्टों और कांग्रेस का शासन है। पूरा देश चौंक गया। जाहिर है, कुछ ऐसा चल रहा था जिसकी खबर बाकी मुल्क को नहीं थी। राज्य के डीजीपी जैकब पन्नूस कहते हैं कि मुझे लगता है कि कुछ नौजवान जो कुछ संगठनों से जुड़े हुए हैं, उनको गलत राह दिखाई गई है। दरअसल क्या हुआ है कि कुछ गलत राह चलने वाले नौजवान कुछ आतंकवादी संगठनों से मिल गए हैं। मल्लू लोग पूरे देश में फैले हुए हैं और ऐसे कुछ लोग वो केरल में आतंकी तहरीक शुरू कर रहे हैं। यानी पुलिस को भी पता है कि केरल में आतंकवाद पसर रहा है। कभी हमले करके, तो कभी जबरन शादियां कराकर तो कभी धर्म परिवर्तन के जरिए। प्रोफेसर जोसेफ पर हमले की जांच में सामने आया इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का नाम जिसके खिलाफ पहले ही केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में सांप्रदायिक दंगों और लव जेहाद के चार केस दर्ज थे। वहां कैमरे पर पहली बार पीएफआई ने कबूला कि प्रोफेसर पर हमला उसी के लोगों ने किया था। प्रो के कोये ने बताया कि हमने 4 लोगों को अपनी पार्टी से सस्पेंड किया है इस मामले को लेकर लेकिन बाकी लोगों के बारे में हम नहीं जानते हैं कि वो लोग भी हमारी पार्टी से जुड़े हैं। ये सिर्फ पुलिस का कहना है अभी तक उनकी पहचान नहीं की गई है। इसका मतलब पीएफआई ही इस हमले की जड़ में था। सवाल ये कि आखिर 91 फीसदी साक्षरता वाले इस सूबे में पीएफआई जैसा संगठन वजूद में कैसे आया। हमने इतिहास खंगाला तो पता चला कि 2006 में जब पीएफआई की नींव पड़ी तो इसका मकसद था दलितों और अल्पसंख्यकों की आवाज बनना लेकिन जैसे-जैसे खाड़ी देशों से पैसे की आमदरफ्त बढ़ी पीएफआई के मकसद बदलने लगे। 2009 में देश को एक नया लफ्ज मिला- लव जेहाद जिसने पूरे केरल में दहशत पैदा कर दी। आरोप था कि पीएफआई गैरमुस्लिम लड़कियों को फांसकर उनसे मुस्लिम नौजवानों की शादियां करा रहा है। इसके एवज में मुस्लिम नौजवानों को लाखों रुपए दिए जा रहे हैं। कोर्ट पहुंची लड़कियों ने भी इस बात पर मुहर लगाई। लड़कियों की शिकायत पर केरल हाईकोर्ट ने रिपोर्ट तलब की मगर पुलिस इसे साबित नहीं कर सकी। डीजीपी जैकब पन्नूस कहते हैं कि अगर ये एक ग्रुप के तौर पर हो रहा हो, तो हम इसके खिलाफ जरूर कार्रवाई करते लेकिन एक-दो केस ये साबित नहीं करते हैं एक इंसान किसी के साथ भी प्यार कर सकता है। दोनों समुदायों के लोगों में लव जेहाद को लेकर आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। लव जेहाद को लोग भूले भी नहीं थे कि प्रोफेसर पर जानलेवा हमले के बाद पुलिस को पीएफआई सदस्यों से कुछ ऐसी चीजें मिलीं जो आतंकियों से उनके ताल्लुकात पर रोशनी डालती हैं इनमें थे-अलकायदा के प्रचार वीडियो, विस्फोटक और हथियार, जाली सिमकार्ड और आईडेंटिटी कार्ड्स मगर पीएफआई खुद को पाकदामन बताता रहा। जेहाद की फसल उगाने की कोशिश कर रही पीएफआई की हमदर्द पीपुल्स डेमोक्रेेटिक पार्टी भी उतनी ही दागदार है। इसके मुखिया अब्दुल नासिर मदनी पर 2008 के बैंगलोर ब्लास्ट, केरल में सांप्रदायिक दंगे और अनवर शैरी मदरसे के जरिए कट्टरवाद फैलाने के केस चल रहे हैं। कोयंबटूर ब्लास्ट केस में सबूतों के अभाव में वो छूट गया था। हाल ही में एक मदरसे में बंगलोर धमाकों के मुख्य आरोपी नजीर से मुलाकात ने उसे फिर जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। अब्दुल नासिर मदनी कहता है कि नौ साल जेल में रहने के बाद मैं बदल गया हूं। असल में खुफिया सूचनाओं के बावजूद पीडीपी और पीएफआई पर नरम रुख सरकार की मजबूरी रही है क्योंकि मामला मुस्लिम वोटों का है। डीजीपी जैकब पन्नूस कहते हैं कि मैं किसी भी संगठन का नाम नहीं लेना चाहता हूं क्योंकि मैं एक जिम्मेदार कुर्सी पर बैठा हूं। वरिष्ठ बीजेपी नेता पीजी जयेन कहते हैं कि केरल में कट्टरवाद रोकने के लिए सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है। ये सभी लोग कहते हैं क्योंकि पीडीपी और पीएफआई दोनों ही केरल की राजनीति की वजह से मौजूद हैं। दोनों का एलडीएफ और यूडीएफ साथ दे रही हैं। केरल से बाहर भी पीएफआई फैलने की कोशिश में है। यूपी में कई जगह पीएफआई ने काडर तैयार किया। हैदराबाद में सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने वाले पोस्टर लगाए और मुसलमानों का हमदर्द बनकर उभरने की कोशिशें की हैं। पता चला कि मलप्पुरम के चार मुस्लिम नौजवान जेहादी बनकर कश्मीर गए थे और सीमा पार करते हुए पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे। इनमें एक था अब्दुल रहीम सो हम रहीम के घरवालों से मिलने के लिए मलप्पुरम पहुंच गए। रहीम के रिश्तेदार एम यूसुफ ने बताया कि क्या हुआ, किसी को मालूम नहीं है। हम लोगों ने भी सुना है कि पाकिस्तान जाते हुए वो कश्मीर में मारा गया। वो इलेक्ट्रानिक माल बेचने जाता था, इस वक्त भी ऐसे ही गया। फिर आदमी लोग आकर बोले फिर उसकी मां को पता चला। अगर ऐसा पता चलता तो हम उसको जरूर रोकते। साफ है कि मजलूमों के हक की लड़ाई लडऩे का लबादा ओढऩे वाली पीएफआई और पीडीपी के चरित्र में लोकतंत्र और सेक्युलरिज्म के लिए जगह ही नहीं है।

