शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

दौड़ते वाहन, टूटते नियम

 घर से स्कूल तक बच्चों की सुरक्षा राम भरोसे है। कहीं साजिश की बू तो कहीं नकारेपन की हद। ख्वाब आंखों में सजाए माता-पिता उन्हें तब तक अपलक निहारते रहते हैं, जब तक उनका वाहन नजरों से ओझल नहीं होता। वापसी के दौरान घड़ी की सूइयों की टिक-टिक और दिल की धड़कन साथ-साथ हो जाती हैं। उन्हें मालूम है कि बेपरवाह रिक्शा चालक बच्चों को किस कदर रिक्शों में ठूंस कर ले जाते हैं। इससे भी वाकिफ हैं कि खस्ताहाल स्कूली बसें कैसे मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रही हैं। नहीं भूलते वे क्षण जब दाखिला लेेने गए थे। मोटी फीस बटोरने के लिए खीसें निपोरते हुए बड़ी-बड़ी सुविधाओं का दावा किया गया था।  प्रवेश हो चुका है। घटिया वाहन व अनुभवहीन चालक, यही हकीकत है। सरकार ने भौंहें तानी तो वाहन चालक संगठनों ने आस्तीनें चढ़ा लीं। कानून सख्त हुआ तो पस्त हुए, लेकिन समय बीतने के साथ फिर मस्त हो गए। दो माह का समय मांगा था। आरटीओ के मापदंडों के अनुसार केवल १२७ बसें तैयार हैं। साफ है-नियम कागजों पर, वाहन सड़कों पर और भविष्य दांव पर...।
 मुख्याध्यापक के लिए निर्देश
1. विद्यार्थियों के सुरक्षित यात्रा की जिम्मेदारी विद्यालय के मुख्याध्यापक की है
2. प्रत्येक विद्यार्थी के आवाजाही पर विशेष ध्यान हो
3.  विद्यार्थी सुरक्षित घर पहुंचे, इसकी यातायात पुलिस से विचार-विमर्श करें। यातायात नियमन के लिए आवश्यकता अनुसार यातायात रक्षक की नियुक्ति करें
4. स्थानीय प्रशासन नगरपलिका या महानगर पालिका की सहायता से विद्यालय परिसर के आस-पास आवश्यक चिन्ह लगाए जाएं
5. नेत्ररोग तज्ञ व वैद्यकीय अधिकारी से वाहन चालकों को वैद्यकीय प्रमाणपत्र दिए गए हैं या नहीं, इसकी जांच करें
6. वाहन चालक ने यदि वैद्यकीय प्रमाणपत्र हासिल नहीं किया तो प्रतिबंध लगाएं
8. वाहन चालक के पास वाहन चलाने का पांच वर्ष का अनुभव, अनुज्ञप्ति की वैधता व सार्वजनिक बिल्ला आदि की जांच हो
9. वाहन में नियुक्त महिला सहायक व सहवर्ती का पहचान पत्र जांचे
10. नया सत्र शुरू होने से पहले साल में दो बार प्रथमोपचार की प्रक्रिया क्रि यान्वित की जाए
11. अग्निशमन यंत्र की जांच करें
12. बस की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दे
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स्कूल बस विद्यार्थियों को पालन करने के नियम
1. अपना पास हमेशा साथ रखें
2. स्थानक पर बस आने के पूर्व विद्यार्थी पहुंचें
3. बस से उतरते व चढ़ते समय अनुशासन का पालन करें
4. बस शुरू होने से पूर्व अपने स्थान पर बैठें। चलती बस में खड़े न हों
5. बड़े विद्यार्थी पीछे बैठें
6. दो सीट पर तीन व तीन सीट पर चार विद्यार्थी बैठ सकते हैं
7. शांति बनाए रखें। शोरगुल से वाहन चालक का ध्यान भटक सकता है और दुर्घटना घट सकती है।
8. शरीर का कोई भी भाग वाहन से बाहर न निकालें
9. धक्का-मुक्की न करें
10. गैरव्यवहार करनेवाले विद्यार्थियों की बस की मान्यता रद्द की जा सकती है
11. बस में पेट्रोल, डीजल, गॅस, स्टोव, फटाके जैसे ज्वलनशील पदार्थ दिखाई देने पर प्राचार्य को इसकी जानकारी दें।
12. बस चालते समय यदि बस चालक मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहें हो तो इसकी जानकारी प्राचार्य को दें
13. संशयात्मक घटना की जानकारी प्राचार्य को दें।
14. अपनी वस्तुएं स्वयं संभालें
15. बस में स्वच्छता रखी जाए
16. बस स्थानक बदलने की जानकारी 24 घंटे पूर्व विद्यालय व वाहन चालक को बताएं
17. बस का नुकसान करने पर प्राचार्य को जानकारी दें
18. बस में प्राप्त वस्तु विद्यालय में जमा कराएं
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बस चालक की पात्रता व कर्तव्य
1. वाहन चलाने का पांच वर्ष का अनुभव हो
2. प्रवासी सेवा का बिल्ला लगा होना अनिवार्य
3. स्वच्छ गणवेश पहने व व्यक्तिक स्वच्छता रखें
4. धुम्रपान न करें। मोबाइल का उपयोग न करें। हेडफोन कान में न लगाएं, रेडियो या टेपरिकार्डर का उपयोग न करें
5. बार बार ब्रेक न लगाए, गति नियंत्रित रखें
6. विद्यार्थियों चढ़ते व उतरते समय वाहन स्थिर रखें
7. वाहन शुरू होने पर दरवाजे बंद हो
8. वाहन में कर्कश हॉर्न का उपयोग न करें
9. इलेक्ट्रिक वायरिंग की समय-समय पर जांच क रें
10. विद्यार्थियों के लिए अपशब्दों का प्रयोग न करें और न ही व्यक्तिगत स्तर पर कोई सजा दें
11. परमिट, फिटनेस, इंश्योरेंस, टैक्स, पीयूसी, लाइसेंस आदि दस्तावेजों की वैधता नियमित जांचें
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हंगामा है यूं बरपा
 शहर और शहर से बाहर के इलाकों में आरटीओ के नियमों को ताक पर रख कर स्कूल बसें और वैन चल रही हैं।  कार्रवाई के बावजूद वे बाज नहीं आ रहे हैं।  मार्च में जब आरटीओ ने इन बसों पर कार्रवाई शुरू की थी, तब बच्चों की परीक्षा होने की दुहाई देकर इन्होंने २ माह का समय मांगा था। उस समय सभी  ४५२ बसों को आरटीओ के मापदंडों के अनुसार तैयार करने का आश्वासन दिया था। दो माह बीत गए, किंतु अब तक केवल १२७ बसें ही पूरी तरह से तैयार हैं। उस समय तो राजनेताओं के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई रोक दी गई, किंतु अब आरटीओ सख्त दिखाई दे रहा है। स्कूल शुरू होते ही कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है। पहले दिन कुल २०० बसों की जांच की गई, जिनमें से ६९ बसों के खिलाफ कार्रवाई की गई। गुरुवार को कार्रवाई में  १०० बसों की जांच की गई, जिसमें से ५१ पर कार्रवाई हुई।  २८ बसों को डिटेन किया गया है और अन्य से दंड वसूला गया।वर्ष भर का आंकड़ा देखा जाए तो मार्च २०१३ तक आरटीओ ने ९०६ बसों की जांच की थी, जिनमें से ३४१ बसें आरटीओ के मापदंडों के अनुसार नहीं थी।  इन बस चालकों से २१ लाख ९३ हजार रुपए का जुर्माना वसूला गया। अप्रैल माह में भी ९४ बसों की जांच की गई थी, जिनमें से ३० बसें से २१००० रुपए जुर्माना वसूला गया।
विधायकों ने की थी मध्यस्थता
आरटीओ जब सख्ती से कार्रवाई कर जुर्माना लगा रहा था उस समय शहर के तीन विधायकों ने स्कूल बस और वैन चालकों की ओर से मध्यस्थता की थी। चालक-मालक के हवाले से उन्होंने कार्रवाई की समय सीमा बढ़ाने की मांग की थी, किंतु दो माह का समय बीतने पर भी स्कूल बसें पूरी तरह तैयार नहीं हुई है।
 बच्चे हैं, पार्सल नहीं
विद्यार्थी परिवहन के लिए आसन (बैठने) क्षमता निश्चित है। सामान्यत: तीन और छह आसनी ऑटो-रिक्शा का उपयोग किया जाता है, लेकिन उसमें क्षमता से अधिक विद्यार्थियों को ठूंसा जाता है। बच्चे ठीक से बैठ भी नहीं पाते हैं। कभी सिर बाहर निकलता है तो कभी हाथ। कुछ बच्चे तो मानते हैं कि दम भी घुटता है। ऐसा लगता है मानों हम बच्चें नहीं, रेलवे का पार्सल हैं।
बस्ते और डिब्बे बाहर
बच्चों को ऑटो में तो ठूंस दिया जाता है, लेकिन उनके  बस्ते और डिब्बे की जगह नहीं रहती। ऑटो-रिक्शा के बाहर दोनों झूलते रहते हैं।  गिर गए तो बच्चे उतरकर वापस रखते हैं। ऐसे में दुर्घटनाओं का अधिक डर बना रहता है।
बसों की दयनीय अवस्था
