रविवार, 31 अक्टूबर 2010

राजनीति में झंडू बाम

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने कोल्हापुर की एक सभा में ये घोषणा करके फिल्म दबंग के लोकप्रिय गाने के बोल मैं झंडू बाम हो गई, डार्लिंग तेरे लिए को नए अर्थ दे दिए हैं। झंडू बाम पर कमर लचकाने वाली मल्लिका अरोड़ा खान ने इस प्रकार के आयटम गानों पर थिरकने से भले ही तौबा कर ली हो, लेकिन इसे जुमला -ए-आम बनाने वालों को कोई तौबा नहीं। पहले तो यह समझना होगा कि इस जुमले को उगल वे क्या कहना चाहते हैं। वैसे इसका भान कटु-व्यंग्य ही प्रतीत होता है। चव्हाण ने कहा कि पश्चिम महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा गठबंधन का जो (कांग्रेस के लिए) सिरदर्द है, उसे दूर करने के लिए हमारे मंत्री पतंगराव कदम और हर्षवर्धन पाटील झंडू बाम साबित होंगे। मुख्यमंत्री कोल्हापुर महानगरपालिका चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी द्वारा आयोजित सभा को संबोधित कर रहे थे। मतलब साफ है कि युवा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए उन्हीं की बोली बोलते हुए सीएम ने नई पीढ़ी के मुहावरों का जमकर उपयोग किया। पतंगराव और हर्षवर्धन को कांग्रेस पार्टी की तरफ से कोल्हापुर की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इनमें से मंत्री पतंगराव मसखरेपन और बेबाकी के लिए जाने जाते हैं। आम तौर पर फिल्मी गानों की टॉप टेन के हिसाब से रेटिंग की जाती है। सीएम ने यह जनप्रिय शब्दावली अपनी बात पहुंचाने के लिए उधार ले ली। उन्होंने कहा उज्ज्वल भविष्य और विकास के लिए काम करने की धमक कांग्रेस पार्टी में है। कोल्हापुर की सत्ता हमारे हाथ में दीजिए, इसे टॉप टेन में लाकर दिखा देंगे। माथे पर थोड़ा बल दें। शुरुआती क्षणों में देश भर में सिनेमा हालों की खिड़कियां तुड़वा रही मुन्नी जब नसीबन आंटी का मुखड़ा चुरा कर उस पर झंडू बाम लगाएगी तो बदनाम होगी ही। अब अतीत को खंगालें। गत 26 नवम्बर को जब पाकिस्तान से आये आतंकवादियों ने मुम्बई में हमला किया था, और उसके नतीजे में कर्तव्यनिष्ठ, जिम्मेदार और सक्रिय सूट-बूट वाले विलासराव देशमुख अपने बेटे रितेश और रामगोपाल वर्मा को साथ लेकर ताज होटल में तफरीह करने गये थे, उसके बाद शर्म के मारे उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था और अचानक अशोक चव्हाण की लाटरी लग गई थी। इसके बाद तो मुड़कर देखने की जरूरत ही नहीं हुई। बुलंद हौंसलों की तस्वीर कुछ और ही होती है। लेकिन अपने पीछे यह कुछ राज भी छोड़ जाती है। मुन्नी की बदनामी और नामी की बदनामी पर बड़ा फर्क है। जुबान फिसलने की दुहाई दी जा सकती है, लेकिन अपने को तृतीय पंक्ति से लाकर प्रथम पंक्ति में खड़ा करना आसान नहीं। अगर किसी ने इसे भाव नहीं दिया तो और बात है, ताव खा गया तो नाहक ही बदनामी हो जाएगी। देखने की घड़ी होगी पलटवार किस जुमले के साथ होता है। अंताक्षरी की दो-चार कड़ी तो हो ही जाएगी। मगर ध्यान रहे यह बानगी है कि देश में चिंतनशील राजनेताओं की कमी होती जा रही है। चिंतित राजनेताओं की नई पौध लहलहा रही है। श्री चव्हाण भी तो कहीं चिंतित नहीं। तराने में कई अफसाने शामिल हो सकते हैं। गिनने वाले दिल्ली में इसे उंगलियों पर गिन रहे होंगे। निनांबे के बाद सौै ही आता ही है। राजनीति के स्वरूप और सरोकार में भारी परिवर्तन आया है। अब विचार की जगह रणनीति और राजनेताओं की जगह पॉलिटिकल मैनेजरों का महत्व बढ़ा है। राजनेता सूत्रों और प्रतीकों की घोर व्यक्तिवादी राजनीति में उलझकर रह गए हैं। अपनी नब्ज टटोलने की बजाए दूसरों का बुखार मापने का चलन बन गया है। झंडू बाम का जुमला अगर आज आम होने जा रहा है तो राजनीति के संकट पर बात करते हुए इस पहलू पर भी गौर करना होगा।

सेंट रावण स्कूलों के चलन

वक्त था, अच्छे स्कूलों, गुरुकुलों के आचार्य खुद आगे होकर बच्चों को मांग कर लाते थे, पढ़ाने के लिए। राजा दशरथ से मुनि राम और लक्ष्मण को मांग कर ले गये थे। भले दिन थे वो, अब के से नहीं। अब राजा दशरथ बालकों को लेकर किसी कायदे के स्कूल में जाते, तो संवाद यूं होता-अपनी इनकम, अपने पिताजी की इनकम, उनके पिताजी की इनकम बताइये। देखिये आप बच्चों के ज्ञान की परीक्षा लें, उनके बारे में पूछें-राजा दशरथ कहते। स्कूल वाले बताते कि बच्चों की इनकम थोड़ी ही होती है, जो उनके बारे में पूछें। और बच्चों के ज्ञान से उन्हे कोई मतलब नहीं है। राजा दशरथ बताते-मेरे बालक सच्चरित्र, कुशाग्र हैं। उससे क्या होता है-स्कूल वाले बताते। उससे क्या होता है, सही बात है। चरित्र देखा नहीं जा सकता, नोट देखे जा सकते हैं। जो दिखता है, उसी की वैल्यू है। कुशाग्रता गिनी नहीं जा सकती, नोट गिने जा सकते हैं। जो गिनने योग्य है, उसी की वैल्यू है। स्कूल इसी फंडे पर काम करते हैं। तब सेंट वशिष्ठ स्कूल होते थे। अब तो सेंट रावण स्कूलों के चलन हैं। एयरकंडीशंड क्लास रूमों में पलने वालों को अगर चौदह साल जंगल जाने का फरमान आ जाये, तो संवाद यूं होंगे-आपको चौदह सालों के जंगल में जाना है।ओ के, जंगलों में एयरकंडीशनर होंगे। नहीं आप बात नहीं समझ रहे हैं, जंगल में एयरकंडीशनर नहीं होते। जंगल में कुछ नहीं होता। पंखे तक नहीं होते। जंगल क्या यूपी में पड़ते हैं जो बिजली पंखे वगैरह नहीं होते। नहीं जंगल यूपी के हों या एमपी के, कहीं भी पंखे नहीं होते। क्या जंगल में पिज्जा, बर्गर, चाऊमीन, मल्टीप्लेक्स, शापिंग माल नहीं होते। नहीं यह सब नहीं होता। ओह, नो जंगल में नहीं जाना। हम वादा तोड़ देंगे।

बयानों के चुभते तीर

बयानों के चुभते तीरों से लोकतंत्र छलनी हो चला है। कद-पद की परवाह किसी को नहीं। दूसरों पर थूकने की प्रवृति खासकर नेताओं में इतनी बढ़ गई है कि थूक अपने चेहरे पर ही गिर रहा है या दूसरे के , होश ही नहीं। तब एक बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारा लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। नि:संदेह नहीं। हम आज खुद को विश्व में सबसे बड़े और सबसे मजबूत लोकतंत्र वाले देश के नागरिक के तौर पर प्रचारित कर रहे हैं, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं व परंपराओं का किया जा रहा उल्लंघन आज चिंता का विषय है। एक समय इंदिरा गांधी को गूंगी गुडिय़ा कहकर चिढ़ाया जाता था, लेकिन बाद में उन्होंने साबित किया कि वास्तविकता क्या थी? राजनीतिक टकरावों को व्यक्तिगत अहम का मुद्दा मान लेने से ही इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और डॉ. राम मनोहर लोहिया में भी तीव्र मतभेद थे, लेकिन उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप नहीं लगाए और न ही कभी किसी तरह का अपशब्द कहा। ऐसा न तो सार्वजनिक जीवन में हुआ और न ही व्यक्तिगत जीवन में सुनने को मिला। इससे यही समझ आता है कि आज के राजनेता बहुत जल्दी में है और बिना जनसेवा के आरोप-प्रत्यारोप लगाकर जनता में एक तरह का उन्माद पैदा करके लाभ पाना चाहते हैं। जब नेताओं के पास जनता के विकास और उनकी खुशहाली के लिए कोई उपाय नहीं रह जाता तो वे इस तरह की बातों से लोगों को घुमाने की कोशिश करते ही हैं। हमारे राजनेता देश को दिशा देते हैं और उनके द्वारा बताए गए और अपनाए गए तौर तरीकों को आम लोग भी अपने जीवन में दुहराते हैं। तो क्या अब हमारे राजनेता देश को यही संदेश दे रहे हैं कि दूसरे की मान-मर्यादा की परवाह करने की बजाय अपने हितों को पूरा करने के लिए कुछ भी करना जायज है। राजनीति में सार्वजनिक मंचों से एक-दूसरे के प्रति अपशब्दों का प्रयोग इसी मानसिकता का प्रतिफल है। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सभी दलों के नेताओं को मिल-बैठकर एक आचार संहिता बनानी चाहिए, क्योंकि यह एक राजनीतिक समस्या है। चुनाव आयोग को ऐसे संगीन मसलों पर जागरूक होने की जरूरत है ताकि ऐसे लोगों को जनता को बरगलाने से रोका जा सके। हमारे संविधान में सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार दिया गया है, लेकिन यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है। दूसरे व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता, सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली अभिव्यक्ति पर रोक लगाई जा सकती है और ऐसे लोगों को दंडित किया जा सकता है। एक लंबे अरसे से विधायिका और संसद में असंसदीय भाषा और व्यवहार पर रोक लगाने के लिए उचित तरीके खोजने की बात की जाती रही है। सांसदों-विधायकों द्वारा सदन के भीतर खुलेआम गाली-गलौज, हाथापाई और मारपीट की घटनाएं आखिर कब तक चलती रहेंगी। यदि समय रहते इस तरह की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगाई जाती है तो ऐसी घटनाओं की बार-बार दुहराई जाएंगी और हमारा लोकतंत्र लहूलुहान होता रहेगा। अब समय आ गया है जबकि इस दिशा में सरकार पहल करे और राजनीतिक विद्धेषों को व्यक्तिगत रंजिश बनाने से रोके। युद्ध और प्यार में सब कुछ जायज है की तर्ज पर आज राजनीति में भी सब कुछ सही है को सूत्रवाक्य मान लिया गया है। इसी प्रवृत्ति का नतीजा है कि आए दिन अपशब्दों और दोअर्थाी बातें सार्वजनिक तौर पर भी कहने से राजनेता नहीं डर रहे। संसद और विधायिका में जिस तरह जनप्रतिनिधियों का आचरण देखने को मिलता है, वह हमारे लोकतंत्र के विकृत होते स्वरूप का आभास देता है। इस संदर्भ में यदि हम वर्तमान में बिहार में हो रहे चुनावों को देखें तो कुछ भी अलग नहीं है। बात चाहे शरद यादव की हो, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार की हो या अन्य राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की हो, कमोबेश सभी इस रोग के शिकार दिखते हैं।

नकाब में घिनौना चेहरा

बाजारू व्यक्तित्व के धनी लोगों के पास अपना अहम, अपना आत्मसम्मान नहीं होता। कोई सिद्धांत नहीं होता। सही या गलत के बीच फर्क का विवेक नहीं होता। मुख्यधारा हो गयी है, धन की भूख। धन पाने की, हड़पने की, चुराने की, घूस खाने की। इसी होड़ में फंसा है देश-समाज। इसके लिए आत्मसम्मान, विवेक, चरित्र सब दांव पर लगाने के लिए लोग तैयार हैं। और जहां धन है, वहां समाज के सभी ताकतवर अंग एकजुट हैं। क्यों लगातार भारत के धनी और ताकतवर कानून से बाहर जा रहे हैं? क्यों इस देश का कानून सिर्फ उनके लिए रह गया है, जो संविधान में यकीन करते हैं? नि:संदेह लालच अब एक नया धर्म बन चुका है। उसके अलावा अब और कुछ पवित्र नहीं रह गया है- न अफसरशाही के सर्वोच्च दफ्तर, न मुख्यमंत्री, न सेना प्रमुख और न ही शीर्ष नौकरशाह, जिनसे होकर फाइलें गुजरती हैं। अगर युद्ध में जान गंवाने वाले सैनिकों की विधवाओं के लिए हाउसिंग सोसायटी में स्वीकृत फ्लैटों को चुराना हो, तो इनमें से हर कोई कारगिल के शहीदों के खून के साथ दगाबाजी करने को तैयार हो जाएगा। शर्म नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। लालच हमेशा पाखंड के पर्दे के पीछे पनपता है। लोकतंत्र में पाखंड एक बड़ा प्रलोभन है, क्योंकि समझौतों की शुरुआत हमेशा यथार्थवाद या सेवा के नाम पर होती है। चुनाव में होने वाले वास्तविक खर्च और आधिकारिक रूप से स्वीकृत धनराशि के बीच का फासला ही भ्रष्टाचार का सबसे अहम औजार है, क्योंकि तब अवैध 'खैरातÓ लेने को भी न्यायोचित करार दिया जा सकता है। घूस के लिए खैरात एक शिष्ट मुहावरा है। कारगिल के शहीदों की अमानत पर डाका डालने वाले अफसरों की फेहरिस्त हमें शर्मिदा कर देने के लिए काफी है। इनके लिए तो यह एक लॉटरी थी। 'आदर्शÓ बिल्डिंग सोसायटी में शहीदों की विधवाओं के लिए स्वीकृत फ्लैटों को आपस में बांट लेने वालों को भ्रष्टाचार का दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए, उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। हमारे तंत्र को लगता है कि वह किसी भी तरह के जनाक्रोश को मजे से हजम कर सकता है। कॉमनवेल्थ खेलों में जनता के पैसों के साथ जो घिनौना बलात्कार हुआ, उसके लिए सुरेश कलमाड़ी को आधिकारिक रूप से कुर्बानी के लिए नामांकित किया गया था। शायद 'आदर्शÓ के कारण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को भी इस्तीफा देना पड़े, बशर्ते वे दिल्ली में बैठे अपने आकाओं को यह धमकी देते हुए ब्लैकमेल न करने लगें कि वे उस रकम का खुलासा कर देंगे, जो उन तक पहुंचाई जाती रही है। दिल्ली में बैठे चतुरसुजानों ने हमें मूर्ख बनाया है। अशोक चव्हाण उस दिन भ्रष्ट नहीं हुए थे, जिस दिन मीडिया ने यह खुलासा किया कि उन्होंने न केवल कारगिल के नायकों के साथ धोखाधड़ी करने के लिए संदर्भ शर्तो को बदल दिया था और फिर बड़े आराम से अपने कुनबे के लिए उनके हिस्से के चार फ्लैट चुरा लिए थे। वे उसी दिन से भ्रष्ट थे, जब उन्हें महाराष्ट्र सरकार में मंत्री बनाया गया। उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में इसलिए नहीं पदोन्नत किया गया, क्योंकि वे योग्य थे, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें पता था कि कांग्रेस में आगे बढऩे का फॉर्मूला है वफादारी और भ्रष्टाचार का घालमेल। खुलासा होने पर अगर दिल्ली ने चेहरे पर नकाब ओढ़ लिया है तो इसकी वजह यह है कि मामले को टालने का यही एक तरीका उसे पता है। घोटालों के भारत और झुग्गियों के भारत के बीच के फासले को अखबार रोज मापते हैं, लेकिन हम अपनी सहूलियत के चलते उस पर गौर नहीं करते। यही आधे भारत का मुकद्दर है। दूसरी ओर कुछ लोग राष्ट्रीय संपत्ति को लूटते रहेंगे। जो इनके बीच में हैं, वे अपने सपनों और असुरक्षाओं की गिरफ्त में बने रहेंगे।