कठघरे में अनुशासन

एक और विवादास्पद पेशी। थल सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह रक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित की जाने वाली कैंटीन में कथित अनियमितताओं के आरोप के संबंध में संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) के समक्ष पेश हुए। सेनाध्यक्ष का पीएसी के समक्ष पेश होने का यह पहला मौका है। दरअसल, सीएजी की गत अगस्त की इस रिपोर्ट में सीएसडी और उसकी यूनिट-रन-कैन्टींस (यूआरसी) के कामकाज के तरीकों और लेखे में पारदर्शिता न होने की आलोचना की गई है। इस पर पीएसी ने रक्षा मंत्रालय ने जवाब मांगा था। मंत्रालय ने सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों से इस बारे में जवाब मांगा था। किसी भी लोकतंत्र के लिए सेना वह प्रमुख स्तंभ है, जो न केवल सरहदों की रक्षा करता है, बल्कि जरूरत पडऩे पर देश की आंतरिक कानून-व्यवस्था बनाए रखने और विभिन्न आपदाओं के समय भी सहयोग करता है। लेकिन पिछले कुछ समय से विभिन्न घोटालों के कारण सेना की उस छवि को नुकसान हुआ है। सेना की जिम्मेदारियों और उसके जोखिमों को ध्यान में रखकर ही उसे हर तरह की सुविधाएं प्रदान की गई हैं। सेना के लिए अलग संचार प्रणाली, चिकित्सा, न्याय प्रक्रिया, डाक व्यवस्था और पीडब्ल्यूडी की तरह एमईएस (जो सेना के लिए भवन व सड़क निर्माण का काम करती है) की व्यवस्था की गई है। सेना को अपने काम के लिए सिविल प्रशासन या किसी अन्य संस्था से सहायता लेने के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ता। इसकी एक वजह यह भी है कि सेना अक्सर ऐसी दुर्गम जगहों में रहती है, जहां सिविल प्रशासन की पहुंच नहीं होती। सवाल उठता है कि जब सेना को इतनी सुविधाओं से लैस किया गया है, तो फिर ये घोटाले क्यों होते हैं। कारगिल की लड़ाई का ही अगर विश्लेषण करें, तो पाएंगे कि यह लड़ाई हमारे ऊपर किसी ने थोपी नहीं थी, बल्कि वह हमारे ही कुछ सैन्य अधिकारियों की गलती का नतीजा थी। कारगिल की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहां सेना को दो तरह से सरहद की सुरक्षा करनी पड़ती है। गरमी में अलग तरह से और सर्दियों में अलग तरह से। सरदी के मौसम में यह पूरा क्षेत्र बर्फ से पूरी तरह ढक जाता है। इसी का फायदा उठाकर सर्दी के मौसम में पाकिस्तानी सैनिक कबाइलियों के रूप में ऊंची पहाडिय़ों पर बंकर बनाकर घुस गए। इसका पता हमारी सेना को जब चला, तब बहुत देर हो चुकी थी। उस समय तक श्रीनगर-लेह राजमार्ग पाक सैनिकों के कब्जे में आ चुका था। इस गलती को सुधारने के क्रम में हमारी सेना को कारगिल की लड़ाई लडऩी पड़ी, जिसमें बहुत से सैनिकों और अफसरों को अपनी जानें गंवानी पड़ी। वह एक असंभव लड़ाई थी, जिसको केवल वीरता के बल पर जीता गया। हमारी सेना ने भले ही एक-एक इंच जमीन वापस ले ली, लेकिन इसमें लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई, यह जनता के सामने कभी नहीं आया। इसी प्रकार सेना के एक बड़े अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल अवधेश प्रकाश ने सुखना के अंदर सेना की जमीन का एक बड़ा भू-भाग निजी स्कूल चलाने वाले अपने किसी संबंधी को दे दिया। मीडिया में इसकी खबरें काफी दिनों तक सुर्खियों में रहीं। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर इसे दबाने में लगे रहे और न्याय प्रक्रिया में खूब रोड़े अटकाए गए। इसी बीच अवधेश प्रकाश रिटायर हो गए। हालांकि इस मामले में जनरल वी के सिंह की तारीफ करनी होगी, जो हमेशा न्याय के साथ खड़े रहे। इससे उम्मीद बंधी है कि दोषियों को सजा अवश्य मिलेगी। अब बात सबसे चर्चित आदर्श सोसाइटी घोटाले की, जिसने सेना प्रमुख जैसे शीर्ष पद की गरिमा को तार-तार कर दिया। यदि सेना का शीर्ष अधिकारी ही इस तरह के घोटालों में संलिप्त पाया जाता है, तो वह कैसे अपने अधीनस्थों से आदर्श और ईमानदारी की अपेक्षा कर सकता है? सवाल उठता है कि सेना के इन उच्च अधिकारियों के घोटाले में संलिप्तता का जवानों के मनोबल पर क्या असर पड़ेगा। हालांकि ऐसे लोगों की सेना में तादाद कम है, फिर भी इससे सेना की छवि पर तो असर पड़ता ही है। ऐसे में जरूरी है कि सेना आत्ममंथन करे और ऐसे उपाय करे, जिससे कि उस पर दोबारा दाग न लगे। हमारी सेना को एक ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी कि उसके अधिकारी या जवान अपने उद्देश्यों से भटके नहीं। इसके लिए उसे अपनी दंड प्रक्रिया में चुस्ती लानी पड़ेगी और देश का विश्वास हासिल करना पड़ेगा।

नतीजा ढाक के तीन पात

मूल्य वृद्धि से जहां आम लोग दो-चार हो रहे हैं, वहीं नीति निर्माताओं की पेशानियों पर भी बल पड़ गए हैं। विपक्षी पार्टियां महंगाई पर नियंत्रण न किए जाने से लगातार सरकार की आलोचना कर रही हैं। लिहाजा प्रधानमंत्री ने महंगाई पर एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई, लेकिन बैठक में कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया। महंगाई घटने तक बैठकों का जोर अवश्य जारी रहेगा। प्रधानमंत्री ने महंगाई और आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में लगातार हो रही वृद्धि की समीक्षा के लिए बैठक बुलाई थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि महंगाई अब यूपीए सरकार के गले की फांस बन गई है। आम आदमी की रसोई में आग लग गई है , मगर चूल्हा है कि ठंडा होता जा रहा है। खाद्य महंगाई दर ने सरकार के दावों की पोल खोल कर रख दी है। महंगाई दर छप्पर फाड़कर 18 फीसदी से ऊपर पहुंच चुकी है। आंकड़ों पर यकीन करें तो दामों में 60 फीसदी का इजाफा हो गया है। कीमतें सरकार की पकड़ से दूर जा चुकी हैं। महंगाई बढ़ाने वाले तीन प्रमुख कारक इधर कुछ सालों में उभरे हैं। एक, होर्डिंग या जमाखोरी, जो बेमौसम बरसात जैसी खबरों से अधिक उग्र हो गई है और जिसके सामने सरकार बिल्कुल बेबस है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्याज है, जिसकी बड़ी मात्रा देश में मौजूद होने के बावजूद यह अपनी सामान्य मौसमी कीमत के चार गुने भाव में बिकने लगा था। दो, एक्सपोर्ट, यानी जैसे ही कोई चीज सस्ती होने की संभावना बने, उसे बाहर भेज देना। फिलहाल यह काम चीनी के साथ हो रहा है, जिसके एक्सपोर्ट पर लगी रोक इधर बिना कोई सूचना दिए हटा ली गई है। और तीन, मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज, जिसके वायदा कारोबार ने खान-पान की सारी चीजों का संतुलन बिगाड़ दिया है। सरकार इन तीनों के खिलाफ नीतिगत स्तर पर कुछ नहीं करने जा रही है, लिहाजा बीच-बीच में कुछ राहत भले मिल जाए, पर महंगाई कम होने की अब बात ही बेमानी हो गई है। वायदा कारोबार और निर्यात उसे दोहरी मार से बचा रहे हैं तो यह ठीक ही है। लेकिन सरकारी दलीलों की आड़ लेकर अगर किसान और उपभोक्ता, दोनों का शिकार किया जा रहा है और बिचौलिए मजे लूट रहे हैं तो महंगाई रोकने के तात्कालिक उपायों से ऊपर उठकर सरकार को बीमारी का कोई स्थायी निदान खोजना चाहिए। कृषि एवं खाद्य आपूर्ति मंत्री का कहना है कि वायदा कारोबार के बिना मंडियों को कारगर नहीं बनाया जा सकता और मंडियां मजबूत नहीं हुईं तो नकदी खेती से जुड़े किसानों को राहत नहीं दी जा सकती। मौसम और कीड़ों की मार से लुटा-पिटा किसान फसल अच्छी होने पर अपना माल सस्ता होने की वजह से भी मारा जाए, यह तो सरासर नाइंसाफी है। महंगाई रोकने वाले मौसमी कारकों के सक्रिय होने का समय यही है। खरीफ की फसल बाजार में है। सब्जियां इसी मौसम में सस्ती होती आई हैं। गन्ने की अग्रिम फसल कोल्हुओं और मिलों में पहुंचने लगी है, लिहाजा गुड़-चीनी भी सस्ते होने चाहिए। ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है, खाने-पीने की हर चीज महंगी है तो इसकी कोई प्राकृतिक वजह नहीं है। कुछ सरकारी नीतियां इसके लिए जिम्मेदार हैं और उनके चलते आगे भी देश में महंगाई रुकने के आसार नहीं हैं। कृषि उत्पादन और वितरण की व्यवस्था सुधारे बिना इस समस्या से निजात नहीं है। कुछ बड़े सुधारों के लिए अच्छे मानसून वाले इस बरस से अच्छा समय कब मिलेगा? दूसरी हरित क्रांति की बात तो चल रही है, लेकिन उस दिशा में कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया, बल्कि देश के बड़े हिस्सों में पहली हरित क्रांति ही नहीं पहुंची है। सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की दुर्दशा भी इसके लिए जिम्मेदार है, क्योंकि कीमतों पर नियंत्रण में इस व्यवस्था का योगदान बहुत बड़ा है। अब भी सरकार को इस व्यवस्था को फिर से चुस्त-दुरुस्त बनाकर इस्तेमाल करना चाहिए। लगातार बढ़ती हुई महंगाई न सिर्फ आम जनता के लिए मुसीबत है, बल्कि सरकार और नीति निर्माताओं के लिए भी फिक्र का विषय है। भारत की विकास दर 9 प्रतिशत के पास है, लेकिन इसका असली फायदा तभी है, जब महंगाई की दर चार-पांच प्रतिशत के आसपास बनी रहे। तब बढ़ती विकास दर का असली फायदा लोगों तक पहुंचता है और सरकार विकास दर और ज्यादा बढ़ाने पर जोर दे सकती है।