ऑटो से ज्यादा स्कूल बसों को महफूज माना जाता है। स्कूल प्रशासन ने इन्हें अधिकृत भी किया है, किन्तु इनकी स्थिति  देखकर पालक दूरी बना लेते हैं। फटी सीटें, टपकता पानी इन बसों की कहानी है। लोहे के टूटे रॉड अलग खामी बताते हैं।  अतिरिक्त विद्यार्थियों को बैठा लेना तो जैसे फितरत में शामिल है।  चालक गाड़ी चलाने में व्यस्त रहता है पर बच्चों पर ध्यान देने वाला कोई नहीं रहता। दुर्घटना की आशंका इसके कारण भी रहती है।
स्कूल वैन की हालत भी समान
स्कूल वैन की हालत भी ऑटो रिक्शा और स्कूल बस की ही तरह है। क्षमता से अधिक विद्यार्थी, असुविधा होने से  खतरा बना रहता है। दूसरी ओर अप्रशिक्षित चालक, परिवहन नियमों की जानकारी नहीं होने से अनेक बार नियमों का उल्लंघन करते हैं। इससे भी दुर्घटनाओं का डर बना रहता है।
मुंह में दबा रहता खर्रा-पान
इन वाहनों के चालकों के मुंह में खर्रा-पान दबा रहता है। कई बार तो बच्चे शिकायत यह भी करते हैं कि वाहन रोककर ये अपनी आदतों को पूरा करते हैं। अविकसित मन-मस्तिष्क पर इसका भी बुरा असर पड़ता है।
गैस-कीट पर धड़ल्ले की दौड़
अनेक मामलों में खुलासा हुआ कि वैन में रसोई गैस का धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है। निकृष्ट दर्जे की गैस-कीट होने से विद्यार्थियों की जान दांव पर लगी रहती है। आरटीओ द्वारा शहर में अधिकृत 79 वैन गैस-कीट पर दौड़ रही हैं। लेकिन जानकार गैस-कीट पर दौडऩे वाले वाहनों का आंकड़ा हजारों में बता रहे है। इन पर आरटीओ का कोई अंकुश नहीं। आरटीओ में अधिकृत नहीं होने से नियमों का भी यह धड़ल्ले से उल्लंघन करते हैं। इसके अलावा बच्चों के लिए यह वाहन और मायने में भी घातक बन गए हैं। वैन का कांच खुला रहने पर बच्चे हाथ-सिर बाहर निकालते हैं। उतरते समय अनेक बार पैर फिसल जाता है और चालक वैन शुरू कर आगे निकलता रहता है।
कर रहे हैं नजरअंदाज
स्कूल बस, ऑटो रिक्शा और स्कूल वैन के अवैध परिवहन पर रोक लगाने की जिम्मेदारी यातायात पुलिस और प्रादेशिक परिवहन अधिकारी (आरटीओ) कार्यालय की है। लेकिन दोनों इसे नजरअंदाज कर रहे हैं। मिलीभगत के कारण कार्रवाई की आवश्यकता महसूस नहीं होती।
डेढ़ हजार से अधिक स्कूलों में समिति नहीं
स्कूल बस और स्कूल वैन पर नियंत्रण और निगरानी रखने के लिए जिलास्तरीय और शालास्तरीय समिति बनायी गई है। पुलिस आयुक्त जिलास्तरीय समिति के अध्यक्ष हैं। समिति में शिक्षणाधिकारी, उप-आरटीओ, एसटी के जिला नियंत्रक शामिल हैं। शाला में मुख्याध्यापक, पालक प्रतिनिधि और परिवहन शाखा के पुलिस निरीक्षक शामिल हैं, लेकिन शाला समिति को लेकर उदासीनता बरती जा रही है। लगभग 400 स्कूलों में समिति गठित होने की जानकारी है। डेढ़ हजार से अधिक शालाओं में समिति का गठन नहीं हुआ है। शिक्षणाधिकारी माध्यमिक शाला के श्री ठमके ने बताया कि विभाग ने समिति गठन को लेकर सभी स्कूलों को निदेशित किया है लेकिन कई स्कूल इसे लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं। जल्दी ही विभाग ऐसी स्कूलों को नोटिस जारी कर कार्रवाई करने की तैयारी में है। सीबीएसई स्कूलों के लिए कार्रवाई करने का मामला उपनिदेशक के पास भेजेंगे। उन्होंने यह भी दोहराया कि नियमों का पालन नहीं करनेवाले स्कूलों की मान्यता रद्द भी की जा सकते हैं।
 प्रमाणपत्र देने में उदासीनता
आरटीओ की नियमावली में स्कूल द्वारा परिवहन प्रमाणपत्र देने की शर्त जोड़ी गई है। लेकिन, जिन स्कूलों से विद्यार्थियों का परिवहन स्कूल बस, स्कूल वैन और ऑटो रिक्शा से होता है, उन्हें स्कूल व्यवस्थापन और प्राचार्य ने प्रमाणपत्र देने से इनकार किया है। पालक भी उदासीन हैं। बच्चा स्कूल में सुरक्षित जा रहा है या नहीं? इसकी कभी चिंता नहीं करते। शाला समिति के लिए पालक प्रतिनिधि का अभाव या नहीं मिलना भी बड़ा सवाल बना हुआ है। इस कारण शाला समिति बनाने में दिक्कतें आने की जानकारी मिल रही है।
प्रश्न फिर भी खड़ा
 अधिकृत स्कूल बस, स्कूल वैन और ऑटो रिक्शा कैसे चलाएं, यह प्रश्न खड़ा हो रहा है। शहर की नामी स्कूलों से ऐसे प्रमाणपत्र नहीं मिलने से चालक संगठित हो रहे हैं। दो हजार स्कूल बसों में से आधे में सभी सुविधा हैं, मगर आरटीओ एनओसी देने के लिए तैयार नहीं है।
नियमावली स्पष्ट नहीं
फिलहाल स्कूल वैन या बसों के लिए नियमावली स्पष्ट नहीं है। संगठनों ने अनेक बार मांग की है कि स्कूल वैन के लिए स्वतंत्र नियमावली हो। किन्तु इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
 नियमों की फेहरिस्त लंबी, व्यवस्था ठिगनी
 स्कूल बस वैन, आटो संचालकों ने नए नियमों के अनुरूप  कमर कस ली है, प्रशासन ने भी मुस्तैदी का मुखौटा पहन लिया है।  हाल में हुई दुर्घटनाओं के आलोक में जिन नियमों का खाका राज्य सरकार ने परिपत्रक में खींचा है, उसे अमलीजामा पहनाने की तैयारी आधी अधूरी है। स्कूली छात्रों की सुरक्षा को लेकर  राजपत्र में प्रशासनिक स्तर से लेकर स्कूल संचालकों व स्कूल बस, वैन व आटो संचालकों तक की भूमिकाएं स्पष्टï की गई हैं। लेकिन सारा ध्यान स्कूल बस और आटो वैन चालकों के खिलाफ कार्रवाई पर लाकर टिका दिया जा रहा है।
आरटीओ का वाहन जांच जिम्मा
 सरकार के परिपत्रक में सकूल वाहनों के लिए सुरक्षा नियमों और मानकों को लेकर क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय को प्रमुख जिम्मेदारियां दी गई हैं। आरटीओ ने बीते वर्ष नकेल भी कसी, जिसके खिलाफ स्कूल वाहन धारकों ने विरोध प्रदर्शन, धरना एवं घेराव का सहारा लिया। देखते-देखते पिछला शिक्षा सत्र विरोध और खींचतान की भेंट चढ़ गया। गर्मियों की छुट्टिïयां लगने के बाद स्कूल बस धारकों और आरअीओ ने चैन की सांस ली।  इस वर्ष स्कूल शुरू होने के साथ आरटीओ द्वारा विशेष जांच मुहिम चलाया जाना कई सवालों को जन्म दे रहा है।
नियमों की अनदेखी करते आटोरिक्शा
 स्कूल बसों के मुकाबले आटो रिक्शा की संख्या दोगुनी है, मगर सुरक्षा अनिवार्य उपकरणों की अनदेखी साफ झलकती है।  ये निरीक्षण का विषय भी हो सकता है कि स्कूली आटो में कितने आटो के इंडिकेटर, लाइट, हार्न, दाहिना हिस्सा बंद, फस्र्ट एड बाक्स की जांच-पड़ताल की गई है या इनकी अनदेखी की जा रही है। रोड सेफ्टी स्वयंसेवी संस्था के तुषार मंडलेकर ने कहा कि आरटीओ को कितने ओवर सीट व खराब स्थिति वाले आटो को परमिट दे चुका है, इसकी जांच करनी चाहिए। परिपत्रक को अमलीजामा पहनाने वाली अधिकृत एजेंसियों की ढिलाई सुरक्षा में सेंध लग रही है।  
  दिखते नहीं स्कूल बस स्टॉप
 राजपत्र में निर्देश हैं कि सभी स्कूलों के स्कूल वाहन धारकों को छात्रों के मार्ग के अनुसार स्कूल बस स्थानक चिन्हित कर उसकी व्यवस्था करना चाहिए। लेकिन ऐसे स्कूली बस स्थानक  दिखाई नहीं देते। शहर में डेढ़ हजार से अधिक स्कूले हैं। प्रशासन स्कूली छात्रों की सुरक्षा को लेकर संजीदा भी है, लेकिन आंखें भी बंद है।
घटी वैनों की संख्या
नागपुर शहर स्कूल बस संचालक एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्रसिंह चौहान ने कहा कि सभी स्कूल बस संचालक व अन्य वाहनधारक कड़ाई से नियमों का पालन कर रहे हैं। एसोसिएशन नियमों की अनदेखी करनेवाले स्कूल वाहनधारकों पर कार्रवाई के पक्ष में है। वैनों पर बरती जा रही कड़ाई से इस वर्ष कई वैनों की संख्या घटी है।  लिहाजा पालक अधूरे नियमों की स्थिति में अपने बच्चों को स्कूल भेजने पर मजबूर हैं।
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सर्वशिक्षा यहां शर्मसार