लूट की छूट

संवेदनाशून्यता और बेशर्मी की हद
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मुम्बई स्थित आदर्श आवासीय सोसाइटी को लेकर विवादों में घिरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की बात आखिरकार इस्तीफे तक पहुंच ही गई। उनका कहना है कि मुम्बई आदर्श सोसाइटी को लेकर जो बवाल खड़ा हुआ, उसकी पूरी जानकारी मैंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को दी। मैंने पूरी सच्चाई उनके सामने रखी है। हमारी यही भूमिका रही है कि आदर्श सोसाइटी की जमीन महाराष्ट्र सरकार की है। मैंने कल भी यही बात कही थी। इस मामले में जांच हो रही है और जांच में पूरी सच्चाई सबके सामने आ जाएगी। कारगिल के शहीदों के लिए बनी इस आवासीय इमारत में चव्हाण की सास और उनके दो अन्य रिश्तेदारों को फ्लैट आवंटित हुए थे। इस वजह से चव्हाण भी आरोपों से घिरे। आरोप है कि कारगिल शहीदों की विधवाओं और बहादुर सैन्य अधिकारियों के नाम पर बने आदर्श हाउसिंग सोसायटी में फ्लैट पाने के लिए अशोक चव्हाण ने सौदेबाजी की थी। सूत्रों के अनुसार अशोक चव्हाण उस समय राजस्व मंत्री थे और उन्होंने आदर्श सोसायटी को बिल्डिंग बनाने के लिए जमीन इस शर्त पर दी थी कि इसमें सामान्य नागरिकों को भी फ्लैट आवंटित किए जाएं। सूत्रों की मानें तो आदर्श सोसायटी के अधिकारियों और तत्कालीन राजस्व मंत्री अशोक चव्हाण के बीच 3 जनवरी 2000 को हुई मुलाकात में जमीन के बदले फ्लैट आवंटित करने की शर्त रखी गई थी। एक निजी टीवी चैनल के अनुसार इस संदर्भ में सोसायटी की ओर से 20 जून 2000 को अशोक चव्हाण के नाम लिखा गया एक खत प्राप्त हुआ है, जिससे सौदेबाजी का खुलासा होता है। खत में साफ तौर पर लिखा गया है कि महोदय, हमारे 3 जनवरी 2000 के पत्र और आपसे मुलाकात के बाद हमारी सोसायटी का निवेदन है हमें जमीन उपलब्ध कराई जाए। हमारी सोसयटी सेना के कर्मचरियों के अलावा सामान्य नागरिकों को भी फ्लैट देने को तैयार है। रक्षा सेवाओं के 31 सदस्यों की लिस्ट इस पत्र के साथ हैं। खैर, एक और जांच की घोषणा की जा सकती है। देखा जाए तो यह सिर्फ चव्हाण से जुड़ा मामला नहीं है, कमोबेश ऐसी स्थिति देश के हर कोने में है। प्रदेश स्तर पर हो अथवा देश के स्तर पर लूट में सभी के हाथ सने हुए हैं। क्या ऐसे लोगों के रहमोकरम पर नए भारत की तकदीर सवारी जा सकेगी,अगर नहीं तो फिर क्या रास्ते अपनाए जा सकते हैं? देश अपने ही लोगों से इसका जवाब मांग रहा है। ——————————————आम आदमी का सगा कोई नहीं :अखबारों में 2जी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ घोटालों की खबरें आना कम हुईं तो एक नया घोटाला सामने आ गया। मुंबई में आदर्श हाउसिंग सोसायटी मामले में नियम तोड़े-मरोड़े गए और करोड़ों की कीमत के फ्लैट कौडिय़ों के भाव कुछ खास लोगों को मिले। आदर्श हाउसिंग को ऑपरेटिव सोसाइटी घोटाले की खबरों से परेशान भले ही पूर्व सैन्य प्रमुखों - जनरल दीपक कपूर, जनरल एन सी विज और एडमिरल माधवेंद्र सिंह - ने फ्लैट वापस करने की पेशकश की, लेकिन रक्षा मंत्रालय ने इसे सीधा आपराधिक साजिश करार दिया। इस घोटाले की शर्मिंदगी से जूझता मंत्रालय अब बाकायदा जांच के आदेश देने की सोच रहा है। जांच की प्रकृति क्या होगी, इस बारे में फैसला प्रधानमंत्री की स्वदेश वापसी के बाद होगा। सूत्रों के मुताबिक जांच की घोषणा सोमवार तक हो सकती है। कॉमनवेल्थ में घोटालों के लिए सबसे ज्यादा आरोप सुरेश कलमाड़ी पर लग रहे हैं। गेम्स से जुड़े निर्माण कार्यों के दौरान इतने मजदूर मरे, हजारों लोगों को उनकी जगह से बेदखल करके दिल्ली के एक सूनसान कोने में फेंक दिया गया लेकिन मजदूर और शोषित वर्ग की ठेकेदार लेफ्ट पार्टियों का शायद ही कोई विरोध देखने को मिला। कर्नाटक में खनन माफिया रेड्डी भाई जो चाहते हैं वह करते हैं और पूरा प्रशासन उनकी जेब में रहता है। ये कुछ उदाहरण मात्र हैं, यह बताने के लिए कि आम आदमी का सगा कोई नहीं है। बड़ी संख्या में लोग मानते हैं कि सेना में भी (खासकर अफसरों के स्तर पर) भ्रष्टाचार चरम पर है लेकिन उसकी खबरें आम तौर पर मीडिया में नहीं आ पातीं। सेना का सब सम्मान करते हैं लेकिन लेकिन आदर्श हाउसिंग सोसायटी और सुकना जमीन घोटाले जैसे मामलों को देखते हुए सेना पर भी भरोसा कम होता रहा है। कुछ दिनों पहले पूर्व विधि मंत्री और प्रसिद्ध वकील शांति भूषण ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के 16 में से 8 चीफ जस्टिस, भ्रष्ट थे। आरोप बेहद गंभीर था और शायद शांति भूषण पर इसके लिए अदालत की अवमानना का मामला बनता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने नी-जर्क रीऐक्शन की बजाय इसे बेहद संजीदा और परिपक्व तरीके से लिया। शायद शांति भूषण के आरापों में रत्ती भर सचाई रही होगी तभी कोई उनके खिलाफ कार्रवाई करने का नैतिक साहस नहीं जुटा पाया। कहने का मतलब यह है कि न्याय की सर्वोच्च संस्था के कुछ लोग भी संदेह से परे नहीं हैं। फिर हमारा रहनुमा कौन है?————-कैसे लगे अंकुश भ्रष्टाचार हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है। ज्यादातर लोग इसके आदी हो गए हैं। यह खतरे का संकेत है। इससे भ्रष्टाचार के दंड से बचने की प्रवृत्ति बढ़ेगी और भ्रष्टाचार को स्वीकृति देने की संस्कृति और मजबूत होगी। भ्रष्टाचार का खामियाजा सबसे अधिक गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को भुगतना पड़ता है। गरीबी उन्मूलन की योजनाओं का इससे बंटाढार हो जाता है, कानून एवं न्याय का राज खतरे में पड़ जाता है। नागरिक जिम्मेदारियों और मर्यादित आचरण के आदर्शों की जगह संकीर्ण स्वार्थों पर आधारित दृष्टिकोण हावी हो जाते हैं। आदर्शवादी युवा पीढ़ी के लिए यह जहर का काम करता है। सबसे दुखद पहलू तो यह है कि एक तरफ वर्षों से इसका अध्ययन हो रहा है, लेकिन दूसरी ओर यह मर्ज बढ़ता ही जा रहा है। बैड गवर्नेंस की हम जितनी आलोचना करते हैं, शासन में बैठे अधिकारी भ्रष्टाचार को उतने ही उत्साह से गले लगाते हैं । ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट विचलित करने वाली है। यह रिपोर्ट बताती है कि कल्याण योजनाओं से लाभान्वित होने वाले एक तिहाई बीपीएल परिवारों को कानूनसम्मत सेवाएँ हासिल करने के लिए रिश्वत देना पड़ती है। लगभग सभी राज्यों में अन्य विभागों की अपेक्षा पुलिस तंत्र सर्वाधिक भ्रष्ट है। यह अत्यंत निंदनीय स्थिति है और इसका प्रभाव सामाजिक आधार को ही खोखला कर रहा है। भ्रष्टाचार का सबसे दुखद पहलू तो यह है कि एक तरफ वर्षों से इसका अध्ययन हो रहा है, लेकिन दूसरी ओर यह मर्ज बढ़ता ही जा रहा है। बैड गवर्नेंस की हम जितनी आलोचना करते हैं, शासन में बैठे अधिकारी भ्रष्टाचार को उतने ही उत्साह से गले लगाते हैं। कानून का शासन कायम करना मुश्किल हो गया है इसलिए स्टिंग ऑपरेशन भी बेअसर साबित हो रहे हैं। कुछ छोटे अधिकारियों के खिलाफ कभी-कभार कार्रवाई भी हो जाती है मगर अधिकांश मामलों में बड़े अधिकारियों पर हाथ नहीं डाला जाता। संयुक्त सचिव और बड़े पदों पर आसीन अधिकारियों या मंत्री के खिलाफ कार्रवाई के लिए उनके ऊपर बैठे मंत्रियों या अधिकारियों की पुर्वानुमति आवश्यक है। अधीनस्थों के खिलाफ उच्चाधिकारियों की पूर्वानुमति मिल जाए, ऐसा दुर्लभ ही होता है। हाल की एक मीडिया रिपोर्ट तो बताती है कि भ्रष्टाचार में लिप्त रहे किसी अधिकारी के खिलाफ रिटायरमेंट के दस वर्षों बाद तक कार्रवाई करने के लिए उच्चाधिकारी की पूर्वानुमति आवश्यक बनाने के बारे में सरकार विचार कर रही है। तब तक तो सब कुछ खत्म हो जाएगा। भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए अनगिनत आयोग और समितियाँ गठित की जा चुकी हैं, मगर केंद्र और अधिकांश राज्य सरकारों ने पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए कोई पहल नहीं की। एक निश्चित समय सीमा के भीतर पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश जारी किए मगर इससे भी बात नहीं बनी। फायदे के लिए कायदे ताक पर :भूमाफियाओं पर दहाडऩे वाला मंत्रिमंडल जिस तरह के फैसले ले रहा है, उससे उद्योगपतियों, नेताओं और भूमाफिया ही चाँदी कूट रहे हैं । एक तरफ सरकारी जमीनों को कौडिय़ों के भाव औद्योगिक घरानों के हवाले किया जा रहा है , वहीं दूसरी तरफ बड़े बिल्डरों को फायदा पहुँचाने के लिये नियमों को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है । सरकार के फैसले से नाराज छोटे बिल्डरों को खुश करने के लिये भी नियमों को बलाए ताक रख दिया गया है । गोया कि सरकार नेताओं को चंदा देने वाली किसी भी संस्था की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती । सरकारी कायदों की आड़ में जमीनों के अधिग्रहण का खेल पुराना है , लेकिन अब हालात बेकाबू हो चले हैं । नेताओं की छत्रछाया में बेजा कब्जा कर जमीनें बेचने वाले भूमाफिया फलफूल रहे हैं । करोड़ों की सरकारी जमीनें निजी हाथों में जा चुकी है । कई मामलों में नेताओं और अफसरों की मिलीभगत के चलते सरकार को मुँह की खाना पड़ी है । कृषि भूमि पर भी टाउनशिप खड़ी हो रही है। किसान तात्कालिक फायदे के लिये अपनी जमीनें भूमाफियाओं को बेच रहे हैं । सरकार की नीतियों के कारण सिकुड़ती कृषि भूमि ने धरतीपुत्रों को मालिक से मजदूर बना दिया है । पिछले छ: दशकों में आदिवासी तथा अन्य क्षेत्रों की खनिज संपदा का तो बड़े पैमाने पर दोहन किया गया है मगर इसका फायदा सिर्फ पूँजीपतियों को मिला है। जो आबादियाँ खनन आदि के कारण बड़े पैमाने पर विस्थापित हुईं, अपनी जमीन से उजड़ीं, उन्हें कुछ नहीं मिला। यहाँ तक कि आजीविका कमाने के संसाधन भी नहीं मिले, सिर पर एक छत भी नहीं मिली और पारंपरिक जीवनपद्धति छूटी, रोजगार छूटा, सो अलग। सरकार को उसकी हैसियत बताने के लिये जनता को अपनी ताकत पहचानना होगा और जागना होगा नीम बेहोशी से, क्योंकि जमीनों की इस बंदरबाँट को थामने का कोई रास्ता अब भी बचा है ? ————————————सीखो इन आंखों को पढऩा :ये गरीबों की आँखों से आँसू पोंछने का धंधा भी चंगा है। मैं जब बच्चा था, तब भी मैं यही सुनता था कि हर गरीब की आँख का आँसू पोंछेगी सरकार। अब भी ठीक यही सुनता हूँ, यानी गरीब तब से अब तक लगातार रो रहा है और इन बेचारों मंत्रियों को तब से अब तक इतनी फुर्सत नहीं मिल रही है कि इनके आँसू पोंछे। मेरा सीधा-सा सवाल है कि गरीब अगर रोते जा रहे हैं महाशय, तो ये चौड़ी-चौड़ी सड़कें, ये बड़े-बड़े बाँध, ये चमकीले मॉल, ये बड़ी-बड़ी होटलें, ये मेट्रो आदि तब कौन बना रहा है? अगर गरीब ही बना रहे हैं, मेहनत-मजदूरी करके बना रहे हैं, तो उनकी आँखों में फिर भी आँसू क्यों हैं? और हैं तो उन्हें पोंछ क्यों नहीं रहे हो? पोंछ दो, तुम्हारा रूमाल ही तो खराब होगा, हालाँकि रूमाल भी तुम अपने पैसे से थोड़े ही खरीदकर लाए होंगे? और अगर ये आँसू ऐसे हैं जो कि रूमाल से नहीं पुछेंगे तो जैसे भी पोंछ सकते हो, पोंछ दो। इतने सालों से ये काम पेंडिंग क्यों रखे हुए हो? और अगर गरीब काम भी कर रहे हैं, उनकी आँखों में आँसू भी हैं तो तुम्हारी आँखों में एकाध आँसू भी है या नहीं? और नहीं है तो किसी से उधार ले लो। तुम्हारे पास जो रूमाल है, उसका इस्तेमाल कभी तुमने अपनी आँखों के आँसुओं को पोंछने के लिए भी किया है या नहीं। और वह नेता किसी की आँखों के आँसू क्या पोंछेगा जिसकी आँखें अपने दुख तक से कभी गीली नहीं हुईं? शायद उसके लिए हर गरीब की आँख के आँसू पोंछना बस एक राजनीतिक मुहावरा है जिसे वह माइक देखकर रटना शुरू करता है ताकि अगली सुबह अखबार में छापने के काम आ सके। और अगर तुम सचमुच गरीब की आँखों में आँसू देख रहे हो, सिर्फ आँसू ही आँसू देख रहे हो, तो तुम्हारी आँखें तो अब तक अंधी हो जानी चाहिए थीं, पथरा जानी चाहिए थीं लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तुम्हारी आँखें तो बड़ी चंचल हैं, अपना शिकार ढूँढने में एक मिनट की भी देरी नहीं करतीं और अपने शिकारी से सावधान रहने में भी जरा भी चूक नहीं करतीं! जरा गरीबों की तरफ एक बार देख लो। उनकी आँखों में आँसू ही नहीं हैं, गुस्सा भी है। उनकी आँखों में वह रोशनी भी है जिसे देखकर तुम्हारी आँखें अंधी हो सकती हैं और वह अंधकार भी है जिसे देखकर तुम्हें भ्रम हो सकता है कि तुम अंधे हो चुके हो। उनकी आँखों की तरफ देखते हुए, जरा आईने में अपनी आँखों की तरफ भी देख लो। शायद अपनी आँखों को भी तुम पढऩा सीख सको।