मन को झंझोड़ती तन की खुश्बू

हर किसी के तन में देह गंध बसी होती है। इसमें खास बात यह है कि यह गंध हर किसी में अलग-अलग होती है। देह गंध ने वैज्ञानिकों को इस हद तक आकर्षित किया है कि उस पर शोध किए गए हैं। इतना ही नहीं जीव विज्ञान में देह गंध पर फीरोमोन नाम से पूरा एक अध्याय बना दिया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि देह गंध पसीने से अलग है। पसीने से जहां दुर्गंध आएगी वहीं देह गंध जरा हट के होगी। जवानी की देह गंध काफी असरदार पाई गई है, जो हर किसी को गुमराह कर देती है। किसी युवती के साथ खड़े भर हो लेना बड़े खजाने के मिल जाने के बराबर होता है और अगर छू लेने का मौका मिल जाए तो कहना ही क्या। वैज्ञानिकों के अनुसार, 'जवानी में जीवधारियों के शरीर में ऐसे स्राव निकलते हैं जो बाद में बनते ही नहीं हैं। यह शरीर में समाई अतिरिक्त ऊर्जा, उत्साह और कई नई शारीरिक क्रियाओं की देन होती है। मानव के अलावा अन्य जीवों में तो यह गंध विपरीत लिंग को आकर्षित करने के लिए खासतौर से निकलती है।Ó विवाह के बाद पति-पत्नी के बीच आकर्षण की कड़ी में देह गंध खास भूमिका निभाती है। महिला और पुरुष दोनों ही शारीरिकि मिलन में देह गंध चरम सीमा प्रदान करती है। शरीर से निकलती यह गंध एक-दूसरे को उत्तेजित करती है। आजकल बाडी स्प्रे यानी परफ्यूम ने यह जगह ले ली है। वैज्ञानिकों की नजर में इन सबके बावजूद भी देह गंध अपना अलग ही प्रभाव छोड़ती है। अन्य जीवों में भी देह गंध अपना असर दिखाती है। बकरी, भेड़, बिल्ली आदि जीव तक देह गंध से अपने बच्चे को पहचानते हैं। बिल्ली के नवजात शिशु को यदि साबुन से नहला दिया जाए तो बिल्ली उसे बराबर सूंघती है, जब तक कि उसे उस की देह गंध न मिल जाए। कई बार गंध न मिल पाने पर वह उसे मार डालती है। नन्हे कीटों में देह गंध का अनोखा संसार है। नर तथा मादा दोनों ही कीट फीरोमोन यानी देह गंध को अपने शरीर से बाहर निकालते हैं। यदि मादा फीरोमोन को निकालती है तो उसी जात का नर उससे प्रभावित होता है। इसी तरह यदि नर फीरोमोन निकालता है तो मादा लपकती है। इसका लाभ मनुष्य ने उठाया है। कीट नियंत्रण के लिए फीरोमोन टैप तैयार किए गए हैं, जिसमें एक जालीदार पिंजड़े में मादा की देह गंध छोड़ दी जाती है, इस से नर कीट आकर्षित होता है और फंस जाता है। कुदरत की देन गंध विपरीत लिंग में एक-दूसरे के प्रति आकर्षण के लिए है। इसमें दो-राय नहीं कि भविष्य में यह देह गंध किसी बड़े महत्वपूर्ण शोध का रास्ता खोलेगी जो एक-दूसरे को बांधने में सहायक होगी। तब शायद गंध मिलान की नई शाखा पनपे और शादी के लिए जन्मकुंडली के स्थान पर यह देह गंध मिलान आवश्यक हो जाए।