शिक्षा स्तर में सुधार की बात तो बहुत होती है पर वे सभी जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। उपराजधानी में कई स्कूलों पर लगा ग्रहण आसानी से देखा जा सकता है।  राज्य सरकार ने 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए 'बालकांचा मोफ्त व सक्तीच्या शिक्षणाचा अधिकार अधिनियम-2009 को 31 मार्च 2013 से पूरी तरह अमल में लाने निर्णय लिया है। इसमें महानगरपालिकाओं के अंतर्गत आने वाले स्कूल भी शामिल हैं।  विडंबना ही है कि विद्यार्थियों की कमी के चलते महानगरपालिका की कई स्कूलें बंद तक कर दी गईं। सुविधाओं की घोषणा के बावजूद पालक मनपा शालाओं का रूख नहीं करते, लेकिन शहरी आबादी के बीच कुछ ऐसे भी परिवार हैं, जिनके बच्चे महानगरपालिका और जिला परिषद की स्कूलों में पढ़ते हैं पर उन स्कूलों की हालत बेहद खराब है। छतें बारिश की बूंदों को संभाल नहीं पाती। कई शालाओं में तो छात्र-छात्राओं के लिए एक ही प्रसाधनगृह है। बानगी के तौर पर पूर्व नागपुर के मिनी माता नगर मनपा शाला, संजयनगर मनपा शाला, कुंदनलाल गुप्ता मनपा शाला जैसी अनेक स्कूलों को रेखांकित किया जा सकता है।  इनकी हालात देखकर यह कहीं से नहीं कहा जा सकता है कि यह किसी 1400 करोड़ रुपए के सालाना बजट वाली महानगरपालिका के स्कूल हैं। शाला के आस पास का परिसर तो कूड़ा घर बन चुका है।  भयंकर बदबू रहती है। शाला के आस-पास मवेशी घूमते नजर आते हैं।  संभवत: यही कारण है कि इन स्कूलों को देखने का नजरिया भी बदल गया है और बौनी मानसिकता के बूते आसमान छूने की बात बेमानी ही है...।
  मिनी मातानगर मनपा शाला
इस शाला की इमारत में हिंदी तथा मराठी की 1 से 4 तथा 4 से 7 तक की कक्षाएं लगती हैं। दोपहर की हिंदी प्राथमिक शाला में 129 छात्र तथा 150 छात्राएं अध्ययनरत हैं। सुबह तथा शाम के सत्रों में अलग-अलग शालाएं संचालित की जाती हैं। प्रसाधनगृह के अभाव में विशेष रूप से छात्राओं को आस-पड़ोस के मकानों में शरण लेनी पड़ती है। शिक्षकों ने आपस में चंदा जमा कर छात्राओं के लिए एक प्रसाधनगृह बनवाया। छात्रों को सुरक्षा दीवार का सहारा लेते देखा जा सकता है। मजबूरी में छात्र-छात्राएं एक ही प्रसाधनगृह का उपयोग करते देखे जाते हैं।
 संजयनगर हिंदी मनपा शाला
मनपा द्वारा संचालित वृहद शाला में संजयनगर हिंदी शाला का शुमार होता है। यहां पहली से दसवीं तक की पढ़ाई होती है।  विद्यार्थियों की संख्या को देखते हुए यहां सुबह तथा दोपहर, दो  सत्र में पढ़ाई होती है।  सुबह की शाला में 6 शाखाएं हैं। छत्तीसगढ़ी मजदूर बहुल इस क्षेत्र में छात्र-छात्राओं की संख्या ज्यादा है। मनपा प्रशासन द्वारा ऐसी शालाओं की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, जबकि यहां कुछ गज के परिसर को मैदान का रूप दिया गया है। शाला में कुल 6 से 8 हजार विद्यार्थी हैं पर प्रसाधनगृह की उचित व्यवस्था नहीं। पेयजल का नल सिर्फ आधे दिन शुरू रहता है। शौचालय गंदगी से भरे पड़े हैं। बारिश में दूसरे माले की कक्षाओं में छत से पानी टपकने लगता है। मनपा प्रशासन द्वारा विद्यार्थियों को किताब, कॉपियां, बरसाती, बस्ते, साइकिल, जूते, मोजे, टाई, बेल्ट तथा भोजन की व्यवस्था पर बड़ी धनराशि खर्च की जाती है, जबकि दैनंदिन आवश्यकताओं की अनदेखी की जाती है। प्रभाग 33 के सरिता ईश्वर कावरे तथा जगतराम सिन्हा के क्षेत्र में यह शाला स्थित है। पेयजल की व्यवस्था के लिए लगाई गई पानी टंकी टूटी-फूटी अवस्था में है। उचित नियोजन के अभाव में प्रशासन की बड़ी धनराशि यहां व्यर्थ पाई जा रही है।
 कुंदनलाल गुप्ता मनपा शाला
देश के विख्यात क्रांतिकारी कुंदनलाल गुप्त के नाम पर चल रही मनपा शाला के विद्यार्थी कुंदनलाल गुप्ता के इतिहास से अनभिज्ञ हैं। शाला में कहीं भी कुंदनलाल गुप्ता का छायाचित्र नहीं। करीब 9 हजार छात्र-छात्राएं यहां शिक्षणरत हैं। प्यास बुझाने के लिए इन्हें शाला से बाहर जाना पड़ता है। पहली से चौथी तक के छात्र-छात्राओं के लिए एक ही प्रसाधनगृह है। बारिश होते ही परिसर तालाब में तब्दील हो जाता है। सुबह तथा दोपहर, दो सत्रों में  स्कूल चलता है। प्रभाग क्र. 14 के नगरसेवक पूर्व महापौर किशोर डोरले तथा सिंधु उईके के क्षेत्र में यह शाला है।
 निजी स्कूलों को मिल रहा फायदा
इन सभी क्षेत्रों की शालाओं में व्याप्त असुविधाओं का पूरा लाभ निजी शालाएं उठा रही हैं। मई-जून माह में इनके एजेंट प्रलोभन देकर शाला के आसपास की बस्तियों से छात्र-छात्राओं को 'हथिया लेते हैं। उचित नियोजन व्यवस्था अपनाकर प्रशासन द्वारा खर्च की जा रही राशि की सार्थकता निश्चित की जा सकती है। प्रत्येक शालाओं को मिलने वाले विभिन्न अनुदान से भी छोटी-मोटी समस्याएं दूर की जा सकती हैं। सभी शालाओं में पालक समिति  है। प्रभाग के नगरसेवक तथा शाला के मुख्याध्यापक, पालक समिति के अध्यक्ष तथा सचिव होते हैं। व्यवस्थापन समिति, पालक समिति तथा प्रशासन के उचित तालमेल से  इन असुविधाओं को दूर करने के लिए अनुकूल स्थिति बनाई जा सकती है।
गुहार से नहीं, सुधार से बनेगी बात
नागपुर विभाग में पहली से बारहवीं कक्षा तक कुल मिलाकर 3 हजार 928 विद्यालय हैं। इसमें 9 लाख 13 हजार 159 विद्यार्थी हैं। इनके भविष्य की बागडोर 31 हजार 568 शिक्षकों पर है। पहली से आठवीं कक्षा में 6 लाख 47 हजार 92 विद्यार्थी और लगभग 22 हजार 990 शिक्षक हैं। विद्यालयों की संख्या के हिसाब से मुख्याध्यापकों की संख्या काफी कम यानी 1 हजार 985 हैं। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिहाज से नागपुर जिले को 13 ब्लॉक व 5 यूआरसी में विभाजित किया गया है।
यह है नियम
शिक्षा का अधिकार नियम (आरटीई) के अनुसार पहली से चौथी कक्षा तक 30 विद्यार्थियों पर 1 शिक्षक होना चाहिए। इसके माध्यमिक यानी पहली से सातवीं तक 35 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक होना चाहिए।
विद्यालयों की संख्या
नागपुर विभाग में जिला परिषद की 1 हजार 528, महानगरपालिका के 209, नगर परिषद के 75, राज्य सरकार द्वारा संचालित 19 विद्यालय हैं। निजी अनुदानित 1 हजार 118 व बिना अनुदानित 873 विद्यालय हैं।
शालेय पोषण आहार व मध्याह्न भोजन
पहली से पांचवीं कक्षा तक विद्यार्थियों को दी जानेवाली खिचड़ी को शालेय पोषण आहार नाम दिया गया है। इसमें प्रति विद्यार्थी के हिसाब से 3.2 पैसे सरकार प्रदान करती है। छठवीं से आठवीं कक्षा को दी जानेवाली खिचड़ी को मध्यान भोजन कहते हैं। इसमें प्रति विद्यार्थी  4.47 पैसे सरकार देती है। ग्रामीण भागों में अनाज रखने के लिए कोठियां प्रदान की गई हैं। शालेय पोषण आहार व मध्याह्न भोजन की व्यवस्था सरकारी व अनुदानित विद्यालयों के लिए ही की गई है। समय-समय पर अधीक्षक विद्यालयों का दौरा करते हैं। भोजन बनाने वाले स्थान  और प्रयुक्त बर्तनों की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना होता है। सर्वशिक्षा अभियान के तहत शिक्षा व विद्यालयों की स्थिति सुधारने के लिए राज्य सरकार भले ही करोड़ों रुपये खर्च कर रही हो लेकिन इसका सही तरीके से नियोजन नहीं होने से कई विद्यालय नवीनीकरण के इंतजार में हैं।