————————————————————————————-कारपोरेट का शिकार अपना भारत भीअनिल रघुराजसंवेदनाशून्यता और बेशर्मी की हद है ये बाजार। कॉरपोरेट प्रॉफिट उन जांबाज लुटेरों की लूट की तरह है, जो यूरोप के देशों से जहाजों में निकल कर शेष महाद्वीपों से लाया करते थे। आज तकनीक के आविष्कार ने उस लूट को जरा सभ्यता का जामा पहना दिया है। तलवार और तोप के स्थान पर कागज और कैल्क्यूलेटर या लैपटॉप आ गए हैं। दुनिया भर की आर्थिक विषमता इस बात का सबूत है। इधर जुही चावला का कुरकुरे का एक विज्ञापन चल रहा है, जिसमें दूल्हे के पीछे बाराती नहीं हैं, बैंड नहीं है। बेचारा स्टीरियो टेप रिकॉर्डर गोद में लेकर घोड़ी पर अकेला ही चला आ रहा है दुल्हन के दरवाजे पर। स्टॉक मार्केट की तेजी बिन बारातियों के दूल्हों का विवाह लग रहा है। आम निवेशक समझदार है इस बार। इस लूट में वे अपनी पॉकेट नहीं कटने दे रहे। इंडिया शाइनिंग की मीडिया चिल्लाहट को अनसुना कर के चुनावों में नेता को यह अवाम धूल चटा सकती है तो क्या कॉर्पोरेट इससे अछूता रहेगा? इस मार्च पास्ट का मतलब?सरकार देश भर में मार्च पास्ट करवा रही है। मार्च पास्ट तो इसलिए किया जाता है कि आम नागरिक को भरोसा हो कि सरकार नागरिक सुरक्षा के लिए पर्याप्त सक्षम है। पर ये कश्मीर, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्र, असम के मार्च पास्ट तो दमनकारी व गलत तत्वों को संरक्षण देने के लिए किए जा रहे हैं। आम नागरिक को सरकार आतंकित कर रही है ताकि कोई अन्याय के खिलाफ जुबान न खोले। जिज्ञासा प्रकट करना और अटकलें लगाना मानव मन की दो कमजोरियां है। मीडिया की बेशर्मी देखो। अपने आकाओं (जिनसे विज्ञापन की आय होती है) के खिलाफ कुछ नहीं बोलते। हालांकि उन आकाओं के राजनीतिक चमचों व सरकारी अफसरों (जिनके हिस्से खुरचन तक भी पूरी नहीं आती) की पैंट उतारने में ये कोई कसर नही छोड़ते क्योंकि इनको पता है कि जनता को तो तालियाँ पीटनी है, ओपिनियन पोल की प्रीमियम दरों पर एसएमएस करने हैं। 'वालस्ट्रीटÓ की हिन्दी डबिंग तो अपने ही खिलाफ जंग को न्योता देना है। सुरेश कलमाड़ी और राजा को निशाना बनाने पर निर्माण के ठेके और ब्रॉडबैंड के ठेके भी प्रतिद्वन्द्वियों से हस्तांतरित होते रहेंगे। आपस की दोस्ती भी बनी रहेगी। वेयरहाउस शेयरिंग भी तो करनी है कॉस्ट कटिंग के लिए। आपस में एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलने से तो सब के लाभ खतरे में पड़ जाएंगे। के एम अब्राहम शेयर ट्रेडिंग के लिए लाइसेंस नहीं दे रहा तो क्या हुआ। सेबी उसके बाप की थोड़े ही है, उसकी जगह कोई और साइन करेगा। जय शेयर बाजार (मत दो भारत में कैसिनो के लाइसेंस, हम बाजार को ही कैसिनो बना डालेंगे)! जय कॉरपोरेट ।————————————————आर्थिक विकास में बाधा है भ्रष्टाचार :भारत के महाशक्ति बनने की सम्भावना का आकलन अमेरिका एवं चीन की तुलना से किया जा सकता है। महाशक्ति बनने की पहली कसौटी तकनीकी नेतृत्व है। दूसरी कसौटी श्रम के मूल्य की है। तीसरी कसौटी शासन के खुलेपन की है और चौथी कसौटी भ्रटाचार की। सरकार भ्रट हो तो जनता की ऊर्जा भटक जाती है। देश की पूंजी का रिसाव हो जाता है। भ्रष्ट अधिकारी और नेता धन को स्विट्जरलैण्ड भेज देते हैं। इसके अलावा पांचवीं कसौटी असमानता की है। गरीब और अमीर के अन्तर के बढऩे से समाज में वैमनस्य पैदा होता है। गरीब की ऊर्जा अमीर के साथ मिलकर देश के निर्माण में लगने के स्थान पर अमीर के विरोध में लगती है। भ्रटाचार में कमी के संकेत मिल रहे हैं। सूचना के अधिकार ने सरकारी मनमानी पर कुछ न कुछ लगाम अवश्य कसी है। परन्तु अभी बहुत आगे जाना है। अमीरी-गरीबी के मध्य असमानता भी अपने देश में कैंसर की तरह पनपती जा रही है। मूल रोग है आर्थिक नीतियां। बड़ी कम्पनियों को सरकार खुली छूट दे रही है। इनके लाभ उत्तरोत्तर बढ़ रहे हैं जबकि गरीब कराह रहा है। गरीब पर ढाये गये इस अत्याचार पर सरकार मनरेगा द्वारा मरहम पट्टी करने का दिखावटी प्रयास कर रही है। परन्तु इस योजना में भी भ्रटाचार तेजी से बढ़ रहा है। इसके अतिरिक्त इस योजना में समाज की ऊर्जा निकम्मेपन एवं फर्जी कार्यों में खर्च हो रही है। इस प्रकार भ्रष्टाचार एवं असमानता दोनों समस्यायें आपस में जुड़ी हुई हैं।देश कैसे बनेगा महाशक्ति!सरकार की मंशा इन समस्याओं को हल करने की है ही नहीं। राजनीतिक पार्टियों का मूल उद्देश्य सत्ता पर काबिज रहना है। इन्होंने युक्ति निकाली है कि गरीब को राहत देने के नाम पर अपने समर्थकों की टोली खड़ी कर लो। कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए भारी भरकम नौकरशाही स्थापित की जा रही है। सरकारी विद्यालयों एवं अस्पतालों का बेहाल सर्वविदित है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 40 प्रतिशत माल का रिसाव हो रहा है। मनरेगा के मार्फत निकम्मों की टोली खड़ी की जा रही है। 100 रुपये पाने के लिये उन्हें दूसरे उत्पादक रोजगार छोडऩे पड़ रहे हैं। अत: भ्रटाचार और असमानता की समस्याओं को रोकने में हम असफल हैं। यही हमारी महाशक्ति बनने में रोड़ा है। उपाय है कि तमाम कल्याणकारी योजनाओं को समाप्त करके बची हुयी रकम को प्रत्येक मतदाता को सीधे रिजर्व बैंक के माध्यम से वितरित कर दिया जाये। आकलन है कि प्रत्येक परिवार को 2000 रुपये प्रति माह मिल जायेंगे जो उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति को पर्याप्त होगा। उन्हें मनरेगा में बैठकर फर्जी कार्य का ढोंग नहीं रचना होगा। वे रोजगार करने और धन कमाने को निकल सकेंगे। कल्याणकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रटाचार स्वत: समाप्त हो जायेगा। इस फार्मूले को लागू करने में प्रमुख समस्या राजनीतिक पार्टियों का सत्ता प्रेम है। सरकारी कर्मचारियों की लॉबी का सामना करने का इनमें साहस नहीं है। सारांश है कि भारत महाशक्ति बन सकता है यदि राजनीतिक पार्टियों द्वारा कल्याणकारी कार्यक्रमों में कार्यरत सरकारी कर्मचारियों की बड़ी फौज को खत्म किया जाये। इन पर खर्च की जा रही रकम को सीधे मतदाताओं को वितरित कर देना चाहिये। इस समस्या को तत्काल हल न करने की स्थिति में हम महाशक्ति बनने के अवसर को गंवा देंगे।—————————- कुछ करना होगा : केंद्र कहता तो है कि वह सुधार के पक्ष में है मगर इस मामले में नेतृत्वविहीन दिखता गृह मंत्रालय बिलकुल निष्क्रिय नजर आता है। गृह मंत्रालय का तर्क है कि पुलिस और खुफिया एजेंसियाँ राज्य सरकारों के अधीन हैं और इन मामलों में गृह मंत्रालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इस तर्क में कोई दम नहीं है क्योंकि केंद्र ने भी अब तक पुलिस व्यवस्था में सुधार जाँच आयोगों का औचित्य भी संदेह के घेरे में है। 1992 के बाबरी मस्जिद कांड की जाँच कर रहे लिब्रहान आयोग की समय-सीमा 47वीं बार बढ़ाई गई। गुजरात में नानावती आयोग को भी पाँचवीं बार मोहलत मिली। पुलिस और खुफिया एजेंसियों का राजनीतिकरण हो चुका है, राजनीति के अपराधीकरण की प्रक्रिया तेज है। अपराधों के राजनीतिकरण की प्रक्रिया में भी तेजी आई है। फौजदारी कानून व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी है। परिणामस्वरूप न्यायालय की बजाय अन्य स्रोतों से न्याय प्राप्त करने की प्रवृत्ति बढ़ गई है।ल सीबीआई और अन्य खुफिया एजेंसियाँ भी राजनीतिक दखलंदाजी की शिकार हैं। इसी कारण हम आतंकवाद का सामना सफलतापूर्वक नहीं कर पा रहे हैं। अत्यंत कठोर कानूनों के प्रति समाज में आक्रोश पैदा हो जाता है क्योंकि इनका दुरुपयोग गरीबों और कमजोरों के खिलाफ किया जाता है। कोई भी व्यक्ति ऐसा राज्य नहीं चाहता जहाँ सुरक्षा एजेंसियाँ हावी हों। साथ ही वह मानवाधिकारों में कोई कमी भी नहीं चाहता जबकि यह सच है कि अगर विद्यमान कानूनों को भी पूरी तरह लागू किया जाए तो वे प्रभावी होंगे। मगर ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि इन्हें लागू करने वाले तंत्र की धार को राजनीतिक रूप से कुंद कर दिया गया है। जाँच आयोगों का औचित्य भी संदेह के घेरे में है। 1992 के बाबरी मस्जिद कांड की जाँच कर रहे लिब्रहान आयोग की समय-सीमा 47वीं बार बढ़ाई गई। गुजरात में नानावती आयोग को भी पाँचवीं बार मोहलत मिली। हमें लोकतंत्र को बचाने के लिए तुरंत कुछ करना होगा। —————————हम कहां ?भ्रष्टाचार के मामले में भारत ने साल भर में काफी तरक्की कर ली है। ट्रांस्पैरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी वर्ष 2010 के भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत तीन पायदान नीचे गिर कर 87वें स्थान पर पहुंच गया है। जबकि 2009 में वह 84वें स्थान पर था। सूची में एशिया में भूटान को सबसे कम भ्रष्ट देश बताया गया है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण कई अमीर देशों में भ्रष्ट्राचार में वृद्धि हुई है। बर्लिन स्थित गैर सरकारी संगठन, ट्रांस्पैरेंसी इंटरनेशनल द्वारा 178 देशों के इस सूचकांक में चीन 78वें स्थान पर है। यानी वह भारत की बनिस्पत कम भ्रष्ट देश है। हालांकि पाकिस्तान भारत से भी अधिक भ्रष्ट देशों में शुमार है। सूचकांक में वह 143वें स्थान पर है। जबकि बांग्लादेश पाँच पायदान की छलांग लगाकर 134वें नंबर पर है। भूटान काफी आगे 36वें नंबर पर हैं। डेनमार्क, न्यूजीलैंड और सिंगापुर इस फेहरिस्त में अव्वल हैं। अगर अफ्रीकी देशों की बात करें तो रवांडा,बोस्तवाना और घाना की स्थिति सुधरी है। लातिन अमरीकी देशों में चीली (21) और उरुग्वे (24) ने अच्छा प्रदर्शन किया है। लेकिन सबसे भ्रष्ट समझे जाने वाले देशों- अफगानिस्तान, बर्मा और सोमालिया की छवि में कोई सुधार नहीं हुआ है। ये देश सूची में सबसे नीचे हैं। मध्य पूर्व में इराक सबसे नीचे है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक यूरोप के कई देश पिछले एक साल में ज्यादा भ्रष्ट हुए हैं खासकर चेक गणराज्य और हंगरी। रूस गिरकर 154वें नंबर पर आ गया है तो इटली गिरकर 67 पर पहुँच गया है। बर्लिन की संस्था ने बड़े पैमाने पर मत सर्वेक्षण के बाद सूची जारी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ देशों में भ्रष्ट्राचार कम हुआ है लेकिन सब जगह ऐसे हालात नहीं हैं। संस्था के सदस्यों का कहना है कि राष्ट्रमंडल खेलों में उजागर हुई अनियमितताओं से भारत की छवि खराब हुई है। इस सूचकांक में भ्रष्टाचार को नीचे की ओर गिरता हुआ दिखाया गया है। यानी सबसे कम भ्रष्ट देश सूचकांक में सबसे ऊपर तथा सर्वाधिक भ्रष्ट देश सूचकांक में सबसे नीचे स्थित होगा। इस वर्ष सूचकांक में शामिल किए गए 178 देशों में से तीन चौथाई देशों ने शून्य से 10 के पैमाने पर पांच से भी कम अंक हासिल किया है। इससे दुनिया में भ्रष्टाचार की गंभीर समस्या का संकेत मिलता है। इस पैमाने पर इस वर्ष भारत को 3.3 अंक हासिल हुए हैं, जबकि 2009 में 3.4 अंक हासिल हुए थे। नए सूचकांक को जारी करते हुए ट्रांस्पैरेंसी इंटरनेशनल ने भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी के लिए भ्रष्टाचार निरोधी कानूनों का क्रियान्वयन ठीक से न होने को जिम्मेदार ठहराया है। संस्था की अध्यक्ष ह्युगेट लैबेल ने एक बयान में कहा है, कि हमें मौजूदा नियमों व कानूनों को अधिक चुस्त बनाने की आवश्यकता है। भ्रष्ट लोगों को छुपने के लिए तथा उनके धन को छुपाने के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। इस सूचकांक में सोमालिया दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों में हैं। सबसे अधिक भ्रष्ट देशों में अफगानिस्तान और म्यांमार दूसरे स्थान पर हैं। इस मामले में इराक चौथे स्थान पर है। सूची में एशिया में भूटान को सबसे कम भ्रष्ट देश बताया गया है। इस सूची में अमेरिका 22वें स्थान पर है। जबकि डेनमार्क, सिंगापुर, न्यूजीलैंड को सबसे कम भ्रष्ट देश बताया गया है।