चुनौती बनते चीन की चतुराई

चीनी सैनिकों ने एक बार फिर भारतीय क्षेत्र में घुसकर धमकी दी है। मोटर साइकिल सवार चीनी सैनिक जम्मू-कश्मीर के देमचोक के गोंबिर गांव में पुहंचे। वहां बनाये जा रहे यात्रियों के शेड के कर्मचारियों को धमकी दे डाली और नारे लगाते हुए वापस चले गए। यह घटना सितंबर-अक्टूबर 2010 की है। जो लेह हेडक्वाार्टर से करीब 300 किलोमीटर दूर है। बारतीय सेना ने तुरंत राज्य सरकार को यथास्थिति बरकरार रखने का निर्देश दिया। और नियंत्रण रेखा के करीब 50 किलोमीटर के अंदर कोई भी निर्माण कराने के लिए रक्षा मंत्रालय से अनुमति लेने को कहा। राज्य प्रशासन ने कहा है कि इससे न्योमा और दमचोक के विकास कार्य प्रभावित होगें। राज्य सरकार की इस क्षेत्र में सात लिंक रोड बनाने की योजना थी। अब सवाल असल मुद्दे की। चीन क्यों इस तरह की हिमाकत करता है? चीन आखिर चाहता क्या है और उसकी रणनीति क्या है? हाल के दिनों में चीन की नई-नई गतिविधियां नि:संदेह चिंतित कर रही हैं। कई देशों के लिए चुनौती बनता जा रहा है। वह भारत, जापान, नार्वे, दक्षिण कोरिया जैसे देशों को जब-तब झिड़क देता है और अब अमेरिका के विरुद्ध भी चलने की हिम्मत जुटाने लगा है। बावजूद इसके यह समझ से परे है कि आखिर कोई भी देश चीन के विरुद्ध ठोस कदम क्यों नहीं उठा रहा है। चुनौती बनते चीन की चतुराई भरी गतिविधियों को सहन करना भविष्य के लिए ठीक नहीं है। चीन समय-समय पर आंखें तरेरता रहता है। बताते हैं कि चीन उन देशों के साथ व्यापार कम कर देता है, जो तिब्बत के धर्मगुरु दलाईलामा का स्वागत करते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, दुनिया के उन देशों, जो दलाईलामा की मेजबानी करते हैं, पर चीन अपनी आर्थिक ताकत की धौंस जमाता है। भारत और दलाईलामा के रिश्ते जगजाहिर हैं। एक और कारण है और वह यह कि इस समय चीन बेचैेन है। बैचेनी का कारण भारत की विस्तारवादी विदेश नीति है। इस विदेश नीति के तहत भारत ने उन देशों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी है, जो देश चीन से किसी न किसी मसले पर भिड़े है। दिलचस्प बात है कि चीन अपनी सारी गतिविधियों को विस्तारवादी बताने के बजाए सहयोगी बताता है पर भारत और अमेरिका की हर गतिविधियों को अलग तरीके से व्याख्या कर रहा है। अब तक ये माना जाता था कि आर्थिक विकास के लिये लोकतंत्र और बाजार व्यवस्था दोनों ही अनिवार्य हैं। चीन में न लोकतंत्र है और न ही पूरी तरह से बाजार व्यवस्था। राजनीति पूरी तरह से तानाशाही के अधीन है तो पश्चिम के लिये दरवाजे खोलने के बावजूद भी सरकार की गहरी नजर लगातार अर्थव्यवस्था पर बनी रहती है और उसकी अनुमति के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता। पर सवाल ये है कि क्या ये विकास स्थाई है? क्योंकि भले ही वो अर्थव्यवस्था के नियम को पलट रहा हो लेकिन पश्चिम से संपर्क ने चीन के समाज में बेचैनी बढ़ा दी है। अल्पसंख्यक तबका परेशान है। मजदूर वर्ग मजदूरी के सवाल पर नाराज है, त्येन आन मन चौक पर छात्र बीस साल पहले ही अपने तेवर दिखा चुका है। ऐसे में सबसे दुनिया में दूसरे नंबर का देश होने के साथ ही उसकी चुनौतियां बढ़ गयी हैं। ये चुनौती बाहर से नहीं अंदर से है। ठीक पाकिस्तान की तरह। पाकिस्तान में जिस तरह छद्म शासन चलाया जा रहा है, वह किसी से छाप हुआ नहीं है। पाकिस्तानी भी रह-रह कर आंखें तरेरता है, चीन भी। भूमि विवाद तो एक बहाना है, असल में भारत को किसी तरह उलझाए रखना है, ताकि दुनिया भर में भारत की गलत प्रस्तुति हो। मगर चीन को उसे अपनी ऐतिहासिक सनक से बाहर आना पड़ेगा और ये काम नंबर दो बनने से ज्यादा मुश्किल है। क्योंकि सनक अगर स्थाईभाव हो जाये तो पागलपन का रूप ले लेती है। आर्थिक रूप से देखें तो पाएंगे कि चीन की व्यापार नीति मुक्त नहीं है। इस कारण उनके व्यापारिक सहयोगी देशों को नुकसान होता है। भारत इसमें से एक है। चीन जिस तरह से पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका को अपने खेमें किया है, उससे भारत की परेशानी बढ़ी है। नेपाल सीमा तक चीन ने तिब्बत स्थित लहासा से रेल लाइन बिछाने का काम शुरू कर चुका है। पहले चरण में लहासा से सिगात्से से तक रेल लाइन बिछाया जाएगा। इसके बाद इसे नेपाल सीमा तक लाया जाएगा। बाद में इसे काठमांडू तक बिछाए जाने की चीनी विस्तारवादी योजना है। इससे भारत काफी नाराज है। लंका में भी हैबेनटोंटा बंदरगाह का विकास चीन कर रहा है। लंका ने भारत-चीन विवाद का फायदा लेते हुए चीन से रक्षा सहयोग पर भी विचार शुरू कर चुका है। भारत चीन समेत अपने पड़ोसी मुल्कों की रणनीति को समझ रहा है। पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल तीनों मुल्क गरीब है। इनकी अर्थव्यवस्था बुरी हालत में है। चीन इन्हें सहायता देकर अपने खेमें करना चाहते है। हाल ही में नेपाल में भारतीय राजदूत राकेश सूद पर जूता फेंके जाने की घटना को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह जूता माओवादियों ने फेंका जिनका नेतृत्व नेपाल के एक पूर्व मंत्री और माओवादी नेता गोपाल कर रहे थे। जबकि उस समय उसी इलाके में गए चीनी राजदूत का जोरदार स्वागत नेपाली माओवादियों ने किया था। संभवत : यही कारण है कि चीन की इस नीति की काट करते हुए भारत ने चीन की इस नीति के विरोध में मजबूत अर्थव्यवस्था वाले मुल्क जापान, दक्षिण कोरिया आदि को अपने पक्ष में करने की नीति पर चल पड़ा है। साथ ही मध्य एशिया में भी चीन को मजबूती से टक्कर देने के खेल में जुट गया है। अफगानिस्तान में भारत पहले ही अपना खेल कर चुका है। इससे चीन पूरी तरह से घबराया हुआ है। पाकिस्तान-चीन की जोड़ी भारत को अफगानिस्तान से निकालना चाहते हैं, पर अभी तक कामयाब नहीं हो पाए है। जबकि पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत स्थित ग्वादर में चीन द्वारा बनाए गए गवादर बंदरगाह का महत्व पहले ही भारत ने अपनी रणनीति से खत्म करवा दिया है। भारत ने ईरान स्थित एक बंदरगाह से तेहरान होते हुए सेंट्रल एशिया के अस्काबाद तक रेल लाइन पहले ही बिछवा दिया। इससे चीन द्वारा पाकिस्तान में बनाए गए ग्वादर बंदरगाह का महत्व खत्म हो गया। इस पराजय को चीन अभी तक भूल नहीं पाया है। हाल ही में भारतीय सेना ने 2017 तक भारत और चीन के बीच जंग होने का अनुमान लगाया है, तो क्या चीन की हर साजिश के पीछे कुछ ऐसी ही चतुराई है?