न्यायालय जा सकते हैं पालक
पहली से आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों का मूल्य मापन करना शिक्षकों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है। शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास के साथ ही विषयों से जुड़ी विद्यार्थी की हर समस्या का समाधान जरुरी हो चुका है। पहली कक्षा का विद्यार्थी आगे की कक्षा में जाता है और यदि वहां वह लिखने पढऩे में असमर्थ होता है, तो पालक संबंधित शिक्षक व शाला प्रशासन की कार्यपद्ïधति पर सवाल उठा सकते है। इतना ही नहीं वे न्यायालय में इसकी शिकायत भी दर्ज करवा सकते हैं। नियमानुसार शिक्षकों की विद्यार्थी के प्रति जिम्मेदारी बढ़ गई है। कमजोर विद्यार्थी को महज कमजोर मानकर छोड़ा नहीं जा सकता है। कमजोर विद्यार्थियों को सामान्य श्रेणी में लाने के लिए शिक्षकों को काफी मेहनत करना जरूरी हो गया। इसके लिए शाला प्रशासन को विद्यार्थी का मूल्य मापन करते समय विशेष ध्यान देने की जरुरत होगी।
शिक्षकों की संख्या कम
विद्यार्थियों की संख्या के लिहाज से शिक्षकों की संख्या काफी कम है। सरकार ने भले ही कक्षाओं को बढ़ाने के निर्देश जारी किए हैं, लेकिन इसे जल्दी से अमल में लाना मुश्किल है। अध्यापन कार्य के अलावा शिक्षकों को  जनगणना, मतदाता सूची बनाने, पल्स पोलियो अभियान जैसे कई शासकीय कार्यों में लगाया जाता है।  साफ है कि विद्यार्थियों की गुणवत्ता बढ़ाने की बात तो होती है, लेकिन अध्यापन की गुणवत्ता व शिक्षकों की संख्या बढ़ाने पर विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
शिक्षक व विद्यार्थी के बीच खाई
सरकार ने अनेक नियमों में शिक्षकों के हाथ बांध दिए हैं। वे विद्यार्थियों को न  सजा दे सकते हैं और न ही ऊं ची आवाज में डांट सकते है। ऐसे में विद्यार्थियों में अब शिक्षकों का खौफ नहीं रह गया है। शिक्षकों से बदतमीजी भी आम हो गई है। शिक्षक  के नाराज होने पर सीधे पालक को बुला लिया जाता है। ऐसे में शिक्षक व विद्यार्थी के बीच खाई गहरी होती जा रही है।
औपचारिकता बना शालेय परिपाठ
राज्य के सभी विद्यालयों में विद्यार्थियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिए शालेय परिपाठ को सम्मिलित तो किया गया है, लेकिन वर्तमान में यह केवल औपचारिकता बन कर रह गया है। नैतिक गुणों के विकास के साथ ही विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए इसे पाठ्ïयक्रम का हिस्सा बनाया गया था। मुख्यमंत्री मनोहर जोशी के कार्यकाल में शालेय परिपाठ को 5 से 9 वीं कक्षा तक 20 मिनट के लिए प्रार्थना सभा के दौरान अनिवार्य किया गया था। इसके तहत प्रार्थना, राष्टï्रगीत, प्रतिज्ञा, प्रोत्साहित करनेवाली कहानी, विचार, दैनिक खबरों की हेडलाइन जैसे महत्वपूर्ण अंग शामिल हैं। इसके माध्यम से विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों को बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें रोजमर्रा की घटनाओं से आद्यतन करना है।
विद्यालय विकास समिति
राज्य शिक्षा मंडल की ओर से शालाओं में लोकल एनक्वायरी कमेटी (एलईसी) में पालकों व विद्यार्थी की भूमिका पर अधिक जोर दिया जा रहा है, लेकिन विद्यालय प्रशासन की मानें तो विद्यालय द्वारा आयोजित बैठकों में पालकों की भूमिका गौण दिखाई पड़ती है। सरकारी व अनुदानित विद्यालयों में पढऩेवाले बच्चे मध्यम वर्ग या गरीबी रेखा सीमा से नीचे वाले होते हैं। ऐसे अभिभावक बच्चों की शिक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दे पाते हैं। विद्यालयों में विद्यालय विकास समिति होती है, इसमें पार्षद, प्राचार्य, उपप्राचार्य, शिक्षक, पालक, विद्यार्थी, एससी-एसटी सदस्यों का समावेश है। इसमें भी 33 प्रतिशत महिलाएं होनी चाहिए। कमेटी की बैठक में अक्सर पालकों की गैरमौजूदगी देखी जाती है। इससे बैठकों में तथ्यपूर्ण हल निकलकर नहीं आता है।
यू डायस में ली जा रही जानकारी
शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के तहत शालाओं की सटीक जानकारी प्राप्त करने के लिए उन्हें यूनीफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफारमेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यू डायस) के तहत ला दिया गया है। इसमें पहली से बारहवीं कक्षा को एक ही श्रेणी में लाया गया है। सीबीएसई, जिला परिषद, मनपा, राज्य सरकार व अन्य प्रकार की सभी विद्यालयों को शाला में उपलब्ध संसाधनों की जानकारी उपलब्ध करानी होगी। इसमें विद्यालयों में शिक्षकों, गैरशिक्षक कर्मचारियों, विद्यार्थियों की संख्या शौचालय, खेल का मैदान, पीने का पानी जैसी सुविधाओं की जानकारी देनी है।
स्थिति में बदलाव की संभावना कम
वर्ष 2011-12 में जांच के बाद पाया गया था कि 96 विद्यालय ही शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत बने नियमों पर खरी उतरी थीं। 83 विद्यालयों में एक ही शिक्षक थे। 781 शालाओं में 2 से 100 विद्यार्थी ही पाए गए थे। वर्ष 2012-13 की नई रिपोर्ट अभी तैयार नहीं हुई है। जानकारों की मानें तो उक्त आंकड़ों में ज्यादा बदलाव की उम्मीद नहीं है। वर्ष 2011 में विद्यालयों की हुई जांच के बाद नए शिक्षकों की नियुक्ति पर वैसे ही रोक लगा दी गई थी। ऐसे में शिक्षकों की संख्या में कमी की ही संभावना है।
सुविधाओं का अभाव
विद्यालयों में बिजली, पानी, फर्निचर व ढांचागत सुविधाओं का अभाव है। कुछ स्कूलें तो बंद भी हो चुकी है और कुछ बंद होने की कगार पर है। हिंदी व मराठी शालाओं में विद्यार्थियों की संख्या दिन-ब-दिन घट रही है। राज्य मंडल का पाठ्ïयक्रम चला रही अंग्रेजी माध्यम की शालाओं में भी विद्यार्थियों की कमी देखी जा रही है। पालकों की रूचि अपने बच्चे को सीबीएसई शालाओं में पढ़ाने की ओर बढ़ी है।
शिक्षक नहीं ले रहे रूचि
सूत्र से मिली जानकारी के मुताबिक, कक्षा में इक्का-दुक्का विद्यार्थी होने से शिक्षक उत्साहपूर्वक नहीं पढ़ाते हैं। ऐसी स्थिति ज्यादातर नगर परिषद, जिला परिषद व महानगरपालिका की शालाओं में देखी जा रही है।  विद्यार्थी संख्या कम देखकर कई बार शिक्षक कक्षा लेने ही नहीं पहुंचते हैं। जो आते हैं वे विद्यालय के अलावा दूसरे कार्यो में व्यस्त रहते हैं। कई बार तो शिक्षक बाहरी कार्यों के लिए बीच में ही पलायन कर जाते हैं। ऐसे में बच्चों में शिक्षा के प्रति अरुचि निर्माण होती है। जहां एक ही शिक्षक हैं, ऐसे विद्याालय में शिक्षक के अवकाश पर होने से शाला ही बंद पड़ जाती है।
 साफ है कि शिक्षा हक अभियान लक्ष्य से भटक गया है।  हर समाज के अंतिम बच्चे तक शिक्षा मिले, यह लक्ष्य खंडित हो कर रह गया है। आरटीआई के नियमों की तराजू पर मनपा के स्कूलों का आंकलन किया जाए तो चंद ही स्कूल होंगे जो सभी औपचारिकताएं पूरी करते हैं। केवल शिक्षा का अधिकार लाने से बच्चे शिक्षित नहीं होंगे, प्रशासन को इसके लिए औपचारिकताएं भी पूरी करनी होंगी।
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शनिवार, 22 जून 2013