————————-भारतीय टैक्स चोरी की जन्मपत्री फ्रांस मेंसुरेश चिपलूणकरभारत के करोड़ों ईमानदार करदाताओं और नागरिकों के लिये यह एक खुशखबरी है कि फ्रांस के एक बैंक के दो कर्मचारियों हर्व फेल्सियानी और जॉर्जीना मिखाइल ने दावा किया है कि उनके पास स्विस बैंकों में से एक बैंक में स्थित 180 देशों के कर चोरों की पूरी जानकारी मौजूद है। 2 साल से इन्होंने लगातार यूरोपीय देशों की सरकारों को ईमेल भेजकर टैक्स चोरों को पकड़वाने में मदद की पेशकश कर रखी है। जर्मनी की गुप्तचर सेवा को भेजे अपने ईमेल में इन्होंने कहा था कि ये लोग स्विटजरलैण्ड स्थित एक निजी बैंक के महत्वपूर्ण डाटा और उस कम्प्यूटर तक पुलिस की पहुँच बना सकते हैं। इसी प्रकार के ईमेल ब्रिटेन, फ्रांस और स्पेन की सरकारों, विदेश मंत्रालयों और पुलिस को भेजे गये हैं । यूरोप के देशों में इस बात पर बहस छिड़ी है कि एक हैकर या बैंक के कर्मचारी द्वारा चोरी किये गये डाटा पर भरोसा करना ठीक है और क्या ऐसा करना नैतिक रूप से सही है? लेकिन फेल्सियानी जो कि एचएसबीसी बैंक के पूर्व कर्मचारी हैं, पर फिलहाल फ्रांस और जर्मनी तो भरोसा कर रहे हैं, जबकि स्विस सरकार लाल-पीली हो रही है। एचबीसी के वरिष्ट अधिकारियों ने माना है कि फेल्सियानी ने बैंक के मुख्यालय और इसकी एक स्विस सहयोगी बैंक से महत्वपूर्ण डाटा को कॉपी कर लिया है और उसने बैंक की गोपनीयता सम्बन्धी सेवा शर्तों का उल्लंघन किया है। फेल्सियानी ने स्वीकार किया है कि उनके पास 180 देशों के विभिन्न ग्राहकों का डाटा है, लेकिन उन्होंने किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि इस डाटा से उनका उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, बल्कि स्विस बैंक द्वारा अपनाई जा रही गोपनीयता बैंकिंग प्रणाली पर सवालिया निशान लगाना भर है। फ्रांस सरकार फेल्सियानी से प्राप्त जानकारियों के आधार पर टैक्स चोरों के खिलाफ अभियान छेड़ चुकी है। स्विस पुलिस ने फेल्सियानी के निवास पर छापा मारकर उसका कम्प्यूटर और अन्य महत्वपूर्ण हार्डवेयर जब्त कर लिया है लेकिन फेल्सियानी का दावा है कि उसका डाटा सुरक्षित है और वह किसी दूरस्थ सर्वर पर अपलोड किया जा चुका है। इधर फ्रांस सरकार का कहना है कि उन्हें इसमें किसी कानूनी उल्लंघन की बात नजर नहीं आती, और वे टैक्स चोरों के खिलाफ अभियान जारी रखेंगे। फ्रांस सरकार ने इटली की सरकार को 7000 अकाउंट नम्बर दिये, जिसमें लगभग 7 अरब डालर की अवैध सम्पत्ति जमा थी। स्पेन के टैक्स विभाग ने भी इस डाटा का उपयोग करते हुए इनकी जाँच शुरू कर दी है। फेल्सियानी ने वर्ष 2000 में एचएसबीसी बैंक की नौकरी शुरू की थी, वह कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग में स्नातक और बैंक के सुरक्षा सॉफ्टवेयर के कोड लिखता है। बैंक में उसका कई बार प्रमोशन हो चुका है और 2006 में उसे जिनेवा स्थित एचबीसी के मुख्यालय में ग्राहक डाटाबेस की सुरक्षा बढ़ाने के लिये तैनात किया गया था। इसलिये फेल्सियानी की बातों और उसके दावों पर शक करने की कोई वजह नहीं बनती। फेल्सियानी का कहना है कि बैंक का डाटा वह एक रिमोट सर्वर पर बैक-अप के रुप में सुरक्षित करके रखता था, जो कि एक निर्धारित प्रक्रिया थी, और मेरा इरादा इस डाटा से पैसा कमाना नहीं है। जून 2008 से अगस्त 2009 के बीच अमेरिका के कर अधिकारियों ने स्विस बैंक के नट-बोल्ट टाइट किये तब अमेरिका के 4450 कर चोरों के बैंक डीटेल्स उन्हें दे दिये। कहने का मतलब यह है कि स्विटजरलैण्ड की एक बैंक (जी हाँ फिलहाल सिर्फ एक बैंक) के 180 देशों के हजारों ग्राहकों (यानी डाकुओं) के खातों की पूरी जानकारी फेल्सियानी नामक शख्स के पास है अब हमारे ईमानदार बाबू के जमीर और हिम्मत पर यह निर्भर करता है कि वे यह देखना सुनिश्चित करें कि फेल्सियानी के पास उपलब्ध आँकड़ों में से क्या भारत के कुछ चोरों के आँकड़े भी हैं? भले ही इस डाटा को हासिल करने के लिये हमें फेल्सियानी को लाखों डालर क्यों न चुकाने पड़े, लेकिन जब फ्रांस , जर्मनी, स्पेन और अमेरिका जैसे देश फेल्सियानी के इन आँकड़ों पर न सिर्फ भरोसा कर रहे हैं, बल्कि छापेमारी भी कर रहे हैं तो हमें संकोच नहीं करना चाहिये। भारत के पिछले लोकसभा चुनावों में स्विस बैंकों से भारत के बड़े-बड़े मगरमच्छों द्वारा वहाँ जमा किये गये धन को भारत वापस लाने के बारे में काफी हो-हल्ला मचाया गया था। एक व्यक्ति के रूप में, प्रधानमंत्री की ईमानदार छवि पर पूरा यकीन है, लेकिन क्या वे इस मौके का उपयोग देशहित में करेंगे? यदि फेल्सियानी की लिस्ट से भारत के 8-10 मगरमच्छ फँसते हैं, तो मनमोहन सिंह भारत में इतिहास-पुरुष बन जायेंगे। परन्तु जिस प्रकार की आत्माओं से वे घिरे हुए हैं, उस माहौल में क्या ऐसा करने की हिम्मत जुटा पायेंगे? उम्मीद तो कम ही है, क्योंकि दूरसंचार मंत्री ए. राजा के खिलाफ पक्के सबूत, मीडिया में छपने के बावजूद वे उन पर कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं, तो फेल्सियानी की स्विस बैंक लिस्ट में से पता नहीं कौन सा भयानक भूत निकल आये और उनकी सरकार को हवा में उड़ा ले जाये।—————-संकट की दस्तक :संकट दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। मुद्रास्फीति की दर बेकाबू बनी हुई है। दो अंकों में पहुँच गई मुद्रास्फीति की दर नीचे आने का नाम नहीं ले रही। इसका सीधा असर ब्याज दरों पर पड़ा है और रिजर्व बैंक की सख्त मौद्रिक नीति के कारण छोटे-बड़े उद्यमियों और निवेशकों के लिए बैंकों और खुले बाजार से निवेश के वास्ते धन जुटाना मुश्किल हो गया है। यही नहीं, अमेरिकी वित्तीय संकट के कारण बड़े देशी कारपोरेट समूहों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों से नए निवेश और विस्तार के वास्ते पूँजी जुगाडऩे के ज्यादातर स्रोत सूख से गए हैं। इसका नए निवेश पर नकारात्मक असर तय है। निवेश में गिरावट अर्थव्यवस्था की विकास दर की रफ्तार पर ब्रेक लगा सकती है। अधिकांश आर्थिक विश्लेषकों और अर्थव्यवस्था को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह पैदा हो रही है कि कहीं वह स्टैगफ्लेशन की गिरफ्त में तो नहीं आ रही ? स्टैगफ्लेशन की स्थिति तब पैदा होती है जब एक ओर अर्थव्यवस्था की विकास दर गिर रही हो और दूसरी ओर मुद्रास्फीति की दर बढ़ रही हो या ऊँचाई पर बनी हुई हो। हालाँकि इस मुद्दे पर अर्थशास्त्रियों में मतभेद हैं लेकिन अर्थव्यवस्था उस जैसी स्थिति में ही फँसती दिख रही है। अगर किसी चमत्कार ने नहीं बचाया तो एक बार स्टैगफ्लेशन की गिरफ्त में फँसने के बाद अर्थव्यवस्था का उससे बाहर निकलना न सिर्फ बहुत मुश्किल हो जाता है बल्कि आम लोगों के लिए वह प्रक्रिया बहुत तकलीफदेह हो जाती है। साफ है कि आर्थिक संकट की सुरसा ने अपना आकार बढ़ाना शुरू कर दिया है। लेकिन लाख टके का सवाल है कि क्या मनमोहन सिंह इस सुरसा से निपटने के लिए हनुमान प्रयास करेंगे? अफसोस, हनुमान प्रयास तो नहीं यूपीए सरकार ऊँट की तरह रेत में सिर छिपाकर हनुमान चालीसा जरूर पढ़ती दिख रही है। लेकिन क्या इससे संकट टल जाएगा ?
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::सनातन अविकास नोम चॉम्स्की विश्व व्यापार संगठन के नियमों पर एक नजर डाल लें, जैसे ट्रिप और ट्रिम-व्यापार संबंधी बौद्धिक संपत्ति तथा व्यापार संबंधी निवेश उपाय आदि कार्यक्रम विकास को और वृद्धि को अवरुद्ध करने के लिए ही बने हुए लगते हैं। इसलिए बौद्धिक संपत्ति के अधिकार बस एकाधिकारपूर्ण मूल्य निर्धारण और नियंत्रण बनाए रखने के लिए है। इससे वृद्धि और विकास में बाधा पड़ती है, और उद्देश्य भी यही है। उद्देश्य है सृजनात्मकता, वृद्धि और विकास में कटौती करना और लाभ को असाधारण स्तर तक बनाए रखना। जरा ध्यान से देखें। अनुसंधान और विकास के एक बड़े हिस्से के लिए तो वैसे भी जनता का पैसा लगता है। ऐसे में एकाधिकारवादी मूल्य निर्धारण का कोई उद्देश्य नहीं रह जाएगा, और यह समाज कल्याण के हक में एक बहुत बड़ा फायदा होगा। ऐसा न करने का कोई उपयुक्त आर्थिक कारण नहीं है। एक आर्थिक उद्देश्य है, लाभ, पर यह वृद्धि और विकास को अवरुद्ध करने की कोशिश है। सवाल हो सकता है कि व्यापार संबंधी निवेश उपायों का क्या होगा? ये उपाय क्या करते हैं? ट्रिप्स तो सीधे-सीधे अमीर और ताकतवर निगमों, जिनको सार्वजनिक धन से रियायतें दी जाती हैं, के पक्ष में संरक्षणवाद है। ट्रिम की बात थोड़ी ज्यादा बारीक है। उनके अनुसार कोई देश किसी निवेशकर्ता के निर्णयों पर रोक नहीं लगा सकता। मान लीजिए जनरल मोटर्स आउटसोर्स करने का, यानी अपने कल-पुर्जों का निर्माण किसी अन्य देश में करवाने का, जहाँ मजदूर संगठनों से मुक्त सस्ता श्रम उपलब्ध हो, और उन्हें वापस जनरल मोटर्स में लाने का निर्णय लेती है। अब ऐसे में एशिया के सफल विकासशील देशों को देखें तो उनके विकास करने का एक तरीका था इस तरह की चीज को रोकना, यह जोर देते हुए कि अगर विदेशी निवेश होना है तो उसे इस तरीके से होना पड़ेगा कि वह प्राप्त करने वाले देश के लिए उत्पादनशील हो। तो यह जरूरी था कि तकनीक का आदान-प्रदान हो, या फिर आप वहीं निवेश कर सकते थे जहाँ वे चाहते थे, या कुल निवेश का कुछ हिस्सा ऐसी निर्मित वस्तुओं के निर्यात में लगना चाहिए जिनसे कुछ आय हो। ऐसी बहुत सी युक्तियाँ। यह भी एक कारण है पूर्वी एशिया के आर्थिक चमत्कार का। इसी तरीके से अन्य विकासशील देशों का भी विकास हुआ था, और इनमें संयुक्त राज्य भी शामिल है, जिसे इंग्लैंड से तकनीक मिली थी। व्यापार संबंधी निवेश उपायों के अंतर्गत इस तरीके पर रोक लग गई है। सतही तौर पर ये मुक्त व्यापार को बढ़ावा देती दिखती हैं, किंतु असल में ये निगमों की सीमा-पार लेन-देन के केंद्रीय प्रबंधन की क्षमता बढ़ा रही हैं, क्योंकि आउटसोर्सिंग तथा फर्म के अंदरूनी लेन-देन तो वही हैं , केंद्रीय रूप से प्रबंधित। यह तो वास्तविक अर्थ में व्यापार है ही नहीं और ये वृद्धि तथा विकास में बाधा डालते हैं। असल में अगर आप चारों तरफ देखें तो जिसे लागू किया जा रहा है वह एक ऐसी व्यवस्था है जो उस तरह के विकास को रोक देगी जो उन देशों में हुआ जो आज अमीर देश हैं, औद्योगिक देश हैं, यह हालांकि ऐसा सर्वोत्ताम विकास नहीं है जो संभव है, फिर भी एक तरह का विकास तो है। टिकाऊ विकास का मतलब है, मिसाल के तौर पर, 'बाहरीÓ चीजों पर ध्यान देना, जिन पर धंधा करते समय ध्यान नहीं दिया जाता। जैसे व्यापार को ले लीजिए। माना जाता है कि व्यापार धन-संपत्ति बढ़ाता है। शायद बढ़ाता हो, शायद ना बढ़ाता हो, लेकिन बढ़ाता है या नहीं यह आप तब तक नहीं जान सकते जब तक आप व्यापार की लागतों को नहीं गिन लेते, उन लागतों सहित जिन्हें नहीं गिना जाता, जैसे कि प्रदूषण की लागत। जब कोई वस्तु एक जगह से दूसरी जगह ले जाई जाती है तो उससे प्रदूषण पैदा होता है। इसे बाहरी बात अप्रासंगिक कहा जाता है, आप ऐसी बातों को गिनती में नहीं लेते। इसी श्रेणी में संसाधनों का क्षरण है, यानी आप कृषि विकास के लिए संसाधनों का दोहन करते हैं। फिर सैनिक लागतें हैं। व्यापार की एक और लागत है कि यह लोगों से उनका रोजगार छीन लेता है। असल में यह बहु-आयामी लागत है, क्योंकि इससे लाखों लोगों का उत्पीडऩ ही नहीं होता, उन्हें शहरों में खदेड़ दिया जाता है जहाँ वे मजदूरी या आय को घटा देते हैं, जिससे दूसरे लोग भी उत्पीडि़त होते हैं। आप सकल घरेलू उत्पाद के मापकों को देखें तो पाएंगे कि ये सभी विचारधारात्मक हैं। ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