बयानों से देश बचाते नेता

नक्सलवाद, अलगाववाद, माओवाद और न जाने कौन कौन से वाद। इन सब समस्याओं से जूझते देश को बचाने के लिए चर्चा का समय नहीं है लेकिन दिल्ली के पाश इलाकों में चौड़ी चौड़ी सड़कों के किनारे बने सुविधा संपन्न सरकारी कोठियों में रहने वाले ये नेता अपने परिजनों को मुफत विमान यात्रा कराने पर मेहनत करते रहे हैं। भारत संघ के सामने इतनी बड़ी बड़ी समस्यायें मुंह खोले बैठी है और यहां के नेता एक दूसरे पर आक्षेप करने से नहीं चूकते। सत्ता में आने के लिए ये किसी भी हद तक चले जाने से नहीं चूकत। वोट बैंक की राजनीति के लिए हर मुददे को भुलाया जा रहा है। बाबा रामदेव ने एक बार कहा था कि कैसे चलेगा यह देश? कैसे नेता हैं यहां के जो कभी रिटायर ही नहीं होते। नौकरी करने वाले लोग एक समय में रिटायर हो जाते हैं लेकिन हमारे मुल्क के माननीय चल नहीं पाने की स्थिति में भी रिटायर नहीं होना चाहते हैं। जनसेवा का ऐसा जज्बा किसी भी मुल्क के नेताओं में नहीं जो व्हील चेयर पर बैठ कर और वैशाखी के सहारे चलते हुए भी लोगों की सेवा के लिए तत्पर रहने का दावा करते हैं। अनाज का भंडार भरा हुआ है। देश में करोड़ों लोग रात को भूखे पेट सो रहे हैं लेकिन सरकार और सरकार के ओहदेदार तथा रहनुमा कभी जागने को तैयार ही नहीं हैं। उच्चतम न्यायालय ने जगाने की चेष्टा की तो सरकार के मुखिया ने कह दिया कि हमें मत जगाओ हम पहले से जागे हुए हैं। कैसी विडंबना है कि उच्चतम न्यायालय के आदेशों के बावजूद सरकार भूखों में अन्न बांटने के लिए तैयार नहीं है। बयानबाजी में माहिर पूर्व गृह मंत्री की तरह बयानबाजी करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री ने भी कह दिया था कि इतने बड़े देश में लोगों को मुफ्त में अनाज बांटना संभव नहीं है। रहनुमाओं को यह जवाब देना चाहिए कि सड़क पर और फलाइओवरों के नीचे जन्म लेने वाले बच्चों के लिए उनके पास कौन सी नीति है। उन बच्चों की माताओं के लिए वह क्या करते हैं। वातानुकूलित कमरों में बैठ कर मोटा वेतन लेने के लिए जिद करने वाले इन नेताओं के पास चैराहों पर रात गुजारने वाले बच्चों, महिलाओं और अन्य लोगों के लिए क्या व्यवस्था है। देश की समस्याओं से निजात पाने के लिए भी इन रहनुमाओं को एक न एक बार अपने स्वार्थ से उपर उठ कर एक मंच पर आना होगा और उन्हें चीन, पाकिस्तान और आंतरिक आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद, माओवाद की समस्या पर गंभीरता पूर्वक विचार करने के लिए सही दिशा मे प्रयत्न करना होगा तभी देश बचेगा।

मिथकों के बीच महंगाई

एक तरफ वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी राज्यों को खाद्य उत्पादों की आपूर्ति बढ़ाने के उपाय करने को पत्र लिख रहे हैं। दूसरी तरफ उनकी सरकार आम उपभोक्ताओं को राशन में मिलने वाले रियायती अनाज के दाम बढ़ा रही है। सरकार का यह फैसला महंगाई को भड़काने में एक पलीता बन सकता है। कहने को तो भारत कृषि प्रधान देश है, लेकिन कृषि क्षेत्र की बदहाली बढ़ती जा रही है। हालांकि राज्यों और केंद्र में मुख्यत: किसानों के वोट से सरकारें बनती हैं, लेकिन सत्ता में बैठे लोग उनकी ही अवहेलना करते हैं। धीरे-धीरे ग्रामीण अर्थव्यवस्था सरकारी मदद पर आश्रित होती जा रही है। इसके विपरीत शहरों की अर्थव्यवस्था काफी कुछ निजी क्षेत्र पर निर्भर हो चुकी है। अब इस पर विचार किया जाना चाहिए कि कहीं ग्रामीण अर्थव्यवस्था इसलिए तो पंगु नहीं हो रही, क्योंकि वह सरकार की बैशाखियों पर टिकी है? कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकारी तंत्र पर निर्भरता के चलते कृषि क्षेत्र अपनी कमजोरी से उबर नहीं पा रहा। चूंकि सरकारी तंत्र पर कृषि क्षेत्र की निर्भरता राजनीतिक दलों को वोट दिलाती है इसलिए वे हालात बदलने के लिए तैयार नहीं। कृषि क्षेत्र पर सरकारी तंत्र की पकड़ बरकरार रहने का एक अन्य कारण घपलों-घोटालों को आसानी से अंजाम देना और उन पर पर्दा डालना भी नजर आता है। खाद्य पदार्थो के मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि के पीछे भी एक किस्म में भ्रष्टाचार ही दिखता है। यह आम आदमी की कमर तोडऩे वाली स्थिति है, क्योंकि खाद्य पदार्थों के साथ-साथ घर-गृहस्थी में काम आने वाली करीब-करीब उस प्रत्येक वस्तु के दाम बढ़ गए हैं, जो मध्यम वर्गीय परिवारों की जरूरत में शामिल है। इनमें से कुछ वस्तुएं ऐसी भी हैं जिनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजारों में या तो घट रही हैं या फिर स्थिर हैं। केंद्र सरकार के महंगाई नियंत्रित करने के दावे खोखले ही नही झूठे भी साबित हुए हैं। पिछले दिनों गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने यह कहकर देश को तगड़ा झटका दिया कि उन्हें इसका भरोसा नहीं कि सरकार के पास महंगाई रोकने के पर्याप्त उपाय हैं। दो बार वित्त मंत्री रह चुके चिदंबरम ने यह भी कहा कि बढ़ती महंगाई अपने आप में एक टैक्स है। महंगाई पर लगाम लगाने के पर्याप्त उपाय न होने की स्वीकारोक्ति कोई सामान्य बात नहीं और वह भी तब जब यह स्वीकारोक्ति केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ एवं अर्थशास्त्री माने जाने वाले एक ऐसे मंत्री की ओर से की गई हो जो पिछले सात वर्ष से सत्ता में हो। इस स्वीकारोक्ति से स्पष्ट होता है कि सरकार महंगाई पर नियंत्रण के मामले में अंधेरे में तीर चला रही है। पिछले वर्ष जब मुद्रास्फीति दर दहाई अंकों पर पहुंची थी तब सरकार ने उस पर जल्द ही काबू पाने का आश्वासन दिया था, लेकिन वह खोखला साबित हुआ। इसके बाद सरकार की ओर से महंगाई बढऩे के तरह-तरह के कारण गिनाए गए। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने यह तर्क दिया कि महंगाई इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि लोगों की आमदनी बढ़ रही है। इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई, लेकिन बाद में इस तरह के वक्तव्य अन्य नेताओं की ओर से भी दिए गए। यदि यह मान लिया जाए कि पिछले कई वर्षो से विकास दर आठ प्रतिशत के आसपास रहने के कारण औसत भारतीयों की आमदनी बढ़ी है और इसके चलते खाने-पीने की वस्तुओं की खपत भी बढ़ गई है तो भी यह कोई ऐसी असामान्य बात नहीं। आखिर उसकी ओर से ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकी, जिससे खाद्य पदार्थो और विशेष रूप से खाद्यान्न एवं सब्जियों का उत्पादन बढ़ता? इसका मतलब है कि कृषि मंत्रालय हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है और उसे इसकी कोई परवाह नहीं कि कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़े। आम आदमी के दुख-दर्द की तो किसी को परवाह ही नहीं और शायद हमारे राजनेता यह मान बैठे हैं कि मध्यम वर्गीय परिवार आर्थिक रूप से इतने सक्षम हो गए हैं कि वे बढ़ती महंगाई किसी न किसी तरह सहन कर लेंगे। विपक्षी दल महंगाई को लेकर शोर तो बहुत मचा रहें हैं, लेकिन अनेक राज्यों में उनका ही शासन है और वहां भी मूल्यवृद्धि पर कोई अंकुश नहीं। बढ़ती महंगाई के लिए राज्य केंद्र को दोषी ठहरा रहे हैं और केंद्र राज्यों पर दोषारोपण कर रहा है। इससे यदि कुछ स्पष्ट है तो यह कि कोई भी भ्रष्ट व्यवस्था में दखल देने के लिए तैयार नहीं। शायद इसी में राजनीतिक दलों का हित है यानी उनकी तिजोरियां आसानी से भर सकती हैं। बढ़ी कीमतें चुनौती की तरह खड़ी है। अर्थव्यवस्था ऐसी स्थिति में है जहां राजकोषीय घाटा बढऩे का खतरा भी है। नीति निर्माताओं के लिए यह स्थिति चुनौती भरी है। श्रीगणेश तभी हो सकता है जब पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया जाएगा।