संघ, नागपुर और भाजपा

समाज में बड़ा नाम, सम्मान पाने वालों को कई बार घर में ही सम्मान या स्वीकार्यता का संघर्ष करना पड़ता है। जानी - मानी हस्तियां इस अनुभव के साथ जीती रही हैं। सार्वजनिक जीवन में जीत के शिखर तक पहुंचने के बाद भी घर-परिवार का अपेक्षित प्रेम न मिल पाना, सालते रहता है। नागपुर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म स्थान हैं। दोनों की परस्पर पहचान जुड़ी है। देश व देश के बाहर संघ भले ही राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ रहा है, लेकिन जन्मस्थान में अब वह अपेक्षित स्थान नहीं बना पाया है।
पुस्तैनी आवास के तौर पर नागपुर में संघ की दो इमारतें हैं। 1925 में डॉ.केशव बलीराम हेडगेवार ने संघ की नींव रखी। वे कोलकाता में मेडिकल छात्र थे। अंगरेजों के राज में संघ की बातें युवाओं को प्रभावित करती थी। अंगरेजी कालोनियों का विरोध व मुस्लिमों के पृथक्कीकरण का मुद्दा उठाया जाता था। करीब दो दशक पहले तक रेशमबाग स्थित हेडगेवार भवन को ही हर कोई संघ का मुख्यालय मानता और समझता था। हेडगेवार भवन एकदम खुली सड़क और खुले मैदान से जुड़ा है। हर सुबह, शाम जितनी बड़ी तादाद में यहां शाखा लगती है और खुला मैदान होने के कारण खेल का शोर कुछ इस तरह रहता है कि पुराने नागपुर की दिशा में जानेवाले हर शख्स को दूर से दिखाई पड़ जाता है। आज भी हेडगेवार भवन सभा, चिंतन व प्रशिक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है। आधुनिकीकरण किया गया है। बड़ी लागत का सभागृह बनाया गया है। लेकिन असली संघ मुख्यालय की बात हो तो महल क्षेत्र का भवन याद किया जाता है। 6 दिसंबर 1992 को समूचे देश में हंगामा मचा हुआ था। अयोध्या-विध्वंस को लेकर क्रिया-प्रतिक्रिया की आहट सुनायी दे रही थी। तब के सरसंघचालक बालासाहब देवरस को संघ के महल-भवन के अहाते में कुर्सी पर बैठाया गया। तब तक इस संघ मुख्यालय की पहचान उसी तरह थी जैसे किसी रिहायशी बस्ती में सामाजिक संगठन के कार्यालय की रहती है। उस दिन के बाद संघ मुख्यालय मील के पत्थर में तब्दील हो गया। पुलिस के डेरे के रुप में पहचान होने लगी। सुरक्षा टेंट लगाए गए ,जवानों की टोली बिठा दी गई। 20 वर्षों में फर्क यही आया कि जवानों के पास आधुनिकतम हथियार और दूरबीनें आ गई। महल का मतलब संघ का मुख्यालय हो गया। अब संघ की सारी शतरंज यहीं खेली जाती है।
एक बात और। संघ पर अंगरेजों ने आधा दर्जन से अधिक बार प्रतिबंध लगाया। स्वतंत्रता के बाद भी 3 बार प्रतिबंध लगा। 1948 में नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की। तब गोडसे संघ छोड़ चुके थे। फिर पर संघ को प्रतिबंध की सजा मिली। आपातकाल के समय 1975 से 78 तक अन्य संगठनों के साथ ही संघ पर भी प्रतिबंध लगा। उसके बाद 1993 में संघ ने प्रतिबंध का स्वाद नागपुर में ही चखा।
अयोध्या-विध्वंस के बाद संघ को नई पहचान मिली। वह स्वयं बदलाव के पथ पर नजर आया। अयोध्या मामले पर स्वयंसेवक की भूमिका निभानेवाले कांग्रेस के बनवारीलाल पुरोहित ने भाजपा की टिकट पर नागपुर से चुनाव लड़ा। वे चुने गए, संसद पहुंचे। उस जीत से भाजपा को जितनी खुशी मिली, उससे कहीं अधिक संघ गदगद हुआ होगा। लेकिन खुशी व्यक्त करने की स्थिति भी नहीं बन पायी। संघ व भाजपा दिल्ली की राजनीति के मामले में यह कहने की स्थिति में नहीं पहुंच पाए कि नागपुर उनके साथ है।
संघ के राजनीतिक संस्करण जनसंघ को कभी नागपुर में जीत नहीं मिली। आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में जब समूचे देश में जनता लहर थी तो भी नागपुर समेत विदर्भ की सभी 11 सीटों पर जनता पार्टी का उम्मीदवार जीत नहीं पाया। प्रयासों के बाद भी संघ नागपुर में भाजपा को लाभ नहीं दिला पाया।
ऐसा भी नहीं है कि संघ को नागपुर में अपनी पहचान बनाने का अवसर नहीं मिला। स्वतंत्रता संघर्ष के समय महात्मा गांधी के समांतर संघ नेता चलते रहे। गांधी को लेकर संघ के विचार समझे जा सकते हैं। लेकिन दलितों को लेकर डॉ.बाबासाहब आंबेडकर के साथ भी संघ खड़ा नजर नहीं आया। नागपुर या महाराष्ट्र में दलितों की संख्या राजनीतिक ,सामाजिक गतिविधियों के मामले में काफी मायने रखती है। नागपुर में दलितों के संघर्ष से लेकर बुनकरों का संघर्ष स्वतंत्रता के बाद से ही शुरु हुआ,लेकिन संघ साथ नहीं खड़ा हुआ।
यहां बुनकरों के संघर्ष का प्रतीक गोलीबार चौक भी है, जहां पुलिस की गोली से बुनकर मारे गए थे। अंगरेजों ने सबसे बड़ी कपास मिल स्थापित की थी। संघ की ट्रेड यूनियन भारतीय मजदूर संघ यानी बी.एम.एस ने कॉटन मिल में ही अपनी यूनियन बनायी थी। 90 के दशक में मिल बंद होने को आयी तो बीएमएस मजदूरों के हक की लड़ाई से किनारा करते नजर आया। संघ उन लोगों से भी पहले अधिक मधुरता नहीं बना पाया, जिन्हें उसका समविचारी समझा जाता था। आज भले ही संघ राजनीतिक तौर पर सक्रिय है व बदलाव को स्वीकार कर रहा है। पर हिंदू महासभा के राजनीतिक स्वरुप को संघ झटकती रही। पहली बार जब सावरकर नागपुर पहुंचे तो उन्होंने कॉटन मार्केट की एक सभा में संघ के तौर तरीकों को किसी मंदिर के पूजा पाठ सरीखा माना था। संघ की राजनीतिक समझ पर सवाल उठाए थे। सावरकर संघ मुख्यालय भी नहीं गए।
सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत भारतीय मुस्लिमों को हिंदुत्व का ही हिस्सा मानते हैं। लेकिन 7 दिसंबर 1992 को मुस्लिमों के प्रति संघ की जो समझ उभरी वह अब भी कायम है। 6 दिसंबर को बालासाहब देवरस के नजर कैद होने के बाद मोमिनपुरा में हिंसा हुई। रैलियों की शक्ल में सड़क पर आए लोगों पर पुलिस ने गोलीबारी की। 9 युवा समेत 13 लोग मारे गए। तब कहा गया कि मुस्लिमों की रैली व अन्यों की रैली के साथ पुलिस भी दोयम दर्जे का व्यवहार करती है। नागपुर में अन्य संगठन की भी रैली निकली थी। उसे बर्दाश्त कर लिया गया। गोलीबारी के बाद तत्कालीन पुलिस आयुक्त अरविंद इनामदार का तबादला किया गया। लेकिन युति सरकार ने उन्हें पदोन्नति भी दी। अयोध्या प्रकरण के पहले संघ की पहचान स्वयंसेवी संस्था की तरह ही थी। लेकिन बाद में वह राजनीतिक सत्ता की सीढिय़ों पर चढ़ता नजर आया।
एक दशक में
नागपुर में भले की संघ समाज में पूरी तरह से घुल मिल नहीं पाया पर संघ पर नागपुर का प्रभाव बढ़ता गया। राजग सरकार तक स्थिति थोड़ी अलग थी। लालकृष्ण आडवाणी का मतलब भाजपा के रुप में प्रचारित किया जाता था। सबकुछ दिल्ली में तय होता था। नागपुर से जुड़े डॉ.मोहन भागवत के तेवर ने संघ व भाजपा में हलचल मचा दी। आडवाणी ने पाकिस्तान में जिन्ना का गुणगान क्या किया भागवत तीखेे बोलने लगे। वे सरसंघचालक पद पर नहीं थे। संघ व भाजपा में तालमेल की बात पर यह भी कहा जा रहा था कि भागवत को संयम में रहना चाहिए। लेकिन नागपुर में एकाएक परिवर्तन हुआ। के.एस सुदर्शन ने सरसंघचालक की कुर्सी पर अपनी जगह डॉ.भागवत को बिठा दिया। उनका कहना था- पिता की चप्पल पुत्र के पैर में आने लगे तो पिता को समझ लेना चाहिए कि परिवार में मुखिया बदलने का समय आ गया है। युवाओं को प्रोत्साहन देना आवश्यक है। उम्र भले ही 60 तक पहुंच रही है पर भागवत युवा हैं। युवा को नेतृत्व देने की बात वहीं नहीं थमी। भाजपा को युवा नेतृत्व देने की सुगबुगाहट ने सबका ध्यान नागपुर की ओर खींच लिया।  2009 में भाजपा महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव की हार का चिंतन भी नहीं कर पायी थी। महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष नितीन गडकरी को देश स्तर पर भाजपा की कमान सौंपी गई। केंद्रीय स्तर पर पारिवारिक कसमसाहटों के बाद भी संघ व भाजपा का नियंत्रण केंद्र नागपुर हो गया। यह बात अलग है कि अपनों में गिने जानेवाले ही अधिक आंख दिखाते रहे।
   





बंजर का खंजर

देश की मिट्टी में क्षारीय तत्व तेजी से बढ़ रहा है और बंजर जमीनों का दायरा भी बड़ा हो रहा है।   परिणाम यह हो रहा है कि देश की 45 फीसदी जमीन अनुत्पादक और अनुपजाऊ हो गयी है।  वनों का विनाश हो रहा है, खदान और पानी का अनियमित दोहन किया जा रहा है तथा गलत तरीके के खेती की पद्धतियों का इस्तेमाल किया जा रहा है उससे जमीन को सबसे अधिक नुकसान पहुंच रहा है। अगर थोड़ी सावधानी बरती जाए और कुछ प्रयास किया जाए तो खराब हो चुकी 14.7 करोड़ हेक्टेयर जमीन को दोबारा ठीक करके मिट्टी की गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है।
एक सर्वे के अनुसार, देश के 11 करोड़ लोग धूल और धुएं के शिकार हैं तथा इन शहरों में प्रदूषण के कारण 15,000 करोड़ सालाना का जीडीपी में नुकसान हो रहा है। शहरों में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण तेजी से बढ़ रही गाडिय़ों की संख्या है, उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है सार्वजनिक परिवहन को पूरी मजबूती के साथ चुस्त दुरुस्त किया जाए।
तेजी से बढ़ता शहरीकरण भी पर्यावरण के सामने गंभीर चुनौती पैदा कर रहा है जिस तरह से गावों को अनुत्पादक बनाया जा रहा है उसके कारण गांवों से तेजी से शहरों की तरफ पलायन हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार शहरों में रहनेवाली कुल आबादी का 20 से 40 प्रतिशत झुग्गियों में रह रहा है।  शहरों में मूलभूत सुविधाएं बढ़ाने के नाम पर केन्द्र सरकार द्वारा जो पैसा खर्च किया जा रहा है उसका अधिकांश हिस्सा महानगरों में खर्च हो रहा है जबकि असल समस्या उन 4,000 छोटे शहरों में पैदा हो रही है जहां तेजी से पलायन करके लोग पहुंच रहे हैं। साफ है कि देश के विकास के माडल पर दोबारा सोचने की जरूरत है। लेकिन दिक्कत यह है कि सरकार विकास के नाम पर खुद देश के पर्यावरण और लोगों के जीवन पर संकट पैदा कर रही है। केवल रिपोर्ट जारी करते रहने से कुछ हासिल नहीं होगा, जरूरत इस बात की है कि सरकार पूरी औद्योगिक नीति में बदलाव लाये ताकि बदलते पर्यावरण में धरती और लोग दोनों को बचाया जा सके।
आजकल के उद्योगों से तरह-तरह के विषैले रासायनिक उत्सर्जन होते हैं जो कैंसर आदि भयंकर बीमारियाँ ला सकते हैं। विदेशों में उद्योगों के उत्सर्जन पर कड़ा नियंत्रण होने से बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने पुराने और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों को भारत जैसे विकासशील देशों में ले आई हैं। इन विकासशील देशों में प्रदूषण नियंत्रण कानून उतने सख्त नहीं होते या उतनी सख्ती से लागू नहीं किए जाते। इन कारखानों में सुरक्षा की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इनमें कम उन्नत प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल किया जाता है जो सस्ते तो होते हैं, परंतु संसाधन बहुत खाते हैं और प्रदूषण भी बहुत करते हैं। इन कारखानों की मशीनरी पुरानी होने, सुरक्षा की ओर ध्यान न दिए जाने या लापरवाही के कारण कई बार भयंकर दुर्घटनाएँ होती हैं जिसके दौरान भारी परिमाण में विषैले पदार्थ हवा में घुल जाते हैं। इस तरह की घटनाओं का सबसे अधिक ज्वलंत उदाहरण भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक कारखाने में हुआ विस्फोट है। इस दुर्घटना में एमआईसी नामक अत्यंत घातक गैस कारखाने से छूटी थी और हजारों लोगों को मौत की नींद सुला गई। इस तरह की अनेक दुर्घटनाएँ हमारे देश के औद्योगिक केंद्रों में आए दिन घटती रहती हैं। उनमें मरने वालों की संख्या भोपाल के स्तर तक नहीं पहुंची है लेकिन इससे वे कम घातक नहीं मानी जा सकतीं। मानव स्वास्थ्य को पहुंचे नुकसान के अलावा भी वायु प्रदूषण के अनेक अन्य नकारात्मक पहलू होते हैं। नाइट्रोजन के ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड अम्ल वर्षा को जन्म देते हैं। अम्ल वर्षा मिट्टी, वन, झील-तालाब आदि के जीवतंत्र को नष्ट कर देती है और फसलों, कलाकृतियों (जैसे ताज महल), वनों, इमारतों, पुलों, मशीनों, वाहनों आदि पर बहुत बुरा असर छोड़ती है। वह रबड़ और नायलोन जैसे मजबूत पदार्थों को भी गला देती है। वायु प्रदूषण राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं मानता और एक देश का प्रदूषण दूसरे देश में कहर ढाता है। जब रूस के चेरनोबिल शहर में परमाणु बिजलीघर फटा था, तब उससे निकले रेडियोधर्मी प्रदूषक हवा के साथ बहकर यूरोप के अनेक देशों में फैल गए थे। लंदन के कारखानों का जहरीला धुंआ ब्रिटिश चैनल पार करके यूरोपीय देशों में अपना घातक प्रभाव डालता है। अमेरिका का वायु प्रदूषण कनाडा में विध्वंस लाता है। इस तरह वायु प्रदूषण अंतर्राष्ट्रीय तकरारों को भी जन्म दे सकता है। भारत के दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता आदि बड़े शहरों में वायु प्रदूषण गंभीर रूप ग्रहण करता जा रहा है। नागपुर के राष्ट्रीय पर्यावरणीय अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) के अनुसार इन शहरों में सल्फर डाइऑक्साइड और निलंबित पदार्थों की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित अधिकतम सीमा से कहीं अधिक है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अध्ययनों से भी स्पष्ट हुआ है कि वायु प्रदूषण फसलों को नुकसान पहुँचाकर उनकी उत्पादकता को कम करने लगा है। वायु प्रदूषण ओजोन परत को नष्ट करता है और हरितगृह प्रभाव को बढ़ावा देता है। इससे जो भूमंडलीय पर्यावरणीय समस्याएं सामने आती हैं, उनसे समस्त मानवजाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। हरितगृह प्रभाव वायुमंडल में ऐसी गैसों के जमाव को कहते हैं जो सूर्य की गर्मी को पृथ्वी में आने तो देती हैं, परंतु पृथ्वी की गर्मी को अंतरिक्ष में निकलने नहीं देतीं। इससे पृथ्वी में सूर्य की गर्मी जमा होती जाती है और वायुमंडल गरम होने लगता है। वायु हमारी मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। उसे शुद्ध रखना हमारे कायमी अस्तित्व के लिए परम आवश्यक है।  