रविवार, 6 जून 2010

'लाल साड़ी आतंकित कांग्रेस

अभी तक जो बात देखने में आई है कि वह यह है कि सोनिया गांधी के चित्रण करने वाली फिल्मों, पुस्तकों और कार्टूनों को लेकर कांग्रेस के नेता और अधिकारी बहुत ही सतर्क और सावधान रहे हैं कि कोई भी नकारात्मक बात न सामने आने पाए। मोरो भले ही न जानते , लेकिन हकीकत है कि महात्मा गाँधी के देश में देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी को जिस व्यक्ति के नाम और उसकी छवि के आधार पर वोट मिलते हों वह अपनी पार्टी के नेता के बारे में कोई भी नकारात्मक बात सहन नहीं कर सकती है। यह तो सभी जानते हैं कि वर्षों तक कांग्रेस को पर्दे के पीछे से चलाने वाली सोनिया ने हाल के कुछ वर्षों में ही सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में अधिक सक्रियता से भाग लेना शुरू किया है। इसलिए संभव है कि कांग्रेस पार्टी के कुछ तत्व ब्रांड सोनिया के खिलाफ किसी भी प्रकार के चित्रण को आपत्तिजनक मानें। 'द रेड सारीÓ अर्थात, लाल साड़ी (स्पेनिश नाम- एल सारी रोजो) क्या आतंक की एक दस्तान है? फिर कांग्रेस पार्टी इतनी आतंकित क्यों है? जेविएर मोरो की यह वह ताजा पुस्तक है, जिसने कांग्रेस के भीतर आतंक की लहर सी छेड़ दी है। पुस्तक में कांग्रेसियों को सत्ता का भूखा बताया गया है। पुस्तक तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतंगमय उपनिषद वाक्य से शुरू की गई है। इसके बाद कहानी शुरू होती है 24 मई 1991 के दिन से, जब राजीव गांधी का अंतिम संस्कार किया जा रहा था। किताब के टाइटल में जिस लाल साड़ी का जिक्र है, उसे लेखक के मुताबिक पंडित नेहरू ने जेल में बुना था और सोनिया ने अपनी शादी के दिन पहना था। यह कहानी है, इटली के एक छोटे से गांव में पैदा हुई लड़की के हैरतअंगेज सफर की जिसे पावर तो मिली, लेकिन मौतों के सिलसिले से गुजरकर। किताब का सब-टाइटल है- लाइफ इज द प्राइस ऑफ पावर यानी ताकत की कीमत है जिंदगी। इस केस की अगुआई कर रहे सीनियर वकील और कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और उनके सहयोगियों का कहना है कि किताब में बेमतलब के और मनगढ़ंत किस्से रचे गए हैं। सब कुछ ऐसे पेश किया गया है, जैसे वाकई हुआ हो। मोरो इसे बायोग्राफी बताकर बेच रहे हैं, जिससे गलत इमेज बनती है। किताब में संजय गांधी को गालियां बकते और सोनिया को राजीव की मौत के बाद इटली चले जाने की सोचते दिखाया गया है। न सिर्फ यह किताब झूठ का पुलिंदा है, बल्कि इसे सच बताकर पेश किया गया है। मामला नेहरू-गांधी फैमिली की इज्जत से खिलवाड़ का बनता है। लाल साड़ी ही क्यों?राजीव की हत्या के बाद जब सोनिया ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद ठुकरा दिया तो कांग्रेसी नेता उनके पास गए और उनके घर में लगी उनकी एक तस्वीर की तरफ इशारा किया। सोनिया जी, इस फोटो को देखो। देखो ये लाल साड़ी, जो आपने शादी के दिन पहनी थी, इसे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने चरखे पर कातकर तैयार किया था। इसी संदर्भ को उठाते हुए लेखक ने पुस्तक का नाम लाल साड़ी (द रेड सारी) रखा। इस पर सोनिया ने जवाब दिया -हां, लेकिन यह मत भूलो कि मैं एक विदेशी हूं। इस पर कांग्रेसी नेताओं ने तर्क दिया-मैडम, आप ऐनी बिसेंट को याद कीजिए। कांग्रेस की प्रमुख नेता। उन्होंने पार्टी का नेतृत्व राष्ट्रीय स्तर पर किया था। वे आयरिश थीं। आप इटली की हैं तो क्या हुआ? विचार बुरा नहीं है। लेकिन सोनिया बोलीं : आई एम सॉरी। आप गलत दरवाजा खटखटा रहे हैं।
विवाद इन अंशों पर :एक पुजारी ने सोनिया को राजीव गांधी के अंतिम संस्कार में शामिल होने से यह कहकर रोक दिया था कि विधवाओं को ऐसे में दूर रहना होता है। और फिर वे तो दूसरे धर्म की हैं। सोनिया जब पहली बार राजीव के साथ भारत आईं तो वे यह जानकर हैरान रह गईं कि इस देश में सती प्रथा जैसी बर्बर कुरीतियां हैं। राजीव की हत्या के तत्काल बाद सोनिया ने अपनी बहन अनुष्का से आशंका जताई कि यह कुकृत्य इंदिरा के हत्यारे सिखों, गांधीजी की हत्या करने वाले हिंदू कट्टरपंथियों या कश्मीर के मुस्लिम अतिवादियों जैसों में से किसी का हो सकता है।सोनिया ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद सुरक्षा कम किए जाने पर बेहतर सुरक्षा के लिए दबाव बनाया तो राजीव बोले-अगर वे तुम्हें मारना ही चाहते हैं तो मारकर ही रहेंगे। राजीव की हत्या के तत्काल बाद सोनिया की मां ने फोन करके उन्हें कहा-बेटी तुम्हें इटली वापस लौट आना चाहिए। सोनिया खुद भी सोचने लगीं थी कि अब यहां रुकने का मतलब ही क्या है? -राजीव गांधी सुरक्षा को लेकर पहले ही चिंतित थे। एक बार उन्होंने बच्चों को मास्को के अमेरिकन स्कूल में भर्ती कराने का फैसला कर लिया था, लेकिन सोनिया बच्चों को अपने पास ही रखना चाहती थीं। -सोनिया ने कांग्रेसी नेताओं को फटकारा था -ये तो इंदिरा गांधी दबाव नहीं डालतीं तो राजीव भी राजनीति में नहीं आते। वे पायलट ही अच्छे थे। ऐसा होता तो आज वे हमारे बीच होते। -कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें अध्यक्ष पद के लिए बार-बार जिम्मेदारी के लिए कहा तो सोनिया बोलीं-जिम्मेदारी? इस परिवार को ही बार-बार अपना खून देकर इस देश के लिए अपनी जिम्मेदारी क्यों निभानी चाहिए? क्या आपका दिल इंदिरा और राजीव के खून से भी नहीं भरा है? क्या अभी आप और भी चाहते हैं? कांग्रेसी नेता-आप ही भारत हैं। आपके परिवार के बिना हम कुछ भी नहीं। आपके ही हाथों में आज गांधी-नेहरू का वो दीपक है, जो देश को अंधेरे में रोशनी दिखा सकता है। कांग्रेसी नेताओं पर तीखे कटाक्षकांग्रेसी नेताओं ने सोनिया के दुख की घड़ी में भी ये नहीं सोचा कि उनके सीने में एक इनसान का दिल धड़क रहा है। उन्होंने बिना एक क्षण भी विलंब किए, सोनिया के जरिए अपने व्यक्तिगत सत्ता को सुरक्षित करने की चिंता की। -भारत में सत्ता ऐसा चुंबक है, जिससे बचना किसी के लिए संभव नहीं। कांग्रेसी नेता इतने चालाक निकले कि उन्होंने सोचा तारीफों के जरिए सोनिया गांधी अंतत: मान ही जाएंगी। अपने लिए न सही, अपने बच्चों के लिए और अपने गांधी-नेहरू परिवार के नाम के लिए। -सोनिया गांधी बचपन से ही दमे की मरीज है। उन्होंने अपने कुत्ते का नाम स्टालिन रखा था। -सोनिया की मां पाओला एक पुलिस वाले की बेटी हैं और वे अपने दादा का बार संचालित करती थीं।———————————- एक इत्तिफाकन गांधी वो शख्सियत जिसने ऐसी पार्टी में जान फूंकी जिसे खुद पार्टी के ही लोग खत्म हुआ मान चुके थे। जो ये माने बैठे थे कि अब कांग्रेस का पुनर्जन्म मुश्किल है। इटली के एक मध्यवर्गीय परिवार की लड़की, जो दुनिया के सबसे अस्थिर लोकतंत्र के साथ कदमताल कर रही है। बेटी प्रियंका गांधी कहती हैं-मुझे अपनी मां में हुए कायापलट पर ताज्जुब होता है। सोनिया गांधी के हिंदुस्तान की ग्रैंड ओल्ड पार्टी में शुरुआती कदम बेहद मुश्किल भरे रहे। देश के पहले परिवार के बतौर उन्हें सत्ता के विशेषाधिकार से जरूर नवाजा गया लेकिन निजी तौर पर वो हमेशा किसी न किसी पारिवारिक ट्रेजडी से ही दो-चार होती रहीं। उनके पास कुछ नहीं था-न भाषा और न जनाधार। था तो बस सरनेम गांधी का ताबीज और घर के दरवाजे पर बढ़ती घोर निराशा की लहर। 11 साल बाद अब ये तूफान थम गया है। पार्टी बेशक अपनी रफ्तार कायम न रख सकी लेकिन सोनिया आगे बढ़ गईं। 2009 के लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू ही हुई थी कि सोनिया ने सीधे दुश्मन के कैंप पर हमला बोला। ये सीधा हमला था भाजपा के प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग पर। हमला भी वहां जहां दुश्मन को सबसे ज्यादा चोट पहुंचती है। कंधार मामले पर उन्होंने आडवाणी को घेरा। वैसे उनका फोकस इस देश का आम आदमी रहा। संप्रग सरकार का पांच साल का रिपोर्ट कार्ड और उससे पहले राजग का शासन। वो इस दौर में आक्रामक और हमलावर रही हैं। सोनिया ने इस बार अपना अतीत याद दिलाने और परिवार की विरासत सामने रखने का फैसला कर लिया है। भारत के साथ सफरनामा :सोनिया एंटोनिया मायनो का इस देश से रिश्ता एक रोमांस से शुरू हुआ था। आज ये रिश्ता पूरी तरह राजनीतिक थ्रिलर में तब्दील हो चुका है। तीन बेटियों में दूसरी सोनिया पाओला और स्टेफानो के घर इटली के ट्यूरिन शहर के बाहरी इलाके ओरबैसानो में पैदा हुई थीं। पिता ने बेटियों को बिल्कुल पारंपरिक ढंग से पाला पोसा। चर्च, कन्फर्मेशन और कम्यूनियन। रोकटोक के बावजूद सोनिया को याद है कि मेरे पिता आधुनिक सोच रखते थे और मुझे विदेश में पढऩे की इजाजत मिल गई। इसके बाद मैंने मैजिनी और गैरीबाल्डी को पढ़ा और इटली के एक होने की जानकारी हासिल की लेकिन आधुनिक देश के बतौर भारत के उदय के बारे में मुझे कुछ नहीं पता था। शायद सोनिया की किस्मत में हिंदुस्तान की खोज किसी और ढंग से होनी लिखी थी। कैंब्रिज के एक ग्रीक रेस्टोरेंट वार्सिटी में दोपहर को छात्र खाने-पीने पहुंचते थे। वार्सिटी का मालिक चार्ल्स एंटोनी राजीव का गहरा दोस्त था। कुछ साल बाद उसकी आंखों की रोशनी चली गई पर उसे वो दिन याद है जब लेनॉक्स कुक स्कूल की छात्रा सोनिया उसके रेस्टोरेंट में पहुंची थी। चाल्र्स एंटोनी बताते हैं कि एक दिन सोनिया आईं, वो अकेली थीं। ये लंच का वक्त था और मेरे पास उसे बैठाने के लिए कोई जगह नहीं थी। राजीव अपने दोस्त एलेक्सिस के इंतजार में राउंड टेबल पर अकेले बैठे थे सो मैंने राजीव से पूछा कि तुम्हें किसी दूसरे और एक लड़की के साथ बैठने में ऐतराज तो नहीं। राजीव ने कहा-नहीं, बिल्कुल नहीं। आपको यकीन नहीं आएगा लेकिन उन्हें एक दूसरे से प्यार हो गया। वो भी इस तरह कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता था। मैं इसके लिए राजीव को दोष नहीं देता। वो खुद ही इतनी सुंदर थीं। एक साल बाद राजीव प्रधानमंत्री बने, तो चाल्र्स उनसे मिलने दिल्ली पहुंचे लेकिन उन्हें नई दिल्ली एयरपोर्ट पर ही रोक लिया गया क्योंकि उनके पास भारतीय वीजा नहीं था। इसके बाद बस एक फोन आया और चाल्र्स ने रेसकोर्स रोड का रुख किया। चाल्र्स के मुताबिक-मुझे नहीं पता था कि गांधी के दोस्त को भी वीजा की जरूरत होगी। 13 जनवरी 1968 को सोनिया दिल्ली पहुंचीं। 12 दिन बाद उनकी राजीव से शादी हो गई। सोनिया के पिता ने इस समारोह में हिस्सा नहीं लिया। नयनतारा सहगल बताती हैं कि मुझे उनकी पहली याद तब की है जब इंदिरा ने मेरी मां को बुलाया और कहा -फूफी, राजीव एक इटैलियन लड़की से प्यार करता है तो मेरी मां ने कहा— ये तो बहुत अच्छी बात है। हम उससे कब मिलेंगे। जब वो भारत से गईं तो मैं उनसे पहली बार तब मिली जब उनकी मेहंदी की रस्म थी। तब वो बच्चन परिवार के साथ थीं और वहीं उनकी मेहंदी रस्म रखी गई थी। उनके पैरों और हाथों पर मेहंदी रचाई गई और इसके बाद हमने साथ खाना खाया। सोनिया और राजीव ने जो जिंदगी चुनी थी वो उनकी निजी जिंदगी थी। दोनों के चारों तरफ ऐसे लोग थे जिनके लिए विचारधारा, विश्वास और शासन जैसी चीजें रोजमर्रा की बातें थीं। सोनिया को अचानक लोगों के सामने न आना और गलत बातों पर एकदम न बोलना सीखना पड़ा। अपनी सास से उनका रिश्ता प्यार, धीरज और साझेदारी का था लेकिन सोनिया ने इंदिरा के साथ कभी एक चीज की साझेदारी नहीं की और वो थी राजनीति। सोनिया और राजीव की जिंदगी के शुरुआती 13 साल कई सियासी उतार-चढ़ावों से होकर गुजरे क्योंकि पूरा परिवार एक के बाद एक दुखद घटनाओं से जूझ रहा था। पहले विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मौत, उसके बाद इंदिरा गांधी की हत्या और सात साल बाद खुद राजीव गांधी की हत्या। हर बार सोनिया को शिद्दत से ये अहसास हो रहा था कि ये राजनीति ही थी जो राजीव और उनकी जिंदगी की दुश्मन साबित हुई थी। पर विकल्प कोई नहीं था। बाद के सालों ने दिखाया कि विदेश में पैदा हुई ये गांधी अपनी जिंदगी और इस देश की सियासत की किताब नए सिरे से लिखने को तैयार हो रही थी। उनकी भावना की तुलना बाद में उन्हें मिली फतह से की जा सकती है। साल 2004 में भाजपा ने सोनिया की ताकत को अनदेखा किया था और अब भाजपा के सामने ही सोनिया एक खास अंदाज में अपने लिए लिखे भाषण पढ़कर उस भारत तक पहुंच रही थीं जो उतना चमकदार नहीं था जितना दावा किया जा रहा था। सोनिया की लगातार एक ही कोशिश थी कि कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए सहयोगी मिल जाएं। पुराने दुश्मन अब दोस्त का दर्जा पा गए थे। कुछ जातियों और समुदायों में सोनिया ने भी अपनी पैठ बना ली थी अचानक सोनिया करुणानिधि, वायको, लालू और पासवान जैसे नेताओं की भी पसंद बन गई थीं। रशिद किदवई बताते है कि वो कोई डील नहीं कर रही थीं। उनके पास जो था वो बस उनकी ईमानदारी थी। हरकिशन सिंह सुरजीत से उनकी काफी बनती थी। एक बार वो सुरजीत के घर भी गई थीं। गर्मियों के दिन थे। सुरजीत ने कहा कि उनके घर में अंदर के कमरे में एक एयरकंडिश्नर है तो क्या तुम अंदर जा सकती हो और सोनिया तुरंत चली गईं। जिस कुर्सी पर वो बैठीं वो टूटी हुई थी। सोनिया ने उस पर तकिया रखा और बैठकर बातचीत करती रहीं। तब से सुरजीत से सोनिया की अच्छी दोस्ती हो गई और याद रखें कि ये कोई राजनीतिक दोस्ती नहीं थी, जिसके लिए वो पांच साल से मोलतोल कर रही थीं। 