देश मांगे जवाब, कहां है हिंदुस्तान

भ्रष्टाचार के मामले में विपक्ष की घेरेबंदी से बाहर निकलने के लिए सरकार लगातार हाथ-पैर मार रही है। दूसरी तरफ विपक्ष की कोशिश लगातार जारी है कि सरकार को चारों खाने चित्त कर दिया जाए। इस राजनीतिक रस्साकशी में कुछ गड़े मुर्दे भी उखाड़े जा रहे हैं। इस खेल में सीबीआई की भूमिका को भी नहीं नकारा जा सकता। स्थिति कमोबेश यहां तक तो साफ हो गई है कि आम जनता की सुध छोड़ सत्ता खुद लिए चिंतित हो गई है। उसका साथ देने वे सारे तंत्र खड़े हैं, जिन्हें परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से फायदे दिख रहे हैं। लिहाजा हर कायदा ताक पर है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार से लडऩे वाले मोर्चे पर हम बेहद कमजोर होते जा रहे हैं। ऊपर से राजनेताओं, व्यपारियों और नौकरशाहों का एक ऐसा गठजोड़ बनता जा रहा है जिसका एक मात्र मकसद ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना हो गया है। जनसेवा के नाम से जानी जाने वाली राजनीति अब एक कारोबार का रुप लेती जा रही है जो आम आदमी के हित्त में नहीं है। राजनीति और नौकरशाही के स्तर पर बढ़ते भ्रष्टाचार से आम आदमी को जहां उसका वाजिब अधिकार नही मिल पा रहा वही देश की साख पर बट्टा भी लग रहा है। भ्रष्टाचार हमारी रगों में समा गया है और हम उसे निकाल नही पा रहे हैं। भ्रष्टाचार पर व्यापक बहस की जरूरत है कि आर्थिक अपराध करने वाला आखिर क्यों असानी से छूट जाता है? क्यों इसे संगीन अपराध नहीं बनाया जाता? सारा देश देख रहा है कि इतने बड़े बड़े घोटले बाहर आ रहे हैं और सरकार जेसीपी नहीं बनाने पर ही अड़ी हुई है। देश कब तक यह सब बर्दाश्त करता रहे? लंबे अर्से बाद कांग्रेस के खिलाफ पूरा विपक्ष एकजुट खड़ा दिख रहा है और बोफोर्स मामला भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को और मजबूत कर सकता है।देश की राजनीतिक स्थिति बहुत ही गड़बड़ है। 2010 में अपने देश में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़े गए हैं। देश की राजनीति में तिकड़मबाजों और जुगाड़बाजों का बोलबाला चारों तरफ बढ़ चुका है। करोड़ों रुपये के घोटाले हुएहैं। महंगाई डायन अब शेयर बाजारों को भी नेस्तानाबूद करने पर उतारू हो गई है। केंद्र सरकार महंगाई पर अंकुश लगाने में लाचार दिख रही है। सरकार का एक वर्ग भी यह मान रहा है कि महंगाई रोकने के लिए सरकार के स्तर पर बहुत कुछ नहीं हो सकता है। बुधवार को गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कुछ ऐसे ही बयान दिए थे। ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि आगामी 25 जनवरी को वार्षिक मौद्रिक नीति की मध्य-तिमाही समीक्षा में रिजर्व बैंक महंगाई पर नियंत्रण करने के लिए अपनी नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करेगा। महंगाई पर वार करने के लिए उठाए जाने वाले इस हथियार से विकास दर के पहिए में बाधा पड़ सकती है। निवेशक इसी चिंता में बिकवाली करने में जुटे हुए हैं। गिरावट की एक वजह यह भी है कि इस समय बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआइआई) गायब हैं। बीते साल इन्होंने घरेलू बाजार में जमकर पूंजी झोंकी। बोफोर्स मामले में नये खुलासे के बाद भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक तेवर अपना लिये है ं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बोफोर्स दलाली पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को कटघरे में खड़ा करने की पूरी तैयारी की गई है। जिस तरह से आयकर पंचाट ने बोफोर्स तोप सौदे में गांधी परिवार के करीबी ओतावियो क्वात्रोच्चि के भी दलाली लिये जाने की पुष्टि की है उसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर आ गई हैं और खुद कांग्रेस के लिये बचाव कर पाना मुश्किल हो रहा है। घोटालों को लेकर गर्म हुए राजनीतिक माहौल के बाद पहली बार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही है। भाजपा और समूचा विपक्ष 2जी स्पेक्ट्रम को लेकर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के गठन की मांग पर अड़ा है। पार्टी को लगता है कि केंद्र सरकार पर हमले तेज करने का यह एक बेहतरीन मौका है। बोफोर्स को लेकर नए खुलासे के बाद पार्टी इस बैठक में सरकार को घेरने के लिए नए सिरे से रणनीति बना सकती है। देश के सबसे बड़े विपक्षी दल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सभाएं करने की योजना बनाई है ताकि संसद के बजट सत्र तक इस मुद्दे को जीवित रखा जा सके। भाजपा ने हाल के दिनों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भी हमले तेज किए हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को अन्य विपक्षी दलों और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल घटकों के साथ रिश्ते मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद पार्टी कार्यकारिणी की यह पहली बैठक है। पार्टी तमिलनाडु में आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडग़म, असम में असम गण परिषद, हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल और आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी व तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ रिश्ते फिर से सुधारने की कोशिश में है। पहले ये दल राजग के घटक हुआ करते थे। पिछले दिनों बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा- जदयू गठबंधन को मिली बड़ी जीत से भी भाजपा के हौसले बुलंद हैं। अब वह लोकसभा चुनाव से पहले राजग को और मजबूत बनाने के प्रयास में है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी अपना एक साल पूरा कर लिया है , उनके तेवर और ज्यादा कड़े लग रहे हैं। भाजपा के तेवर दूर संचार मंत्री कपिल सिब्बल के नए तर्को के बाद और तीखे हो गए हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि ए. राजा और सरकार को पाक-साफ करार देकर कांग्रेस नेता बोफोर्स की गलती दोहराने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सीएजी के खुलासे और सिब्बल के आंकड़े के बाद तो जेपीसी जांच और जरूरी हो जाती है। नए साल में सरकार पर चौतरफा उठ रहे सवालों से उत्साहित भाजपा के नेता रणनीति बनाने गुवाहाटी में जुटे हैं। आतंकवाद के मामले पर असीमानंद के खुलासे से उन्हें थोड़ा झटका जरूर लगा है पर वह इसके कारण भ्रष्टाचार के मुद्दे की धार को कमजोर नहीं होने देना चाहते। सरकार की तरफ सिब्बल ने मोर्चा संभाला तो उनका जवाब जेटली ने दिया। उन्होंने दो टूक कहा कि उन्हें पहले ही आशंका थी कि संप्रग सरकार सच्चाई सामने लाने की बजाय पूरे मामले को रफा-दफा करने की कोशिश करेगी। बोफोर्स मामले में 23 साल उसने यही किया। सिब्बल ने विकृत आंकड़े पेश कर यह साबित करने की कोशिश की है कि ए. राजा ने नुकसान नहीं, बल्कि लाभ कराया है। यह आंखों में धूल झोंकने जैसा है। जेटली ने कहा कि अगर ऐसा था तो इस्तीफा क्यूं लिया? सीबीआई और पीएसी की जांच का क्या मतलब है? जेटली ने कहा कि 2007 में जब दूर संचार नियामक (ट्राई) ने बाजार दर पर आवंटन देना तय किया था तो 2008 में वर्ष 2001 की दर पर आवंटन कैसे किया गया। वर्ष 2008 में यह दर 9500 करोड़ रुपये थी, जबकि आवंटन 1651 करोड़ रुपये पर किया गया। सीएजी ने चार अलग- अलग तरीके से नुकसान का आकलन किया है। उसने 3जी के भी इसी आधार पर आवंटन किए जाने पर 1.76 लाख करोड़ रुपये के नुकसान की बात कही है। उन्होंने सिब्बल के तर्को पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि उन्होंने सीबीआई, पीएसी और जेपीसी का दायित्व निभाते हुए जिस तरह खुद ही सरकार को पाक-साफ करार दे दिया वह हास्यास्पद है। इसके पहले असीमानंद के आतंकवादी घटना में शामिल होने की स्वीकारोक्ति व संघ के नेताओं पर उंगली उठाने के खुलासे पर टिप्पणी करते हुए भाजपा ने इसे मोड़ दे दिया। पार्टी ने कहा कि आतंकवाद को भगवा रंग देने की साजिश हो रही है। मुख्य प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जांच होनी चाहिए, लेकिन यह ध्यान रखा जाए कि वह पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो। उन्होंने कहा कि जो दोषी है उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने इस तरह की खबरों को लीक किए जाने पर भी चिंता जताई। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से पहले प्रदेश अध्यक्षों व प्रभारियों के साथ पार्टी कार्यक्रमों की समीक्षा करते हुए नितिन गडकरी ने स्पष्ट किया कि बहुत काम करने होंगे। कार्यक्रम अंत्योदय का हो या आजीवन सहयोगी बनाने का, इसे कम कर नहीं आंकना चाहिए। बताते हैं कि गडकरी ने राज्यों को स्पष्ट संकेत दिया कि उनके आपसी मतभेद कुछ भी हों, केंद्रीय नेतृत्व को परिणाम चाहिए। असम में हो रही बैठक का औचित्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा की पहुंच से यह क्षेत्र छूटा हुआ है। लिहाजा संभावनाएं भी काफी हैं। दूसरी तरफ 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच जेपीसी से कराने को छोड़ कर कांग्रेस तमाम ऐसे उपायों पर विचार कर रही है, जिससे लगे कि वह भ्रष्टाचार से लडऩे को लेकर गंभीर है। अध्यादेश के जरिए प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का प्रस्ताव इनमें से एक है। इसके जरिए विपक्ष और जनता को यह संदेश दिया जा सकता है कि सरकार प्रधानमंत्री को जांच की आंच से बचाना नहीं चाहती। जेपीसी की मांग न मानने की वजह से सरकार पर यह आरोप लग रहा है कि वह पीएम को बचाने के लिए ही इससे कतरा रही है। लेकिन मंत्रिमंडल में लोकपाल विधेयक को लेकर आम राय नहीं है। कुछ मंत्री नहीं चाहते कि सरकार फिलहाल इस तरह का कोई जोखिम उठाए। वैसे लोकपाल विधेयक को अगर धारदार नहीं बनाया गया, तो इसे लागू करने का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। वर्तमान में राज्यों में लोकायुक्तों का क्या हाल हुआ है, यह हम देख रहे हैं। कार्यपालिका और विधायिका ने इस संस्था को खिलवाड़ बना दिया है। इसलिए अगर नख-दंत विहीन लोकपाल ले भी आया जाए तो इससे क्या मकसद पूरा होगा? सरकार तात्कालिक रूप से इसका श्रेय तो ले लेगी, मगर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अधूरी ही रह जाएगी? भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए गठित ज्यादातर संस्थाएं यहां केवल सजावटी बनकर रह गई हैं। इन्हें स्वतंत्र और शक्तिशाली बनने ही नहीं दिया गया। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के संबंधों का ताना-बाना कुछ इस तरह से बुना गया है कि वे एक-दूसरे पर नजर रख सकें और एक-दूसरे को निरंकुश होने से रोकें। इस संतुलन के गड़बड़ाने से ही सारी समस्याएं पैदा हुई हैं। आज तीनों अंग अपनी श्रेष्ठता कायम करने और अपने लिए विशेषाधिकार की मांग कर रहे हैं। आखिर क्यों प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश किसी भी मूल्यांकन या समीक्षा से परे हों? कांग्रेस पार्टी की राजनीति में सारी ताकत राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के अभियान में झोंकी जा रही है। समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी सिद्धांत पता नहीं कहां दफन हो गए हैं। आलाकमान कल्चर हावी है और सुप्रीम नेता से असहमत होने का रिवाज ही खत्म हो गया है। राजनीतिक जागरूकता के बुनियादी ढांचे में कहीं कुछ भी निवेश नहीं हो रहा है। ठोस बातों की कहीं भी कोई बात नहीं हो रही है। पार्टी के बड़े नेता चापलूसी के सारे रिकार्ड तोड़ रहे हैं और आजादी के बुनियादी सिद्धातों की कोई परवाह न करते हुए अमरीकी पूंजीवाद के कारिंदे के रूप में देश की छवि बन रही है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ हुई पार्टी की कोर ग्रुप की बैठक में तेलंगाना और महंगाई पार्टी के एजेंडे में ऊपर थे। कांग्रेस को तेलंगाना की चिंता तो है, लेकिन छोटे राज्य के पक्ष में आगे बढऩे पर इसी साल दो चुनाव वाले राज्यों में ही संकट खड़ा हो सकता है। पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड तो असम में बोडोलैंड को लेकर भी भावनाएं उफान मारने की आशंका है। इसके अलावा महाराष्ट्र से विदर्भ को अलग करने की मांग भी बहुत पुरानी है। उत्तर प्रदेश को तीन हिस्सों-पूर्वाचल, हरित प्रदेश और बुंदेलखंड में बांटने की पैरवी भी लगातार होती रही है। इस बात पर सहमति बनी है कि कांग्रेस अपनी तरफ से पत्ते बिल्कुल नहीं खोलेगी। तेलंगाना विरोधी या समर्थक कांग्रेस नेताओं को भी संयम रखने के लिए कहा जाएगा। चूंकि, पार्टी आंध्र में नुकसान तय मान रही है, लिहाजा उसकी कोशिश वहां हिंसा रोक कर दूसरे राज्यों में छोटे प्रदेशों की मांग रोकना प्राथमिकता पर होगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि प्रशासनिक प्रक्रिया में और अधिक पारदर्शिता तथा निगरानी सुनिश्चित करने के लिए चरणबद्ध तरीके से बदलाव लाने के प्रयास जारी हैं। उन्होंने कहा कि इस दिशा में हमने ईमानदारी से काम करने का विचार किया है।ÓÓ सिंह की यह टिप्पणियां इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि सरकार की 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन, राष्ट्रमंडल खेल सहित विभिन्न घोटालों को लेकर आलोचना हो रही है। जनमानस भय और दु:ख से भौचक्का हो रहा है क्योंकि देश का नेतृत्व भ्रष्ट सिद्ध हो गया है। कार्यपालिका, न्यायपालिका और खबरपालिका सभी में भ्रष्ट व्यवहार की दुर्गन्ध जनमानस तक पहुंच रही है। यह तो वह कहानियां हैं जो खुल गई, परन्तु इनके खुलने से मन में एक और डर उत्पन्न होता है कि जो खुला नहीं वह कितना विराट और भयंकर होगा? देश की अर्थव्यवस्था में जो धन संचालित है उससे कहीं अधिक धन काले धन्धों में लगा है और उससे भी कहीं अधिक धन भारतीय नागरिकों के नाम से विदेशी बैंकों में जमा है। कुछ विदेशी बैंकों ने जब इस बात के संकेत दिये कि वह अपने यहां भारतीयों के खातों का विवरण देने को तैयार है तो हमारी सरकार मौन रही। कारण स्पष्ट है, अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने वाला शेखचिल्ली कहलाता है। आमजन में विशेषकर आने वाली पीढ़ी में ऐसे संस्कार बन रहे हैं मानो की अनैतिक और भ्रष्ट व्यवहार ही शिष्टाचार है। ऐसा लगने लगा है कि दो नंबर की कमाई करना मान्य है और उसके लिए प्रयास करना वांछित सामाजिक व्यवहार है। नैतिकता का आधार खिसकता हुआ दिख रहा है। आम व्यक्ति स्तब्ध है और नहीं जानता है कि उसे क्या सोचना चाहिए और क्या करना चाहिए। आर्थिक और नैतिक धारणाओं के आधार पर वर्तमान भारतीय समाज को तीन हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है। पहला वर्ग सत्ता के गलियारों में स्थित कमरों में बैठने वाला और गलियारों में घूमने वाला है। इसमें अधिकतर राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी, बड़े-छोटे व्यापारी व उद्योगपति हैं जिनको दलालों का वर्ग संचालित करता है। दलालों के लिए भी अंग्रेजी के एक प्रतिष्ठित शब्द का प्रयोग हो रहा है-'लॉबिस्टÓ। यह पूरा का पूरा वर्ग मन, वचन और कर्म से भ्रष्ट है। देश को लूटना अपना अधिकार ही नहीं कर्तव्य और धर्म भी मानता है। इनकी मानसिकता उन लुटेरे मुगलों की और ब्रिटिश अधिकारियों की है जिन्होंने उस देश को कंगाल बना दिया, जिस देश की दूध-दही की नदियां बहने वाली व्याख्या की जाती थी। इनके मन में कभी भी अपने कार्य के प्रति शक या पश्चाताप की गुंजाईश नहीं है। ए. राजा, अशोक चव्हाण व राडिया उनके प्रतिनिधि हैं। समाज का दूसरा वर्ग वह है जो ईमानदारी और शिष्टाचार का लबादा ओढ़ कर बैठा है। वह पहले वर्ग के भ्रष्टाचारी लोगों के साथ उठता-बैठता है। कदम मिलाकर चलता है और हम प्याला होता है, परंतु अपनी छवि भ्रष्ट न होने की चेष्ठाएं बनाये रखता है। यह वर्ग भ्रष्ट नहीं है ऐसा विश्वास जनमानस के मन में रहता है। परन्तु यह भ्रष्ट है या नहीं यह शक के दायरे में है। उनके नाक के नीचे भ्रष्टाचार हो रहा है और जिस टोली के वह नेता हैं उस टोली के ही कार्यकर्ता हर किस्म का अपराध कर रहे हैं परन्तु अपने अधीन हो रहे भ्रष्टाचार से वह अपने आपको अलग रखते हैं और कभी-कभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार को संरक्षण भी देते हैं। किसी भी भावी जांच के पक्ष में वह नहीं होते और यदि जांच हो भी तो उसे प्रभावित करके भ्रष्टाचारियों को अपने लबादे के अंदर लपेट कर बचा के ले जाते हैं। वर्तमान में प्रशासन के शीर्ष नेता और संगठन के शीर्ष नेता दोनों ही भ्रष्ट प्रणाली के सर्वेसर्वा हैं। निष्क्रिय हैं और मौन हैं। सज्जन व्यक्तित्व का आडंबर भी करते हैं। यह वर्ग छोटा है परन्तु देश और राष्ट्र के लिए सबसे अधिक घातक है। भ्रष्टाचारी, देशद्रोही की तो पहचान है परन्तु जो भेडिय़े बकरी का रूप धारण किए हैं उनसे बचना होगा। समाज का तीसरा वर्ग आम जनता का है। जो नीयत और व्यवहार से देशप्रेमी है, ईमानदार है परन्तु अपने कर्तव्य की पहचान उसे नहीं है। इनमें से एक वर्ग ऐसा है जो मौका मिलते ही पहले या दूसरे वर्ग अर्थात भ्रष्टाचारियों या छद्म शिष्टाचारियों के साथ मिल जाता है। इनकी देशभक्ति के संस्कार दुर्बल हैं और समाज के प्रति समर्पण क्षीण है। परन्तु यदि उचित वातावरण मिले तो यह लोग भी शिष्टाचारी और ईमानदार हो जाते हैं। जैसा अवसर या वातावरण मिलता है उसी में यह ढल जाते हैं।