दुनिया ने पहचाना



जीवन से ऊब कर जब कोई आत्महत्या के लिए तालाबों की ओर कदम बढ़ता है तो उसे होश नहीं होता, मगर होश में होता एक शख्स। वह उनकी गतिविधियों पर नजर रखता है और उसकी कोशिश उसे बचाने की रहती है। एक नहीं, दो नहीं,.....सैंकड़ों घरों की दुआएं उसके अमन की कामना करती है और उसी का असर है कि गोताखोर जगदीश खरे का नाम आज विश्वपटल पर धमाके के साथ उभर आया है।
उपराजधानी का नाम रोशन
 जगदीश ने अपना नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस में दर्ज कराकर उपराजधानी का नाम रोशन किया है। वर्ष 2013 के 24 वें लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस के विकास सूची में जगदीश खरे का 248 वें नंबर पर नाम अंकित किया गया है। शहर के अंदर व बाहर तालाबों, कुओं व झीलों से शवों को निकालने में जगदीश का नाम पुलिस महकमे में ससम्मान लिया जाता है। उसने शहर के मध्य भाग में स्थित गांधीसागर तालाब से पिछले कुछ वर्षों में 400 से अधिक लोगों की जान बचाई और 1300 शवों को तालाब से खराब हालत में बाहर निकाला। जगदीश के इस काम में उनकी पत्नी जयश्री भी मदद करती है। किसी महिला का शव मिलने पर जयश्री मदद करती है।  गांधीसागर में शव के दिखाई देने पर गणेशपेठ थाने की पुलिस महानगरपालिका के गोताखोर का इंतजार करने के बजाय जगदीश खरे को याद करता है। जगदीश खरे के पास कमाई का दूसरा कोई साधन नहीं है।
कभी मांगता नहीं
शवों को निकालने के बाद पुलिस या मृतक के परिजनों से जो स्वेच्छा से मिल जाता है, वह जगदीश रख लेता है।  कभी  मांगता नहीं है। लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस ने जगदीश के कई प्रसंगों में से एक को प्रमुखता के साथ उकेरा है। वर्ष 2013 के प्रकाशन में लिखा है कि  एक व्यक्ति ने तालाब में छलांग लगाने से पहले सुसाइड नोट में जगदीश का शुक्रिया अदा करते हुए लिखा था कि मुझे पूरी उम्मीद है कि  मौत के बाद मेरा शव जगदीश की मदद से घरवालों तक पुलिस पहुंचा देगी।  इस शख्स ने गांधीसागर से कितने शव निकाले, कितने लोगों की जान बचाई है, इसका बकायदा रिकार्ड नोटबुक में कर रखा है। कोलकाता में टेलीग्राफ की ओर से भी जगदीश का भव्य स्वागत किया जा चुका है।
विडंबनाओं का मारा
जगदीश फिर भी विडंबनाओं का मारा है। इसे अपना नाम छोड़कर कुछ और लिखना नहीं आता। पत्नी 10वीं पास जरूर है। जगदीश के नाम इस कीर्तिमान पर बधाई देने वालों में से कुछ ने चुटकी भी ली कि यार, मरने के बाद भी अगर तेरा हाथ लग गया तो बंदे का नाम रिकार्ड में दर्ज हो जाएगा, क्योंकि हर वर्ष इसका नवीनीकरण भी तो होगा।
मानधन देना बंद किया मनपा ने
नागपुर महानगरपालिका गोताखोर जगदीश खरे को जो मानधन देती थी, उसी पर वह पत्नी जयश्री खरे के साथ जीवन का गुजर बसर करता था। अब उसने भी मानधन देना बंद कर दिया है। जगदीश को फिर भी शिकवा नहीं। कहता है नसीब में होगा, तो मिल ही जाएगा। हां, महंगाई के इस दौर में तकलीफ तो है ही, मगर हाथ फैलाने की आदत जो नहीं। लिम्का बुक का यह कद्र हमारे लिए धरोहर है।
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किसान कर्ज के लिए परेशान

लाइलाज मर्ज ही सही, कर्ज किसानों की जरूरत है। कहीं से भी मिले, खेती-किसानी को छोड़ें कैसे? कहने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने किसानों की सेहत सुधारने के नाम पर ढेरों योजनाओं की घोषणा की है, लेकिन साल-दर-साल गवाह हैं कि ये योजनाएं किसानों के दर्द पर मरहम लगाने में बेअसर साबित हुई हैं। इस वर्ष ने और सितम ढ़ाया है। सहकारी बैंकों ने कर्ज देने से हाथ पीछे खींच लिए हैं। राष्ट्रीयकृत बैंकों की राह आसान नहीं। उनकी बैकिंग प्रणाली इतनी सख्त है कि कम पढ़ा लिखा किसान इनसे कर्ज नहीं ले पाता है। बच जाता है एक ही रास्ता-साहूकारों से कर्ज। आधी रात को भी ये कर्ज दे तो देते हैं, मगर इनके चंगुल में फंसने के बाद बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। जिले के प्राय: गांवों के किसानों की हालत कमोबेश एक जैसी है। धीरे-धीरे कर्ज के बोझ तले दबे किसान लगातार आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाते हैं और तबाह हो जाती है एक गृहस्थी।
अगर पिछले महाराष्ट्र आर्थिक सर्वेक्षण 2011-12 को देखें तो  वर्ष 2011 में साहूकारों की संख्या 9 फीसदी की रफ्तार से बढ़कर 8,326 हो गई जबकि 2010 में राज्य में कुल 7636 निजी साहूकार थे। साल 2011 में सरकार ने 1331 निजी साहूकरों को लाइसेंस जारी किए जबकि 2010 में 1184 साहूकरों को लाइसेंस दिये गए थे। साहूकरों के लाइसेंस के नवीनीकरण में भी सरकार ने तेजी दिखाई है। 2010 में जहां 6452 लाइसेंस का नवीनीकरण किया गया था। वहीं 2011 में 7291 साहूकरों के लाइसेंस का नवीनीकरण करके सरकार ने उन्हे कर्ज देने की छूट दे दी। महाराष्ट्र आर्थिक सर्वेक्षण 2011-12 के अनुसार 2011 में साहूकरों से कर्ज लेने वालों की संख्या में 22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। 2011 में कुल 6,77,165 किसान और छोटे कारोबारियों ने साहूकरों से कर्ज लिया जबकि 2010 में 5,55,018 लोगों ने कर्ज लिया था। बैंकों और सरकारी प्रयास के बावजूद राज्य में निजी साहूकरों की संख्या, इनके कर्जदारों और कर्ज राशि में भी इजाफा हुआ है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट देखें तो 1995 से लेकर अब तक भारत में 270940 किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
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रिश्तों के टीसते दर्द