2004 चुनावों ने दिखाया कि दांव पर क्या लगा था। कांग्रेस का अस्तित्व ही नहीं बल्कि भारत की राजनीति में शायद एक गांधी की औकात भी दांव पर लगी थी। देश ने कांग्रेस को चुना और कांग्रेस ने सोनिया को और सोनिया ने उस शख्स को चुना जो सियासतदान कम था वफादार ज्यादा। उनके घर के बाहर कांग्रेसियों का हुजूम लग गया। पर सोनिया की तरफ से न हो चुकी थी। सोनिया के त्याग की कहानी देशभर में टेलीकास्ट हुई। सत्ता त्यागकर सोनिया और भी ताकतवर बन गई थीं। कांग्रेसियों की चापलूसी ने सारी हदें पार कर दीं। उन्होंने उनकी मिन्नतें कीं। उनके सामने रोए-गिड़गिड़ाए भी। सरकार में पार्टी के सहयोगियों ने भी उनके आगे हाथ जोड़े। यहां तक कि भाजपा ने भी माना कि ये सोनिया का मास्टरस्ट्रोक था। ये उस नेता की कामयाबी थी, जिसे 1999 में सियासत का नौसिखिया कहा जाता था। राष्ट्रपति भवन के सामने कभी न भूलने वाली वो प्रेस कांफ्रेंस जब सोनिया ने जादुई आंकड़ों का ऐलान किया और कहा कि हमें यकीन है कि हमें 272 सीटें मिलेंगी। चुनाव अभियान का कर्ताधर्ता गलती कर सकता था, पर संसद में पार्टी प्रमुख के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। पता चला कि आंकड़ा 272 तक नहीं पहुंच पाया और 40 कम है तो चुनाव मजबूरी बन गए और सोनिया ने पाया कि उनके लिए अब अपनी छवि बनाए रखना बहुत जरूरी था। सोनिया से दोबारा गलती नहीं हुई। अब उन्होंने अपनी हर रुकावट को अपने फायदे में बदलना शुरू कर दिया। इस हद तक कि उनके विरोधी भी चौंक जाते थे। राष्ट्रपति चुनाव, लाभ के पद के संकट और न्यूक्लियर करार पर तकरार जैसे जोखिम से गुजरकर सोनिया सत्ता में भागीदारी की कला अच्छी तरह जान गई थीं। एक सर्वशक्तिमान नेता और एक आज्ञाकारी प्रधानमंत्री के गठबंधन ने सत्ता में भागीदारी की नई परंपरा को जन्म दिया। सोनिया पार्टी के लिए जिम्मेदार थीं तो मनमोहन सरकार के लिए। ऐसी हिस्सेदारी पहले नहीं देखी गई थी फिर भी बहुत से लोग कहते हैं कि सत्ता सिर्फ सोनिया के पास ही रहती है। सोनिया ने बार-बार सरकार का फोकस आम आदमी की तरफ मोडऩे की कोशिश की। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, सूचना का अधिकार अधिनियम ये सभी तब आए जब 2006 तक वो नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की अध्यक्ष थीं। नि:संदेह सोनिया ने पार्टी को फिर से खड़ा करने में जो भूमिका निभाई, इतिहास उसके लिए ही उन्हें याद करेगा।
——————————— क्या कहना है मोरो का मोरो का दावा है कि यह एक उपन्यास है, हिस्ट्री नहीं। उनका कहना है कि कांग्रेस तो चाहेगी कि सोनिया को दिल्ली में पैदा हुई ब्राह्मण बताया जाए। क्या कहा , सोनिया ? इमर्जेंसी के दिनों में किस्सा कुर्सी का बनाकर सरकार का डंडा खा चुके जगमोहन मूंदड़ा का इरादा सोनिया पर इसी नाम से फिल्म बनाने का था। सोनिया के रोल के लिए इटैलियन ऐ क्ट्रेस मोनिका बलुची को साइन भी कर लिया गया था। फिर मूंदड़ा ने सोनिया से मुलाकात की और कुछ ही दिन बाद उन्हें सिंघवी का नोटिस मिल गया। कई बरस हो गए , इस फिल्म का जिक्र नहीं हुआ। नई मदर इंडिया फिल्मकार कृष्णा शाह का इरादा इंदिरा गांधी पर एक फिल्म बनाने का है। इसका नाम होगा - मदर: द इंदिरा गांधी स्टोरी। कहते हैं कि शाह ने इंदिरा के रोल के लिए माधुरी दीक्षित से बात की , लेकिन माधुरी ने क्या कहा , यह किसी को नहीं पता। इस फिल्म को 2011 में रिलीज करने की बात थी , लेकिन कौन जानता है क्या हंगामा खड़ा हो जाए। हुए बिना रह जाए, ऐसा तो नहीं हो सकता। हॉट समर फिल्मकार जो राइट ने इंडियन समर नाम से फिल्म बनाने की तैयारी लगभग पूरी कर ली थी। यह भारत के आखिरी गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी ऐ डविना की कहानी है। ऐ डविना से पंडित नेहरू के लव अफेयर का जिक्र भी इसमें होता , लिहाजा भारत सरकार को शक हुआ। उसने फिल्म की स्क्रिप्ट मांगी। फिलहाल यह प्रॉजेक्ट अटका पड़ा है। केट ब्लेंशेट को इसमें ऐ डविना का रोल करना था। ——————————— अभिव्यक्ति की आजादी छीन रही है कांग्रेस :भाजपाभाजपा ने कांग्रेस की इसलिए निंदा की है, क्योंकि कांग्रेस ने स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की सोनिया पर लिखी काल्पनिक विचारों वाली पुस्तक की आलोचना की है। भाजपा का आरोप है कि सत्ताधारी पार्टी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा रही है। भाजपा के मुख्य प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने मोरो की किताब के विषयवस्तु पर टिप्पणी से इनकार करते हुए कहा कि पूरा घटनाक्रम अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता। कांग्रेस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। भाजपा का कहना है कि इस तरह की सेंशरशिप सत्तर के दशक में लगे आपातकाल की याद दिलाते हैं जबकि श्रीमती इंदिरा गाँधी सत्ता में थीं। उस समय कथित तौर पर जिन पुस्तकों, फिल्मों और समाचार पत्रों को सरकार विरोधी माना जाता था उन पर सरकार का चाबुक चला था। हालांकि राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि ऐसे मामलों में सोनिया गाँधी को उतना सख्त नहीं माना जाता है जितनी कि उनकी सास हुआ करती थीं लेकिन कांग्रेस पार्टी अपने नेताओं की छवि को लेकर बहुत अधिक संवेदनशील रहती है जिसे कुछ लोग चापलूसी की संस्कृति भी कहते हैं। ———————- मोरो को कानूनी नोटिस :इस संदर्भ में गौरतलब होगा कि कांग्रेस के सांसद और पार्टी के कानूनी और मानवाधिकार प्रकोष्ठ के प्रमुख अभिषेक मनु सिंघवी ने जेवियर मोरो को कानूनी नोटिस भेजा है जिनका कहना है कि कांग्रेस पार्टी और इसके नेता भारतीय प्रकाशन कंपनियों पर दबाव डाल रहे हैं कि वे मोरो की किताब का अंग्रेजी अनुवाद न छापें। उनका दावा है कि उन्होंने सोनिया के जीवन का काल्पनिक लेखा जोखा लिखा है और इसका यह मतलब नहीं है? कि किताब में लिखी सारी बातें सच हों लेकिन संघवी और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि एक जीवित व्यक्ति पर काल्पनिक जीवनी एक विरोधाभास भी पैदा कर सकता है क्योंकि इसमें झूठी बातें, अपमानजनक टिप्पणियाँ भी की जा सकती हैं और चूँकि यह संबंधित व्यक्ति की सहमति और अधिकार के लिखी गई है ?इसलिए इसमें गलत और अपमानजनक तथ्यों का समावेश हो सकता है। ———————याद आया गुजरा जमाना : इन दिनों पैतीस साल पुरानी घटनाएं फिर याद आने लगी है। 1975 में महान लेखक कमलेश्वर की कहानी काली आंधी पर गुलजार ने एक फिल्म बनाई थी आंधी। कहानी सिर्फ यह थी कि एक पति पत्नी हैं, पत्नी के पिता राजनेता हैं और उसकी भी राजनीति में दिलचस्पी है। पत्नी चुनाव लड़ती है और बड़ी नेता बन जाती है, पति होटल का मैनेजर बन कर अपने आप में खुश हैं। दोनों अलग हो जाते हैं और बाद में पत्नी जब चुनाव लडऩे उसी इलाके में आती है और बिछड़े हुए पति के होटल में ठहरती है तो दोनों में फिर अंतरंगता हो जाती है। इस फिल्म को ले कर दो विवाद हुए थे। एक तो गुलजार ने कहानी और पटकथा का श्रेय कमलेश्वर को नहीं दिया था और दूसरे इंदिरा गांधी को बताया गया था कि आप पर यह फिल्म बनाई गई है। आपातकाल का जमाना था और जब सारे अखबार प्रतिबंधित हो सकते थे तो आंधी फिल्म को प्रतिबंधित करने में कितनी देर लगनी थी। गनीमत है कि संजय गांधी और उनकी मंडली के आसपास बनाई गई अमृत नाहटा की फिल्म किस्सा कुर्सी का की तरह फिल्म के प्रिंट जब्त कर के नहीं जला दिए गए। सोनिया गांधी बहुत अनमने भाव से राजनीति मेंं आई थी। उनकी राजीव गांधी के साथ प्रेम कथा, भारत आ कर लाल साड़ी पहन कर राजीव से शादी करना, राजनीति में आ कर हिंदी बोलना, कांग्रेस को दोबारा सत्ता में लाने की प्रेरणा बनना और मिला मिलाया प्रधानमंत्री पद ठुकरा देना ये सब चीजें सोनिया गांधी को रहस्यमय भी बनाती है और एक हद तक आदर का पात्र भी। अब स्पेनिश और इतालवी में प्रकाशित सोनिया गांधी के जीवन पर लिखी गई किताब लाल साड़ी को ले कर कांग्रेस में बवाल मचा हुआ है। जेवियर मोरो ने यह किताब लिखी है और इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित करने के लिए दिल्ली की रोली बुक्स ने अनुबंध किया है। कांग्रेस के प्रवक्ता और सोनिया गांधी के वकील की भूमिका में अभिषेक मनु सिंघवी ने कई महीने पहले इस किताब के प्रकाशक को नोटिस भेज दिया था कि वे यह किताब बेचना बंद करे और भारत में प्रकाशन का किसी से अनुबंध नहीं करें। जेवियर मोरो ने एक ई मेल के जवाब में कहा है कि सरकार खुद भारत के प्रकाशकों पर दबाव डाल रही है कि वे यह पुस्तक नहीं छापे। इस किताब में जो अंश निकल कर आए हैं उनके अनुसार काफी विवादास्पद हिस्से हैं। इससे सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा फिर उभर सकता है। यह किताब इसलिए कमाल की है कि भारत आई नहीं मगर भारत में हंगामा पहले मच गया क्योंकि इस किताब के साथ सोनिया गांधी का नाम जुड़ा है। सोनिया के नाम पर कोई रिस्क नहीं :हाल ही में प्रकाश झा की फिल्म राजनीति पर भी कांग्रेस ने आपत्ति जताते हुए फिल्म के कुछ दृश्य हटवा दिए थे। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक फिल्म की नायिका का किरदार भी सोनिया गांधी से प्रेरित है। ऐसे में फिल्म के आपत्तिजनक दृश्य कांग्रेस अध्यक्ष की छवि के अनुकूल नहीं थे। इससे पहले भारतीय मूल के ब्रिटिश फिल्म निर्माता जगमोहन मुंदड़ा को भी सोनिया गांधी की जिंदगी पर फिल्म बनाने का इरादा छोडऩा पड़ा था, क्योंकि कांग्रेस सेंसर बोर्ड ने इसकी इजाजत नहीं दी। भले ही इसे सृजनात्मक आजादी के हनन का नाम दिया जाए या लोकतंत्र के खिलाफ करार दिया जाए, कांग्रेस सोनिया गांधी के नाम पर कोई रिस्क लेना नहीं चाहती। आखिरकार सोनिया ने ही कांग्रेस को नया जीवनदान दिया है। कांग्रेस नहीं चाहती कि सोनिया को लेकर कोई विवाद खड़ा हो या विरोधियों को विदेशी मूल का मुद्दा दोबारा उठाने का मौका मिले।:::::::::::::::::::::::::::::::::::: किस्सा कुर्सी का किस्साराजनीति पर आधारित फिल्म किस्सा कुर्सी का आपातकाल के दौर में खुद राजनीति का शिकार हुई। 1975 के दौरान बनी फिल्म किस्सा कुर्सी का, से जुड़ा विवाद अपने आप में खासा दिलचस्प है। शबाना आजमी की मुख्य भूमिका वाली यह फिल्म एक राजनीतिक व्यंग्य थी। कांग्रेस के सांसद रहे अमृत नाहटा फिल्म के निर्माता-निर्देशक थे। 1975 में जब यह फिल्म रिलीज होनी थी उससे पहले देश में आपातकाल लगाया जा चुका था। चूंकि फिल्म का मुख्य किरदार इंदिरा गांधी से मिलता-जुलता चरित्र था इसलिए सरकार के दबाव में सेंसर बोर्ड ने फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। सेंसर बोर्ड के इस निर्णय के खिलाफ नाहटा ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने फैसला दिया कि सार्वजनिक प्रदर्शन के पहले ये फिल्म न्यायाधीशों को दिखाई जाएगी। इससे पहले कि अदालत के सामने फिल्म का प्रदर्शन होता, उसका मूल प्रिंट गायब हो गया। कहा जाता है कि संजय गांधी के इशारे पर तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने मुंबई से फिल्म के प्रिंट जब्त करवाकर उन्हें दिल्ली के पास गुडग़ांव स्थित मारुति फैक्टरी परिसर में रखवा दिया जहां बाद में इन्हें नष्ट कर दिया गया। 1977 के चुनावों में अमृत नाहटा जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर सांसद बने। उन्होंने संसद में मांग की कि आपातकाल के दौरान जब्त की गई उनकी फिल्म के प्रिंट उन्हें वापस किए जाएं। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और तब के सूचना और प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने यह केस सीबीआई को सौंपने का फैसला किया। सीबीआई के संयुक्त सचिव निर्मल कुमार सिंह ने इस मामले की जांच की और संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल के खिलाफ इस मामले में मुकदमा दर्ज कराया। केस की सुनवाई हुई और दिल्ली की एक सत्र अदालत ने दोनों आरोपियों पर जुर्माना लगाते हुए सजा सुनाई। गांधी और शुक्ल की तरफ से बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई। इस वक्त तक मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद छोड़ चुके थे। चौधरी चरणसिंह कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री थे। बदली राजनीतिक परिस्थितियों में फिल्म को लेकर नाहटा अपने आरोपों से मुकर गए। अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल को बरी कर दिया। किस्सा कुर्सी का मामला इस मायने में भी खास है कि देश में पहली बार अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद भी आरोपियों को चुनाव लडऩे की अनुमति मिली और दोनों उम्मीदवार चुनाव जीते भी। 1977 में अमृत नाहटा ने फिर उसी कहानी पर किस्सा कुर्सी का फिल्म बनाई जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल साबित हुई।———————