सीबीआई की जांच किसके जिम्मे

सीबीआई सिर्फ अपने राजनैतिक मालिकों की सुनती है और सरकार के दूसरे उसी की तरह जिम्मेदार विभाग क्या कह रहे हैं इसका उससे कोई लेना देना नहीं है। सीबीआई सिर्फ बोफोर्स के झमेले में नहीं फंसी। इसरो जासूसी कांड, राजनेताओं को फंसाने के लिए रचे गए हवाला कांड, प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड, निठारी हत्याकांड, दाऊद इब्राहीम को राहत देने वाला कांड, सिस्टर अभया हत्याकांड, सोहराबुद्दीन मुठभेड़ कांड में गीता जौहरी की भूमिका, भोपाल गैस त्रासदी और फिलहाल विवादों में चल रहे आरुषि तलवार हत्याकांड में सीबीआई की भूमिका एकदम वही रही है जो भारतीय दंड विधान की बजाय राजनैतिक डंडा विधान से चलती नजर आती है। ऐसी सीबीआई को हमने आज की तारीख में असंख्य दौलत हजम होने वाले घोटाले सौंप रखे हैं और क्या सीबीआई मे भी कोई कसम खा कर कह सकता है कि सीबीआई में घोटाले नहीं होते। वैसे तो कहा जाता है कि राज्य सरकार जब तक नहीं चाहे तब तक सीबीआई राज्य का कोई मामला जांच के लिए नहीं ले सकती मगर असलियत क्या है । अब तक भ्रष्टाचार के जो रूप हमारे सामने आते रहे है, वे आम तौर पर रिश्वतखोरी और कालाबाजारी के रहे है। लेकिन जबसे इसमें राजनीतिक लोग शामिल होने लगे हैं तब से मामला गंभीर हो गया है। हमारे यहां भ्रष्टाचार किसी संगीन जुर्म में नही आता। इसी लिए यह एक बड़े कारोबार का अकार लेता जा रहा है। बड़े घोटालेबाज अपनी राजनीतिक एवं प्रशासनिक पुहंच के कारण बचे रहते हैं। इनकी जांच करने वाले आयोग और जांच ऐजसियां मामलों को इतना लम्बा चलाती है कि लोग सब भूल जाते हैं, हां छोटे मोटे अपराधियों के लिए न्यायचक्र अपना काम करता रहता है। कृष्ण मेनन से लेकर कृष्णामचारी तक और बोफोर्स और प्रतिभूति घोटालों में आज तक किसी को कोई सजा नही हुई। दरअसल सरकारे खुद भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती रही है और यह समास्या स्वतंत्रता के पूर्व से चली आ रही है। 1937 में बनी कांग्रेसी सरकारों पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगे थे, भ्रष्टाराचार के विरोध में गांधी जी ने सत्याग्रह किया था। 1967 में बनी श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार पर भ्रष्टाचार को बढ़वा देने का आरोप भी लगा। 1961 में प्रताप सिंह केरो द्वारा पंजाब में अपने बेटे को सिनेमा हाल बनाने के लिए सरकारी जमीन कोडिय़ों के भाव देने का मामला भी चर्चित रहा है। 1984 में राजीव गांधी की सरकार और 1991 में नरसिंह राव सरकार पर भी ऐसे आरोप रहे हैं।