बालगंगाधर तिलक ने एक बार कहा था कि 'तुम्हें कब क्या करना है यह बताना बुद्धि का काम है, पर कैसे करना है यह अनुभव ही बता सकता है। बुजुर्ग अनुभवों का वही खजाना है। जीवन पथ के कठिन मोड़ पर उसकी उपस्थिति ही उचित दिशा-निर्देश के लिए काफी है। मगर वक्त के बदलते मिजाज ने बुजुर्गों को परिवारों पर बोझ बना दिया है। कानूनी संरक्षण की आवश्यकता तक पडऩे लगी है। कहने को तो सब कुछ इनका ही है, मगर कोई अधिकार नहीं। जीवन संध्या में मुफलिसी व दर्द के सिवाय कुछ भी नहीं बचा है इनके पास।  झुर्रीदार चेहरा, सफेद बाल, दोहरी कमर और चलने की ताकत खो चुके पैर। ये पूरा व्यक्तित्व उस मजलूमियत का है, जो उम्र के आखिरी पड़ाव पर एकदम अकेला पड़ गया है। जुबान पर एक ही गिला- लोगों के पास हमारे लिए अब वक्त नहीं है।  किसी एक उम्रदराज की नहीं, उस पूरी पीढ़ी का दर्द है, जिनका अस्तित्व अपने ही घर में कोने में पड़े कबाड़ से ज्यादा नहीं रह गया है। मोहताज दिल से फिर भी दुआएं निकलती हैं- बेटा, आबाद रहो। मगर इतिहास स्वयं को दोहराता है। आज इनकी बारी, कल...।

उद्यानों में नया चलन
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 शहर के उद्यानों में नया चलन देखने को मिल रहा है, जो विषाक्त है, विडंबनाओं से भरा हुआ है। बुजुर्ग सुबह और शाम घर से बाहर इसलिए घुमने के बहाने निकल जाते हैं, क्योंकि घर में बहुओं और बेटे-बेटियों की जली कटी सुननी पड़ती है। किसी मेहमान के आने पर बैठक कमरे से या तो भीतर जाने के लिए कह दिया जाता है या फिर बेईज्जती सा बर्ताव किया जाता है।  फिर सुबह और शाम का समय बच्चों के स्कूल की व्यस्ततता और या फिर घर में खेलने का होता है। इस दौरान घर के परिवार को लोग बुजुर्गों पर झुंझलाहट निकालते हैं। रोजमर्रा के किटकिट से अजीज होकर बुजुर्ग  बाहर ही रहना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। पार्क, लाइब्रेरी आदि सार्वजनिक स्थलों में सुबह 6 से 10 और शाम 5 से 8 के दरम्यान ये बाहर ही रहते हैं। ये बुजुर्ग ऐसे समय घर लौटना पसंद करते हैं, जब या तो घर से लोग चले गए हों या सोने की तैयारी कर रहे हों। चुपचाप खाना खाकर वे  किसी कोने में पड़ जाते हैं। ये शहर के उस बुजुर्ग वर्ग का  तबका है, जो घर की बदनामी के चलते अपनी परेशानी को किसी से साझा भी नहीं कर सकते।

...आ गए बेटा
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 नागपुर में हुड़केश्वर स्थित  'विजया संस्था में जीवन के अंतिम दिन गुजारते असहाय बुजुर्गों, विकलांगों और असक्षम लोगों की आंखों में झांकने के लिए खूब हिम्मत जुटानी पड़ती है। उनसे मिलने के लिए और उनका ध्यान आकृष्टï करने के लिए उनके अपने ही रिश्तेदार होने का छद्म रुप धारण करना पड़ता है। भले ही अपनों ने उन्हें यहां छोड़ दिया हो, लेकिन अपनों का नाम सुनकर बुझी आंखें रौनक से भर उठती हैं।  'विजया संस्था में एक मरीज पिछले साल भर से रह रही हैं। उनके आगे-पीछे कोई नहीं। संस्था ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर बताया कि इनके पति का स्वर्गवास 5 साल पहले हो चुका है। घर की बिजली इसलिए काट दी गई, क्योंकि वे बिजली का बिल भरने कार्यालय नहीं जा सकती थीं। तकरीबन 4 साल वे बिना बिजली के ही रहीं। आज रोशनी देखकर वे चौंक उठती हैं। कोई मिलने आया है, कहने पर अचरज करती हैं। उनकी कोई संतान नहीं, रिश्तेदारों ने ही उन्हें यहां भर्ती किया है। वे मानसिक रोग की भी शिकार हैं। 3 बेटियों की मां पूर्वा गोरे (परिवर्तित नाम) 63 वर्ष की हैं। हंसमुख हैं, लेकिन डा. रामटेके ने बताया कि ये भी मानसिक रोगी हैं। बहुत ज्यादा याद नहीं रहता। पागलपन का दौरा पडऩे पर वे कपड़े फाडऩे लगती थीं और सड़क पर दौडऩे लगती थीं। उन्हें पलंग से ही बांध कर रखा जाता है। वहीं रितेश (परिवर्तित नाम) केवल 29 साल के हैं लेकिन बेहद कमजोर। पूछताछ में पता चला कि माता-पिता का देहांत हो गया है। बीते मार्च में मां का स्वर्गवास हो गया, जिसके बाद परिजनों ने यहां लाकर छोड़ दिया। परिजनों से मिलने की आस तो रहती है, लेकिन  उनके बीच जाना नहीं चाहता। 'विजया संस्था के संचालक, संस्थापक डा. शशिकांत रामटेके बताते हैं कि यहां अब तक 185 लोगों को आश्रय दिया गया है। सभी मजहब और प्रांत के लोगों के लिए यहां के द्वार खुले हैं। यहां भर्ती होनेवालों की मृत्युपर्यंत सेवा की जाती है। सारी सुविधाएं, सेवाएं और अपनत्व दिया जाता है, जो घर से मिलने की उम्मीद रहती है। डा. रामटेके ने बताया कि ऐसे कई मरीजों की अंत्येष्टिï भी हमने की है, जिनके रिश्तेदार लेने तक नहीं आते। फोन पर संपर्क करने पर बाहर होने या व्यस्त होने की बात कहकर अंत्येष्टि डा. रामटेके को ही कर देने की सलाह देते हैं। बदलते मूल्यों को देख डा. रामटेके काफी दु:खी हैं। डा. शशिकांत रामटेके का कहना है कि यहां भर्ती मरीजों का अपना कोई नहीं। जिस वक्त उन्हें सबसे ज्यादा अपनों के बीच रहने की आवश्यकता होती है, वे उतना ही  अपनों से दूर मौत के इंतजार में दिन काटते हैं। श्री रामटेके  पत्नी, 7वीं कक्षा में पढऩेवाले 11 साल के बेटे, छोटे भाई और एक नौकरानी के परिवारनुमा स्टॉफ से मरीजों की सेवा करते हैं।  डा. रामटेके ने वैसे अपने इस सेवाभाव के पीछे बालपन में घटी घटना को याद किया। बताया कि बीमार था, पड़ोसी ने डाक्टर से दिखाया और एक पैसे की दवा दिलाई। उस घटना के बाद लाचार, बेसहारा लोगों की सेवा में ही जीवन समर्पित करने का लक्ष्य रखा। उन्होंने बताया कि सारा दिन मरीजों की सेवा करते बीत जाता है। बुढ़ापा, मानसिक रोग और अस्वस्थ स्थिति के मरीजों की संपूर्ण साफ-सफाई, खाने-पीने, बर्तन-कपड़े धोने में काफी समय और मेहनत लगती है। हर मरीज को 2 से 15-20 हजार रुपए मासिक खर्च आता है। सरकार से कोई मदद नहीं मिली। बुजुर्गों के लिए 500 रुपए प्रतिमाह देेने की व्यवस्था तो है, लेकिन  'विजया परिवार में सभी उम्र के मरीजों के होने से उनकी स्वयंसेवी संस्था वृद्घाश्रम के तहत पंजीकृत नहीं हो सकी। यह संस्था पिछले 16 सालों से लगातार सेवारत है।
 मजदूरी नहीं यह, जीवन की मजबूरी
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एक सामान्य विद्यार्थी की तरह सुबह- सुबह स्कूल जाना और  वहां से लौटने के बाद शाम तक निर्माणाधीन इमारतों में मजदूरी करना, 18 वर्षीय अविनाश वडककर के जीवन का संघर्ष बयान करता है। वर्धा जिले के आजनसराय गांव में रहने वाले अविनाश के परिवार में उसकी मां और छोटा भाई है। पिता का देहांत करीब एक वर्ष पूर्व हो गया था। मां खेतों में मजदूरी और माली के रूप में काम कर परिवार का पालन पोषण करती थी। अकेले मां की कमाई से घर नहीं चल पाता था, इसलिए अविनाश भी मजदूरी करने लगा। अविनाश के सहपाठी और दोस्त राजेंद्र नखाते की कहानी भी अविनाश की तरह है। राजेंद्र के पिता किसान थे। कर्ज के बोझ से परेशान होकर उन्होंने करीब सात वर्ष पहले आत्महत्या कर ली थी। राजेंद्र की मां भी खेतों में मजदूरी करती है। राजेंद्र भी अविनाश की तरह स्कूल से लौटने के बाद मजदूरी करने जाता है। प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ते हुए काम और पढ़ाई दोनों एक साथ करने वाले इन विद्यार्थियों की जीवन में आगे बढऩे की इक्छा है। राजेंद्र इंजीनियर बनाना चाहता है और अविनाश को नौकरी चाहिए, जिसस वह परिवार का भरण-पोषण कर सके।  कहना और लिखना तो आसान है कि पढ़ाई के साथ साथ अविनाश और राजेंद्र मजदूर के रूप में काम करते हैं, लेकिन शायद उनकी जिंदगी जीना आसान नहीं।
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 'कृतज्ञता की कृतज्ञता
ऐसे ही विद्यार्थियों के संघर्षों को आसान बनाने और उनके सपनों को पूरा करने की कोशिश नागपुर में बूटीबोरी स्थित एक संस्था कर रही।  'रिसर्च एंड डेवलपमेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया नाम की यह संस्था आर्थिक रूप से असक्षम विद्यार्थियों के लिए  'कृतज्ञता नाम से छात्रावास चलाती है और उन्हे व्यावसायिक प्रशिक्षण भी देती है। 'कृतज्ञता में 1500 सौ रुपये मासिक खर्च आता है। इस राशि में रहना, खाना, किताबें सब मुहैया करायी जाती हैं। जिन विद्यार्थियों के पास यह राशि नहीं होती, उन्हें छात्रावास में नि:शुल्क ही रहने दिया जाता है। 'कृतज्ञता में विद्यार्थियों के लिए सत्तर दिन का नि:शुल्क व्यवसायिक प्रशिक्षण का कार्यक्रम चलाया जाता है।  कार्यक्रम के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों से आये अविनाश और राजेंद्र जैसे  विद्यार्थियों को कंप्यूटर से लेकर सब सिखाया जाता है। सत्तर दिवसीय कार्यक्रम के दौरान व्यक्तित्व निखारने की कोशिश की जाती है। 'कृतज्ञता के जरिये इन विद्यार्थियों को नौकरी भी दिलाई जाती है। 5 सितम्बर 1999 में स्थापित इस संस्था का कार्यभार, वीएमवी कॉलेज में केमिस्ट्री विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में पदस्थ डॉ. डी.बी. बनकर के कन्धों पर है। इस कार्य में उनका हाथ बटाते हैं रविन्द्र  सावजी, जो पूर्व में वित विभाग (महाराष्ट्र सरकार) में कोषाधिकारी थे। चंद्रपुर जिले के रहने वाले डॉ. बनकर का जीवन भी काफी संघर्षपूर्ण रहा है। वह बताते हैं कि वह खुद पढ़ाई और मजदूरी साथ-साथ करते थे और आज ऐसे ही विद्यार्थियों के लिए संस्था चलाते हैं। रविन्द्र सावजी ने बताया कि 'कृतज्ञता में महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ आदि प्रदेशों से विद्यार्थी आते हैं। अब तक 'कृतज्ञता से पांच सौ विद्यार्थी निकल चुके हैं और देश विदेश में नौकरी कर रहे हैं। सावजी कहते हैं कि 'कृतज्ञता को चलाने में दो लाख रुपये महीने का खर्च आता है। इस खर्च को वहन करने के लिए देश भर से लोग दान देकर मदद करते हैं।
 किसी ने ठीक ही कहा है-
'फल न देगा न सही, छांव तो देगा।
पेड़ बूढ़ा ही सही, आंगन में रहने दो।
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रविवार, 14 अक्टूबर 2012