आईपीएल में पावर प्ले

सब कुछ हो रहा है। चोरी-छिपे नहीं डंके की चोट पर। बस थोड़ी सी मशक्कत यह करनी है कि जनता के आंखों में मुट्ठी भर धूल फेंक भर देना है। हो सके तो उसमें थोड़ी मिर्ची लगाकर, ताकि जनता आंखें मलती रहे। आरोप मढऩे में आसानी होगी। कह देंगे नशे के सुरूर में अनाप-शनाप बोल रहा था। हजारों करोड़ की बातें हो रही है। जनता जानती है, नहीं भी जानती है। लाखों करोड़ के सौंदे हो रहे हैं। जनता देख रही है, नहीं भी देख रही है। करोड़ों रुपए के एडवांस इनकम टैक्स भरे जा रहे हंै। चियरगर्ल्स नाच रही है। देर रात तक पार्टियां हो रही है। प्राइवेट जहाज उड़ रहे हैं। टीवी चैनलों पर पैसे की बारिश हो रही है। मगर जनता के पास प्रतिकार के दो शब्द नहीं। हैं भी तो उसकी परवाह किसी को नहीं। कहने वाले को पागल करार देने वाले हजारों चमचे मिल जाएंगे। आईपीएल और पवार परिवार को लेकर एक बार फिर विवाद गरम है। कहा जा रहा है कि आईपीएल फ्रेंचाइजी हासिल करने के लिए जिस कंपनी ने बोली लगाई थी, उसमें पवार का भी पैसा लगा हुआ है। दूसरी तरफ पवार परिवार लगातार इस बात को गलत बता रहा है। बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार ने इस बात साफ इनकार किया कि वो या उनके परिवार का कोई भी सदस्य आईपीएल की नई टीमों के लिए हुई नीलामी में शामिल था। पवार ने कहा कि यह मामला कुछ दिन पहले भी उठाया गया था तब भी मैंने कहा था कि इससे हमारे परिवार का कोई लेना देना नहीं है। दरअसल, आईपीएल में सबसे बड़ा रुपैया है। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के पेचीदा गलियारों में, असलियत को झूठ और धोखे, लालच और राष्ट्रीय गर्व से अलग करना एक असंभव सा काम है। इस में पैसा क्रिकेट या राष्ट्रीय गौरव से अधिक अहमियत रखे हुए है। कौन हिस्सेदारी, कैसी हिस्सेदारी :एक अंग्रेजी अखबार ने ये दावा किया था कि पवार की कंपनी पुणे के लिए हुई नीलामी में शामिल थी। जबकि इससे पहले लगातार पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले इस बात से इनकार कर रहे थे। अखबार के मुताबिक पुणे की टीम के लिए बोली लगाने वाली एक कंपनी सिटी कॉर्पोरेशन में बीसीसीआई के पूर्व मुखिया शरद पवार की भी हिस्सेदारी है। पवार ने अखबार के इस दावे को निराधार बताते हुए कहा कि जिस कंपनी के इस बिडिंग में शामिल होने की बात कही जा रही है वो इस किसी भी तरह की बोली प्रक्रिया में शामिल ही नहीं थी। पवार ने कहा कि सिटी कार्पोरेशन के एमडी ने व्यक्तिगत तौर पर पुणे की टीम के लिए बोली लगाई थी। लेकिन वो टीम पाने में कामयाब नहीं हुए इसलिए मामला यहीं खत्म हो गया। इससे पहले मामला फंसता देख कंपनी के एमडी देशपांडे का कहना था कि उन्हें शरद पवार के शेयर होने की कोई जानकारी तक नहीं है। लेकिन कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के डाटाबेस में साफ साफ दर्ज है कि पवार परिवार के पास सिटी कॉर्पोरेशन के 16.22 फीसदी शेयर हैं। सिटी कॉर्पोरेशन के शेयर 10 लोगों के नाम से लिए गए हैं जिसमें कंपनी के एमडी देशपांडे उनकी पत्नी सोना और शरद पवार की कंपनी लेप फाइनेंस और नम्रता फिल्म एंटरप्राइजिज लिमिटेड के नाम शामिल हैं। जबकि नम्रता फिल्म इंटरप्राइजेज लिमिटेड और लेप फाइनेंस से शरद पवार का संबंध है इसका खुलासा खुद शरद पवार 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान दिए अपने एफिडेविट में भी कर चुके हैं। मालूम हो कि पुणे की टीम के लिए हुई नीलामी में सहारा समूह ने सबसे ज्यादा 1702 करोड़ की बोली लगाई थी। इसलिए सिटी कॉर्पोरेशन को पुणे की टीम नहीं मिली। इस पाकीजा को क्या नाम दें : पवार ने माना कि पुणे फ्रैंचाइजी के लिए सिटी कॉर्पोरेशन की ओर से बोली लगाई थी। पर उन्होंने बोली की प्रक्रिया में खुद या परिवार के शामिल रहने की बात को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि बोली पर्सनल लेवल पर लगाई गई थी और इसमें कंपनी का कोई निदेशक शामिल नहीं था। खबर में यह कहा गया है कि आईपीएल की पुणे फ्रैंचाइजी की बोली में पवार और उनके परिवार के सदस्य परोक्ष रूप से शामिल थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस सिटी कॉर्पोरेशन नामक कंपनी ने बोली लगाई थी उसके निदेशक मंडल में पवार, उनकी पत्नी और बेटी शामिल हैं।
बंसी पुकारे तेरा नाम :लैप फाइनैंस कंपनी और नम्रता फिल्म एंटरप्राइजेज शरद पवार (भारतीय कृषि मंत्री), उनकी पत्नी प्रतिभा पवार और बेटी सुप्रिया सुले (सांसद) की सौ फीसदी हिस्सेदारी वाली कंपनियां हैं। लैप में पवार परिवार के तीनों सदस्यों की बराबार हिस्सेदारी है, जबकि नम्रता फिल्म के 2000 शेयरों में से 1100 पवार की पत्नी के नाम हैं। खुद उनके नाम 652 और बेटी सुप्रिया के नाम 248 शेयर हैं। सिटी कॉरपोरेशन पुणे की कंस्ट्रक्शन कंपनी है। कंपनी के प्रबंध निदेशक अनिरुद्ध देशपांडे हैं। कंपनी के कुल 2.07 करोड़ शेयरों में लैप फाइनैंस के 25.6 लाख और नम्रता फिल्म के 8 लाख शेयर हैं। इन दोनों कंपनियों की सिटी कॉरपोरेशन में कुल हिस्सेदारी 16.22 फीसदी है। मार्च में सिटी कॉरपोरेशन ने पुणे आईपीएल की फ्रेंचाइजी हासिल करने के लिए 1,176 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी। 21 मार्च को सहारा इंडिया ने 1,702 करोड़ रुपये में यह बोली जीती थी।
नहीं कर रहे यूं ही बदनाम : आईपीएल में पुणे की टीम के लिए कंस्ट्रक्शन कंपनी सिटी कॉर्पोरेशन ने 1176 करोड़ रुपए की बोली लगाई थी। इस कंपनी के 2 करोड़ 7 लाख शेयर में से 16.22 फीसदी शेयर शरद पवार के पास है और सिटी कॉर्पोरेशन में लैप फाइनेंस एंड कंसल्टेंट प्राइवेट लिमिटेड और नम्रता फिल्म एंटरप्राइजेज लिमि. का शेयर है। इन दोनों कंपनियों के मालिक शरद पवार, उनकी पत्नी प्रतिभा
मैं सच कह रहा हूं पवार ने कहा कि आईपीएल नीलामी में देशपांडे ने अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं के आधार पर हिस्सा लिया था। इस बोली में न तो उनके परिवार को कोई व्यक्ति शामिल था और न ही सिटी ग्रुप का इससे कोई संबंध था। पवार ने कहा कि इसके बाद नीलामी में टीम सहारा ग्रुप को मिली। उन्होंने अखबार में छपी खबरों पर चुटकी लेते हुए कहा कि यह अच्छी बात है कि वे और उनका परिवार आज के अखबारों में हैडलाइंस में है। लेकिन यह गलत खबर है। पवार ने कहा कि जहां तक इस रिपोर्ट की बात है तो ऐसी बात दो महीने पहले भी मीडिया में आई थी। मैं कहना चहता हूं कि मेरा या मेरे परिवार का आईपीएल से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कोई संबंध नहीं है। पवार ने स्पष्ट कहा कि सिटी कार्पोरेशन का नीलामी से कोई लेना-देना नहीं था। पुणे टीम के लिए लगाई गई बोली में सिटी कार्पोरेशन के प्रबंध निदेशक अनिरूद्ध देशपांडे शामिल थे। हालांकि पवार ने माना कि पुणे फ्रेंचाइजी के लिए सिटी कार्पोरेशन की ओर से बोली लगाई थी लेकिन उन्होंने बोली की प्रक्रिया में स्वयं या परिवार के शामिल रहने की बात को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि बोली व्यक्तिगत स्तर से लगाई गई थी और इसमें कंपनी का कोई निदेशक शामिल नहीं था। देशपांडे ने व्यक्तिगत स्तर पर इस नीलामी प्रक्रिया में हिस्सा लिया था। कंपनी ने इस संबंध में अपना पक्ष साफ कर दिया था। उसने अपनी विज्ञप्ति के माध्यम से साफ कर दिया था कि देशपांडे व्यक्तिगत स्तर पर बोली में शामिल थे। इससे कंपनी का कोई संबंध नहीं था। दागदार आईपीएल : आईपीएल को भारत ही नहीं दुनियाभर के क्रिकेटप्रेमियों का जबरदस्त समर्थन मिला। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के ताजा संकट के बारे में कोई क्या लिख सकता है, जब पहले से ही इसका अंदाजा हो? तीन साल पहले जिस धूमधड़ाके के साथ आईपीएल की शुरुआत हुई थी और एक ब्रैंड के रूप में लोगों ने इसे स्वीकार किया, उससे दुनिया भर में भारत की प्रतिष्ठा तो बढ़ी, लेकिन साथ ही क्रिकेट के इस स्वरूप से नाइत्तेफाकी जताने वालों को या तो नजरअंदाज कर दिया गया या फिर उन्हें चुप रहने के लिए कहा गया। बदकिस्मती से सच्चाई ये है कि हम अति हो जाने के बाद ही प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। किसी चीज की तारीफ या इसकी आलोचना करने से पहले इसकी अच्छाई या बुराई पर सोचना भी नहीं चाहते। आज आईपीएल दागदार है । मोदी की छवि राक्षस की बन गई। आईपीएल के पैरोकार घोटाले दर घोटाले के रहस्योदघाटन से सदमे की स्थिति में हैं। आलोचक हावी हैं और उनका कहना है कि इस हास्यास्पद मनोरंजनज्का ये हश्र तो तय था। पैंतरा बदलाआईपीएल की मलाई खाने वालों में एक बड़े हिस्सेदार मीडिया ने भी पैंतरा बदल लिया है। वो ये भूल गया है कि आईपीएल को दागदार करने वालों को बढ़ावा देने वालों में उसकी भूमिका अहम रही है। क्रिकेट प्रेमियों के साथ धोखा हुआ है और हो रहा है। क्या असल अपराधी राजनेता और उद्योगपतियों का गठजोड़ है या फिर पूँजीवाद जिसने परीकथा जैसी आईपीएल की शुरुआत को इस शर्मनाक मुकाम तक पहुँचा दिया है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस में हम लोगों को बहुत यकीन है-बावजूद इसके कि दुनियाभर में आए आर्थिक संकट के लिए इसी कॉरपोरेट गर्वेंनेंस के तौर तरीके जिम्मेदार थे।
विपक्ष को धारदार हथियार संयुक्त संसदीय जांच की मांगभारतीय जनता पार्टी सहित विपक्ष को धारदार हथियार मिल गया है। विपक्ष अब इस घोटाले की संयुक्त संसदीय जांचकी मांग पर अड़ गई है। इसके पहले भी आईपीएल विवाद की तलवार बड़ी मुश्किल से शरद पवार और नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल के कंधे से हटी थी। जेडीयू और लेफ्ट ने यह मांग कर सकते में डाल दिया था कि जब तक आईपीएल की जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक उन दोनों केंद्रीय मंत्रियों का भी इस्तीफा लिखा लिया जाए जिनके नाम विवाद में हैं। विपक्ष इस मसले पर संयुक्त संसदीय समिति की भी मांग कर रहा था। संसद में हंगामा हुआ और स्थगन तक पहुंच गया। जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने तो आईपीएल को लुटेरों का अड्डा तक कह डाला था। लोगों ने क्या-क्या नहीं कहा। किसी ने कहा देश में खेला जा रहा सबसे बड़ा जुआ तो किसी ने बड़े लेवल का भ्रष्टाचार तो किसी -किसी ने तो पराकाष्ठा ही कर दी। दलाल और कोठे शब्द न चाहते हुए भी घुस आए मैदान में।
सवालों के घेरे में झूठ :शरद पवार तो आईपीएल विवाद में शशि थरूर और ललित मोदी के बाद खुद सवालों के घेरे में काफी पहले ही आ चुके थे, लेकिन इज्जत बचा ले गए। हैं। वर्ना शरद पवार ही नहीं बल्कि उनकी बेटी सुप्रिया सुले और राकांपा नेता प्रफुल्ल पटेल तक सफाई देते घूम रहे थे। पवार साहब ने तो तब और हद कर दी थी कि पता ही नहीं कि आईपीएल में क्या हो रहा है। उसी समय एक अखबार में ये खबर आई थी कि एक ताकतवर मंत्री का दामाद भी आईपीएल की दो टीमों की हाल ही में लगी बोली में एक औद्योगिक घराने की ओर से शामिल हुआ था। उसे बोली जीतने पर तीस फीसदी की स्वेट इक्विटी देने का वादा किया गया था लेकिन ये घराना बोली नहीं जीत पाया और इस घराने के कागजात उसे वापस कर दिए गए। इस खबर के बाद सुप्रिया सुले ने एक साक्षात्कार में कहा था कि मैं ये साफ कर देना चाहती हूं कि मेरा, मेरे पति या मेरे परिवार का न तो आईपीएल की बोली से और न ही आईपीएल से कोई संबंध है। हमारा क्रिकेट से संबंध सिर्फ क्रिकेट प्रेमी के रूप में है। सबसे दिलचस्प सफाई खुद शरद पवार की ओर से आई। पवार ने कहा कि आईपीएल विवाद से उनका कोई लेना-देना नहीं है। सुप्रिया की कर्णप्रिय बातें : केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार की बेटी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की नेता सुप्रिया सुले ने कहा है कि सिटी कार्पोरेशन के प्रबंध निदेशक अनिरूद्ध देशपांडे ने व्यक्तिगत स्तर पर इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की पुणे फ्रेंचाइजी के लिए बोली लगाई थी और उनके इस कदम का कंपनी के निदेशक मंडल ने विरोध किया था। उन्होंने कहा कि देशपांडे ने पुणे फ्रेंचाइजी के लिए व्यक्तिगत स्तर पर बोली लगाई थी और उनके इस कदम का कंपनी के निदेशक मंडल ने विरोध जताया था। सुप्रिया ने कहा, सिटी कार्पोरेशन में हमारी सिर्फ 16 फीसदी हिस्सेदारी है और ऐसे में कंपनी के फैसले में हमारा दखल नहीं होता है। बोली में मेरे परिवार की कोई भूमिका नहीं थी। मैंने पहले भी कहा है कि आईपीएल से हमारा कोई संबंध नहीं है। जरा याद करें ईमानदारी : तब आईपीएल फ्रैंचाइजी मामले में घोटाला मामले के केंद्र में रहे आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी से बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार ने सीधे इस्तीफे की मांग कर डाली थी। शरद पवार के घर पर बैठक में बैंगलोर रॉयल चैलेंजर्स के मालिक विजय माल्या सहित बीसीसीआई के भी कुछ अधिकारी उपस्थित थे। शरद पवार ने बीसीसीआई से मोदी को तीन से पांच दिन की मोहलत देने की अपील की। हालांकि बीसीसीआई सूत्रों के हवाले से आई खबर में बताया जा रहा है कि शरद पवार की वह अपील नहीं मानी गई। अब भ्रष्टाचार को नए ढंग से पारिभाषित किया जाएगा या फिर भ्रष्टाचार अपने तेवर से लोगों को रू-ब-रू कराएगा, यह तो समय ही बताएगा।

सोनिया गांधी अपनी जीवनी से इतनी डरती क्यों हैं?

बात एक ऐसी किताब की जिसके आने से पहले ही बवाल मच गया है। क्योंकि इस किताब के साथ सोनिया गांधी का नाम जुड़ा है। स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की एक किताब 'द रेड साड़ीÓ सोनिया गांधी की जिंदगी पर लिखी गई है। कांग्रेस पार्टी को किताब की कुछ लाइनों पर ऐतराज है और पार्टी चाहती है कि देश में किताब पर बैन लगा दिया जाए। पार्टी की तरफ से इस किताब के लेखक को कानूनी नोटिस भी भेजा गया है। सोनिया गांधी पर लिखी गई इस किताब के कुछ खास अंश हैं। 24 मई 1991 को राजीव का पार्थिव शरीर तीन मूर्ति हाउस के बड़े हॉल में रखा था। ये वक्त अलविदा कहने का था। सोनिया ने राजीव के पार्थिव शरीर पर श्रद्धांजलि अर्पित की। टेलीविजन कैमरों की नजर से पूरी दुनिया ने सोनिया को देखा, सोनिया ने लोगों को जैक्वेलीन केनेडी की याद दिला दी। राजीव की मौत से टूट चुकी सोनिया वापिस इटली जाने की सोचने लगीं। तो क्या राजीव गांधी की हत्या सोनिया गांधी को भारत छोडऩे और अपने देश इटली लौटने पर मजबूर कर रही थी। मोरो के कलम से सोनिया गांधी की ये जिंदगी स्पेन में 2008 से ही बिक रही है। अब इसके अंग्रेजी अनुवाद को भारत में बेचने की तैयारी है। मोरो ने राजीव गांधी की बर्बर हत्या के बाद के पलों को सोनिया गांधी की नजरों से देखने की कोशिश की है। वो लिखते हैं कि राजीव की मौत से सोनिया को झकझोर कर रख दिया और उसके बाद ही वो सब कुछ समेट कर वापस अपने मुल्क जाने की सोचने लगीं। जाहिर है कांग्रेस के नेता ये नहीं चाहेंगे कि सोनिया गांधी की एक ऐसी छवि जनता के बीच आ जाए जो पति की हत्या के बाद बहादुरी से हालात का सामना करने के बजाए, पति के ही देश को अपना देश बनाकर उनकी यादों को यहीं संजोने, अपने बच्चों को यहीं बड़ा करने के बजाए वापस अपने सुरक्षित मुल्क लौट जाने की सोचने लगी थीं। जाहिर है सोनिया गांधी की ये छवि उनकी मौजूदा छवि से मेल नहीं खाएगी। हालांकि किताब के लेखक मोरो दावा करते हैं कि उनकी किताब सोनिया की जिंदगी पर आधारित जरूर है लेकिन कहानी है पक्की काल्पनिक। लेकिन सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस का एक धड़ा सोनिया पर लिखी गई किताब 'द रेड साड़ीÓ से खासा खफा है। उसका कहना है कि एक जीवित शख्सियत की जिंदगी को काल्पनिक बनाने की कोशिश ठीक नहीं है। वो भी तब जब ये किताब सोनिया गांधी की जिंदगी से प्रेरित है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पेशे से वकील और कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने मोरो को लीगल नोटिस थमा दिया है। 'द रेड साड़ीÓ का इटालवी, फ्रें च और डच भाषा में अनुवाद हो चुका है। मोरो का दावा है कि अब तक उनकी किताब एल साड़ी रोजा की करीब ढाई लाख कॉपियां बिक भी चुकी हैं। जाहिर है सोनिया की जिंदगी अंतर्राष्ट्रीय बेस्टसेलर के दर्जे में पहुंच रही हैं। लेकिन किताब पर तूफान सिर्फ राजीव गांधी की हत्या के बाद के पलों पर ही नहीं उठ रहा है बल्कि कहा ये भी जा रहा है कि कांग्रेस की नाराजगी किताब में दर्ज सोनिया की शुरुआती जिंदगी के कई पन्नों पर भी है। यानि सोनिया का बचपन और इटली में बिताए गए कई अहम पल। साफ है कांग्रेस सोनिया के नाम के साथ कोई खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करने वाली। जी हां, राजीव गांधी की मौत के बाद इटली जाने की सोचने की बात के जिक्र के अलावा कांग्रेस पार्टी को किताब की कुछ और लाइनों पर भी ऐतराज है। जिसके जरिए लेखक ने सोनिया के बचपन की कुछ अनकही, अनसुनी बातों को दुनिया के सामने रखने की कोशिश की है। ये किताब नहीं एक तूफान है। इसमें लिखी कुछ बातें अगर दुनिया के सामने आ गईं तो विरोधियों को बोलने का मौका मिल जाएगा। देश की सबसे बड़ी पार्टी का स्वयंभू सेंसर बोर्ड ऐसा नहीं चाहता। वैसे ऐसा नहीं है कि मोरो ने अपनी किताब में सिर्फ भारत आने के बाद ही सोनिया की जिंदगी के अहम पहलुओं को समेटा है। इस किताब में उस वक्त का भी जिक्र है जब इटली के एक छोटे से गांव लुजियाना में सोनिया का जन्म हुआ, मोरों की नजर में कैसे बीता सोनिया का बचपन किताब में वर्णन है। सोनिया के पैदा होने पर लुजियाना के घरों में परंपरा के अनुसार गुलाबी रिबन बांधे गए। चर्च ने सोनिया को नाम दिया एडविजे एनटोनिया अलबिना मैनो। लेकिन उनके पिता स्टीफैनो ने उन्हें सोनिया के नाम से पुकारा। रूसी नाम रखकर वो उन रूसी परिवारों का शुक्रिया अदा करना चाहते थे जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उनकी जान बचाई। सोनिया के पिता स्टीफैनो, मुसोलिनी की सेना में थे जो रूसी सेना से हार गई थी। सोनिया जियावेनो के कॉन्वेंट स्कूल में गई लेकिन पढ़ाई उतनी ही की, जितनी जरुरत थी। यानी वो अच्छी स्टूडेंट नहीं थी लेकिन हंसमुख और दूसरों की मदद करने वाली थीं। कफ और अस्थमा की शिकायत की वजह से वो बोर्डिंग स्कूल में अकेले सोती थीं। आगे जाकर तूरीन में पढ़ाई के दौरान उनके मन में एयर होस्टेस बनने का अरमान भी जागा लेकिन वो सपना जल्द ही बदल गया। इसके बाद वो विदेशी भाषा की टीचर या संयुक्त राष्ट्र में अनुवादक भी बनना चाहती थीं। जाहिर है कांग्रेस पार्टी ये नहीं चाहेगी कि सोनिया की जिंदगी का ये अनछुआ पहलू भी दुनिया के सामने आए। सवाल उठाए जा रहे हैं वास्तविकता से छेड़छाड़ के लेकिन मोरो का दावा है कि उनकी किताब रिसर्च पर आधारित है और इसके लिए उन्होनें खुद सोनिया के होम टाउन लुजियाना में काफी वक्त बिताया। किताब की पांडुलिपि सोनिया की बहन नाडिया को भी दिखाई गई। लेकिन उन्होंने किताब पढऩे से इनकार कर दिया। खुद मोरो का मानना है उन्हें कांग्रेस पार्टी की तरफ से धमकी भरे ई-मेल्स भेजे गए हैं जिसमें किताब की कई लाइनों पर नाराजगी जताई गई है। हाल ही में प्रकाश झा की फिल्म राजनीति पर भी कांग्रेस ने आपत्ति जताते हुए फिल्म के कुछ दृश्य हटवा दिए थे। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक फिल्म की नायिका का किरदार भी सोनिया गांधी से प्रेरित है। ऐसे में फिल्म के आपत्तिजनक दृश्य कांग्रेस अध्यक्ष की छवि के अनुकूल नहीं थे। इससे पहले भारतीय मूल के ब्रिटिश फिल्म निर्माता जगमोहन मुंदड़ा को भी सोनिया गांधी की जिंदगी पर फिल्म बनाने का इरादा छोडऩा पड़ा था, क्योंकि कांग्रेस सेंसर बोर्ड ने इसकी इजाजत नहीं दी। भले ही इसे सृजनात्मक आजादी के हनन का नाम दिया जाए या लोकतंत्र के खिलाफ करार दिया जाए, कांग्रेस सोनिया गांधी के नाम पर कोई रिस्क लेना नहीं चाहती। आखिरकार सोनिया ने ही कांग्रेस को नया जीवनदान दिया है। कांग्रेस नहीं चाहती कि सोनिया को लेकर कोई विवाद खड़ा हो या विरोधियों को विदेशी मूल का मुद्दा दोबारा उठाने का मौका मिले।

दंडकारण्य में बुद्ध की जरूरत

आज दंडकारण्य खूनी हो चुका है। गोलियों की आवाज से जंगली व हिंसक पशु भी घबरा उठे हैं। यहां एक अंगुलिमाल नहीं, हजारों हैं। जब अंगुलिमाल किसी व्यक्ति की हत्या करता था, तो उसकी अंगुली काटकर उसे अपनी माला में पिरो लेता था। इसी कारण उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा था। उसके अत्याचारों के बारे में बुद्ध ने सुना। उन्होंने उस डाकू को एक साधु के रूप में बदलने का निश्चय कर लिया। एक दिन बुद्ध उसके क्षेत्र में घूमने निकले। अंगुलिमाल ने उन्हें आता हुआ देखा। श्रमण की हत्या के लिए वह अपनी तलवार लेकर दौड़ा। बुद्ध अपनी स्वाभाविक गति से चले जा रहे थे, अंगुलिमाल अपनी पूरी शक्ति से उनके पीछे दौड़ रहा था, लेकिन फिर भी बुद्ध को पकड़ नहीं पा रहा था। भगवान बुद्ध रुक गए और जब डाकू अंगुलिमाल का आमना-सामना हुआ तो शांत भाव से कहा, हे वत्स अंगुलिमाल! मैं तो रुका हुआ हूं, अब तू भी पाप-कर्म करने से रुक। मैं इसलिए आया हूं कि तू भी धर्म-पथ का अनुगामी बन जाए। अंगुलिमाल पर आकाशवाणी की भांति ओजपूर्ण, मधुर एवं सिहरन पैदा करने वाले बुद्ध के वचनामृत का प्रभाव पड़ा। वह बोला, श्रमण ने मुझे जीत लिया। मैं आपके धर्म को स्वीकार करने के लिए तैयार हूं। उसने अपने गले से अंगुलियों की माला उतारकर दूर फेंक दी और अपनी तलवार भगवान के चरणों में समर्पित कर धर्म-दीक्षा की याचना की। धर्म-दीक्षा के लिए आज भी दंडकारण्य तरस रहा है। शेष को बचाने के लिए परिवेश को बदलने की दरकार है।

व्यावसायिक होती संवेदनाएं

टीस उठती है। दर्द शरीर के किसी भाग में नासूर बन कर नहीं उभरा है। दिल बेचैन है, मन व्यथित है। राहत के नाम पर आहत करने की परंपरा गली-कूचों से लेकर अट्टालिकाओं तक आ पहुंची है। सांसत हर जगह घर गया है। व्यवस्था अव्यवस्था के रूप में परिणत होते जा रहा है। हैरतअंगेज रूप से नामचीन अर्वाचीन की ओर तो अनाम नई पहचान के रूप में अब इंगित किए जा रहे हैं। कभी खानाबदोश के रूप में पहचाने जाने वाले अब बाशिंदे तय कर दिए गए हैं। आज यही पहचान बनते जा रहे हैं-हमारी नई संस्कृति के लिए। अहम बात यह कि इनका हमारी संस्कृति से दूर-दूर तक कोई जुड़ाव नहीं होता। नतीजा, संवेदना शुद्ध रूप से व्यावसायिक हो गई है। पैसे के हिसाब से रोना, पैसे के हिसाब से हंसना, पैसे के हिसाब से ही सहयोग की भावना रखना। फिर उम्मीद ही बेमानी है। ऐसे चरित्र के बल पर अपनी पहचान तो कभी हो ही नहीं सकती। दु:ख इसका और ज्यादा है कि जड़ से जुड़े लोग इनकी वजह से हाशिए पर खदेड़ दिए गए हैं। परिणाम भी सामने ही है। जहां कोई टक्कर देने की सोच भी नहीं सकता था, धक्के मार कर जा रहा है। चोट अंतर्मन पर लगती है। सोचने की विवशता आ खड़ी होती है कि जिसके लिए सबको छोड़ा, क्या तू वही है। अगर वही सही है तो इतने दिनों से मैं ही गलत था। पराए कंधे पर सर रखकर नाहक ही इतने दिनों तक गलमतफहमी का शिकार बना रहा। इत्तेफाक से साफ दर्पण हाथ लगा है। कोई धुंंधलका नहीं, तस्वीर तकदीर को साथ लिए खड़ी है। मैं अपने को ही मुंह चिढ़ा रहा हूं। इतने दिनों तक खुद को ही नहीं पहचान सका। मैं कौन हूं-पता किसी और से पूछ रहा हूं। शायद कोई मिले और मेरी बातों पर मुहर लगा दे कि बेवकूफों की कोई पहचान नहीं होती। ढूंढने की जरूरत ही क्योंकर, अपना चेहरा क्या कम है।

जनगणना में जाति का सवाल

2011 की जनगणना के लिए भारत सरकार की सेनाएं (कर्मचारियों की फौज) सज गईं हैं। हर घर जाकर भारत की वर्तमान जनसंख्या के बारे में आंकड़े जुटाए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया के पहले चरण में जनगणना में लगे अधिकारी, लोगों के पास पहुंचने आरंभ हो गए हैं, बावजूद इसके संसद में बैठे जनसेवकों का एक बहुत बड़ा धड़ा आज भी इस बात पर आमदा ही नजर आ रहा हैं कि जनगणना को जातिगत आधार पर कराया जाए। देखा जाए तो भारत जैसा देश दुनिया में बिरला ही होगा, जहां हर वर्ग, धर्म, सम्भाव के लोगों को अपने मन मर्जी के काम करने की पूरी आजादी है। इन परिस्थितियों में भारत में जनगणना को जाति, वर्ग, संप्रदाय से पूरी तरह मुक्त ही रखा जाना चाहिए था। एक तरफ तो भारत सरकार यह बात जोर शोर से कहती है कि हम सिर्फ भारतीय हैं, वहीं दूसरी ओर जनगणना में जाति, वर्ग, संप्रदाय की बात कहना बेमानी ही होगा। भारत में जाति आधारित जनगणना का 1931 से 2001 तक किसी को भी जाति आधारित जनगणना नहीं किए जाने से कोई आपत्ति नहीं हुई। भारत गणराज्य के संविधान निर्माताओं ने भी जाति आधारित जनगणना को समर्थन नहीं दिया। दरअसल, जाति आधारित जनगणना को हवा मिली है पिछड़ों को आरक्षण देने की कवायद के बाद। पिछड़ों के बल पर राजनीति करने वाले नेताओं को लगने लगा है कि जाति आधारित जनगणना से अगड़ों और पिछड़ों की संख्या का ठीक-ठीक भान होने पर वे अपनी राजनीति को और अधिक चमका सकेंगे। देखा जाए तो यह मामला काफी हद तक आईने की तरह ही साफ है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी इस तरह की मांग उठी थी, तब वाजपेयी की अगुआई में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इसे सिरे से खारिज कर दिया था। इसके बाद पिछले साल नवंबर में केंद्रीय कानून मंत्री ने भी जाति आधारित जनगणना चाही थी, पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इसे भी खारिज ही कर दिया था। जाति आधारित जनगणना चाहने वालों का तर्क सही करार दिया जा सकता है कि जब सरकार जाति के आधार पर आरक्षण और अन्य कार्यक्रमों का संचालन करती है तो फिर जनगणना को जाति के आधार पर क्यों नहीं! इस मामले में सरकार को सोचना ही होगा कि आखिर ऐसा क्यों! क्या देश के शासकों ने अब तक की नीतियां इतनी खोखली बनाईं थीं कि समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान करने के बावजूद पिछड़ों को मुख्यधारा में नहीं लाया जा सका है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि जाति आधारित आरक्षण को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया जाना चाहिए। इसके स्थान पर अब गरीबों की आर्थिक स्थिति को आधार बनाकर आरक्षण का प्रावधान किया जाना चाहिए, क्योंकि गरीब की कोई जात नहीं होती। आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों को वास्तव में सरकारी इमदाद की आवश्यक्ता है। विडंबना ही कही जाएगी कि इस मामले में न तो केंद्र सरकार ही कोई ध्यान दे रही है और न ही विपक्ष में बैठे जनसेवक ही कोई प्रयास करते नजर आ रहे हैं। भारत की आजादी के उपरांत यही अवधारणा जन्मी थी कि वंचित और दबे कुचले, असहाय समुदायों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण की अस्थाई व्यवस्था की जाए ताकि ये अपना सामाजिक जीवन बेहतर बना सकें। यह व्यवस्था पहले दस सालों के लिए लागू की गई थी, बाद में किसी जांच आयोग के कार्यकाल की तरह इसकी समयावधि निरंतर ही बढ़ाई जाती रही है। देखा जाए तो आरक्षण के पीछे मूल भावना यह रही है कि जात-पात के भेदभाव को अंततोगत्वा समाप्त ही किया जाए। पिछले कुछ दशकों में आर्थिक सामाजिक विकास की सतत प्रक्रिया ने लोगों के रहन-सहन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसके परिणाम स्वरूप समाज और परिवार का ढांचा बदला है। एक समय था जब अंतर्जातीय विवाह करने वाले को आश्चर्य की नजर से देखा जाता था। आज खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों को अगर छोड़ दिया जाए तो इस तरह के विवाह आम हो चुके हैं। 2011 की जनगणना में 2,209 करोड़ रुपए फूंके जाने वाले हैं, इस बार। इस काम में 12 हजार टन कागज का प्रयोग किया जाएगा, एवं 64 करोड़ से ज्यादा फार्म भरे जाएंगे। इस काम में 25 लाख से अधिक कर्मचारी और अधिकारी शामिल हो रहे हैं । इसमें 7 हजार कस्बे और 6 लाख गांव शामिल किए गए हैं। देखा जाए तो जब बच्चा स्कूल में पढ़ता है, तब उसे यह पता नहीं होता है कि वह जिसके बाजू में बैठकर अध्ययन कर रहा है वह किस जाति का है, वह तो महज उसका नाम ही जानता है। स्कूल में रोजाना आधी छुट्टी के वक्त जिसके साथ बैठकर वह अपना टिफिन शेयर करता है, वह किस जाति का है उसे इससे कोई लेना देना नहीं होता है। बाद में जब वह पढ़ लिखकर नौकरी के लिए जाता है तब जरूर उसे पता चलता है कि फलां नौकरी उसके उसी बाल सखा को मिल गई क्योंकि वह पिछड़ा था, और वह इसलिए वंचित रह गया क्योंकि वह अगड़ी जाति के घर में जन्म लेकर दुनिया में आया है। इस तरह के भेदभाव को जन्म देने वाली व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से रोकने की महती आवश्यक्ता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारतवासियों की आपस में बढ़ती कटुता को और अधिक बढ़ाने के मार्ग प्रशस्त होंगे, जिसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि जनसेवकों को अपने निहित स्वार्थों को परे रखना ही होगा, और अखंड भारत में दरार डालने वाली जात पात की व्यवस्था पर लगाम लगाना होगा, वरना आने वाले कल के भारत की तस्वीर और भयावह हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

दिल्ली दिल से सुने

विदर्भ की विधवाएं अब अपना दुखड़ा सुनाने दिल्ली जाएंगी। वे प्रधानमंत्री को बताने की कोशिश करेंगी कि कैसे प्रधानमंत्री राहत पैकेज के नाम पर जो कुछ विदर्भवासियों को दिया गया वह सब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। दरअसल राज्य की पब्लिक एकाउण्ट्स कमेटी ने नवंबर 2009 में सदन पटल पर जो रिपोर्ट रखी थी उसमें बताया था कि प्रधानमंत्री राहत पैकेज के नाम पर जो 3750 करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे वे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। अब खबर है कि राज्य सरकार फिर 7650 करोड़ के सिचाईं पैकेज की मांग कर रही हैं। दरअसल दिल्ली दौरे का उद्देशय इसी पैकेज के बंदरबांट को रोकने की कवायद है, ताकि किसी और किसान की लाश उसके खेतों से न निकले। देखा जाए तो आए दिन यहां हो रही किसी एक किसान की मौत विदर्भ में खदबदा रही मौत की हांडी के एक चावल की तरह है। कहते हैं कि विदर्भ कृष्ण की पटरानी रुक्मिणी का मायका है और कालिदास के मेघदूत पर भरोसा करें तो यक्षों और गंधर्वों का निवास स्थान। लेकिन कभी धन-धान्य से भरपूर विदर्भ की हवा में श्मशान की गंध भरी हुई है। प्रेमचंद के किस्सों में आजादी के पहले के किसानों के मजदूर बनने का जो दर्द मिलता है, वो विदर्भ में छितराया पड़ा है। विदर्भ के किसानों से मिलें तो साफ हो जाएगा कि उनकी जिंदगी ही कर्ज है। हर अगली फसल के लिए कर्ज लेने को मजबूर। शादी-विवाह या त्योहारों के लिए भी वो कर्ज पर निर्भर हैं। और जब बैंक या साहूकार का दबाव बढ़ता है तो वे चुपचाप कीटनाशक पीकर जिल्लत की जिंदगी से विदा ले लेते हैं। दिलचस्प बात ये है कि सरकार बीच-बीच में कर्जमाफी की जो लोकलुभावन घोषणा करती है, उसका कोई खास लाभ किसानों को नहीं मिलता। कर्ज में डूबे किसानों का आत्मविश्वास टूट चुका है। दूसरी तरफ किसी भी राजनीतिक दल की चिंता में ये मसला नहीं रह गया है। विदर्भ जनांदोलन समिति जैसे कुछ संगठन जरूर ये मुद्दा उठाते रहते हैं लेकिन हाशिये का ये हस्तक्षेप बड़ा स्वरूप ग्रहण नहीं कर पा रहा है। कभी-कभी तो लगता है कि विदर्भ के किसान खुदकुशी नहीं कर रहे हैं, शहादत दे रहे हैं। वे जान देकर हमें चेताना चाहते हैं कि देश को खेती और किसानों के बारे में नए सिरे से सोचना होगा। वे विकास के मौजूदा मॉडल पर बलि होकर देश की नाभिस्थल कहे जाने वाले विदर्भ में जीवन जल के सूखने की मुनादी कर रहे हैं। लेकिन ये मुनादी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था सुनने को तैयार नहीं। विकास के सारे हो हल्ले के बीच किसानों का दर्द गायब है। राजनीति तेजी से परिवेश को आत्मसात करती जा रही है। जीने की बात कौन करे मरने की घटनाओं पर भी अपना ठप्पा चस्पा करने की जिद पार्टियों ने ठान ली है। विदीर्ण व्यवस्था को भली भांति समझने में माहिर शातिर लालफीताशाही चादर ताने सो रही है। तानों से इन्हें कोई परवाह नहीं। अगर होता तो विदर्भ के किसान विधवाओं की फरियाद दिल्ली पहुंचाने की तैयारी नहीं होती। विधवा शब्द अपने आप में संवेदना का हकदार है। सिफारिश यहां आकर गौण हो जाता है, लेकिन स्थितियां उलट हो गई हैं। झोलियां फैली हैं, मगर वर्षों से खाली है। कभी कोई दिवाली नहीं।

सरकार सोई नहीं है

सरकार सोई या बीमार नहीं है, वो जाग रही है। उसने तो सत्ता, नोट और बाहुबल केत्रिफला चूर्ण से अपना हाजमा सुधार रखा है। वो पचा लेती है तिल-तिल कर मर रहे भूखे लोगों का दर्द। वो देखती है बिल्कुल करीब से महंगाई के इस दौर में गरीब का आटा गिला होते।आंकड़े एकत्र करती है औरसंसद में पेश करती है कि आज कितने किसानों ने खुद्कुशी की। वो अनुसन्धान में रत है कि आखिर बेरोजगारी से कितने परिवार तबाह होते हैं या कितने युवा काम की तलाश में उसके किसी मोर्चे में,किसी आन्दोलन मेंचन्द पैसों के लिये मर भी सकते हैं। वो अध्ययन करती हैकि ऐसे कौन से मुद्दे हो सकते हैं जो प्रजा के मर्म परप्रहार कर नाजुक भावनाओं को तहस-नहस कर सके। वो परखती है कि महंगाई के बावज़ूद आम आदमी कैसे जिन्दा रह लेता है? वो अपने साथ अपने परिजनों को भी मुफ्त हवाई यात्रा करा कर देश में फैली अस्थिरता के दर्शन कराती है। सच में सरकार सोई नहीं है। उसे चिंता है देश की। सोई तो प्रजा है जिसे कुछ भान भी नहीं कि देश चलता कैसे है? धन स्वीस बैकों में पहुंचता कैसे है? कैसे नेता बनते ही धनवान बना जा सकता है?और कैसे आदमी को उल्लू बनाया जाता है? उसने बड़ी लगन से वैज्ञानिक अविष्कार किया है कि हवा के ज्यादा दबाव में कैसे विकल्पहीनता पैदा की जा सकती है? सचमुच राजनीति का त्रिफला बहुत फलता है। जनता अर्धचेतन में है। गहरी नींद में होती तो उठाया जा सकता था। मगर वह मूर्छित है। सब देख रही है, लेकिन कुछ करने की इच्छा मात्र भी शेष नहीं।