  बॉस के लिए कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी...
 पत्रकारिता  का उद्देश्य है आम से खास तक और खास से आम तक यानि जन जन तक सूचना पहुचाना और आवाम की आवाज़ बनना पर शायद इन आवाज़ों में खुद की हीं लड़ाई लड़ने का साहस खत्म सा हो गया है।  इस पेशे में ऐसे कई है जो जी तो रहे है घुट घुट कर पर हिम्मत जुटे तो जुटे कैसे आखिरकार अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता।  आखिर मीडिया में चमचागिरी और चापलूसी नाम की भी कोई चीज़ है जिसे सलाम करने वाले कभी हमारी तरह शोषित नहीं होते। उन्हें तो बस बॉस को पैर छूकर प्रणाम भईया, गुड मॉर्निंग बॉस या फिर केबिन में घुंसकर बटरिंग करने का डोज़ देना होता है जिसके करने मात्र से हीं संस्थान में उनका डंका बजता है। देखा जाए तो ऐसे लोग अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए दलाली तक करने पर अमादा हो जाते है जिसमें वो बॉस के लिए कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी...।  मीडिया संस्थानों को अपने परिश्रम और कार्यकुशलता से चलाने वाले लोंगो के साथ हो रहे शोषण के लिए वो कौन लोग जिम्मेदार हैं इसका पता जरुर लगना चाहिए।  इस विषय पर सभी मीडिया संस्थानों में एक गुप्त जांच पड़ताल टीम भी होनी चाहिए जो चमचागिरी और दलाली जैसी गतिविधियों पर नज़र रख सके ताकि ऑफिस के हित में काम करने वाला कोई भी कर्मचारी खुद को कभी ठगा सा महसूस न करे क्योंकि इनसे गुणवत्ता और काम करने की क्षमता पर असर पड़ता है।



चाटुकारिता की पत्रकारिता 
पत्रकारिता यानि मीडिया यानि लोकतंत्र  का चौथा स्तम्भ पढने में ये शब्द  शायद  भारी भरकम लगे पर आज के समय में ये शब्द उतने ही खोखले हों गए हैI कभी पत्रकारिता को  एक क्रांति के रूप में देखा गया था अब वही  क्रांति धीरे -धीरे बिज़नेस का रूप धारण कर चुकी है और आगे चलकर शायद  ऐसी सब्जी मंडी जहां औने पौने दाम में कुछ भी बेचा जा सकता है I देश में अखबार की शुरुआत के साथ शुरू हुआ बदलाव का दौर, राजा राम मोहन राय जैसे समाज सेवको ने इसे एक क्रांति का रूप दिया I धीरे-धीरे इस क्रांति ने जन व्यापक को अपने साथ जोड़ा और शुरू हुई ऐसी शुरुआत  जो देश आज़ाद होने पर ही रुकी। पत्रकारिता का जो असली उद्देश्य था वो पूरा हो चूका था। वो वह दौर था जहां अखबार में छपी खबर को सूरज पूर्व से निकलता है जितना सच मन जाता था। और अब का पत्रकारिता का दौर ऐसा दौर है जहा सिर्फ चाटुकारिता की पत्रकारिता होने लगी है ! जहां आगे निकलने की होड़ में उजुल-फिजुल छापने की होड़ तो कहीं अपने आप को सबसे तेज और श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए अंधविश्वास और बिना पुष्टि के खबर चलने की होड़। कुछ तो दुनिया खत्म   और भूत प्रेत चलाने से भी पीछे नहीं रहते। पत्रकारिता का असली कर्त्तव्य कहीं विलुप्त सा हो गया है। रही सही कसर कुकुरमुत्ते की तरह उगे टीवी चैनल पूरा कर रहे है। सिर्फ एक या दो टीवी चैनल को छोड़ दें, तो बाकी   मुन्नी बदनाम, या दुनिया खत्म होने को ही अपनी लीड  स्टोरी मानते है। हद तो तब हो गयी जब उपायुक्त के पालतू कुत्ते के खोने की खबर दिन भर चलती रही। ऊपर से पेड न्यूज़ नाम का कैंसर भी मीडिया की विश्वसनीयता  को लगातार  खोखला किये जा रहा है । आने वाले टाइम में भी अगर यही पत्रकारिता का हाल रहा तो आम आदमी का नेताओं की तरह पत्रकारों से भी विश्वास उठ जाएगा।


शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

अखंड एहसानों के इजहार का त्योहार

इसे आप अप्रैल फूल का मज़ाक कतई न समझें। तो ध्यान से सुनिए- यह त्योहार उस महान शैतान के प्रति आदमजात के अखंड एहसानों के इजहार का त्योहार है, जिस दिन उसने स्वर्ग के इकलौते आदमी और औरत को वर्जित सेव खिलाने का धार्मिक कार्य किया था। वह एक अप्रैल का ऐतिहासिक दिन था। जब सेव का मज़ा चखने के जुर्म में इस जोड़े को तड़ीपार के गौरवपूर्ण अपमान से सम्मानित करके ईश्वर ने दुनिया में धकेल दिया था। न शैतान सेव खिलाता न दुनिया बसती। मनुष्य जाति को बेवकूफ बनाने के धारावाहिक सीरियल का ये सबसे पहला एपीसोड था। आज भी धारावाहिकों के जरिए आदमी को बेवकूफ बनाने का ललित लाघव पूरी शान से जारी है। सारी दुनिया उस शैतान की एहसानमंद है जिसके एक ज़रा से मजाक ने सदियों से वीरान पड़ी दुनिया बसा दी। ज़रा सोचिए अगर ये दुनिया नहीं बसती तो आज के प्रॉपर्टी डीलरों की मौलिक प्रजाति तो अप्रकाशित ही रह जाती। इसीलिए शैतान और शैतानी को जितने पवित्र मन से यह लोग सम्मानित करते हैं, दुनिया में और कोई नहीं करता। ये दुनिया एक शैतान की शैतानी का दिलचस्प कारनामा है। जहां चोर है, सिपाही है। मुहब्बत है, लड़ाई है। बजट है, मंहगाई है। इश्क है, रुसवाई है। नेता है, झंडे हैं। मंदिर हैं, पंडे हैं। तिजोरी है, माल है। ये सब अप्रैल फूल का कमाल है। दुनिया वो भी इतनी हसीन और नमकीन कि देवता भी स्वर्ग से एलटीए लेकर धरती पर पिकनिक मनाने की जुगत भिड़ाते हैं। और अपनी लीलाओं से मानवों को अप्रैल फूल बनाते हैं, कभी-कभी खु़द भी बन जाते हैं। विद्वानों का तो यहां तक मानना है कि देवता इस धरती पर आते ही लोगों को अप्रैल फूल बनाने के लिए हैं, क्योंकि स्वर्ग में इसका दस्तूर है ही नहीं। यह तो पृथ्वीवासियों की ही सांस्कृतिक लग्जरी है। जो शैतान के सेव की सेवा से आदम जात को हासिल हुई है। देवता इसे मनाने के लिए अलग-अलग डिजायन के बहुरूपिया रूप धरते हैं। वामन का रूप धर के तीन पगों में तीन लोकों को नापकर राजा बली को बली का बकरा मिस्टर विष्णु ने पहली अप्रैल को ही बनाया था। अप्रैल फूल बनाने का चस्का फिर तो इन महाशयजी को ऐसा लगा कि अगले साल मोहनीरूप धर के भस्मासुर नाम के किसी शरीफ माफिया का बैंड बजा आए। तो किसी साल शेर और आदमी का टू-इन-वन मेकअप करके हरिण्यकश्यपु नामक अभूतपूर्व डॉन को भूतपूर्व बना आए। अप्रैल फूल की विष्णुजी की इस सनसनाती मस्ती को देखकर अपने जी स्पेक्ट्रमवाले राजा नहीं, सचमुच के स्वर्ग के, सच्चीमुच्ची के राजा इंद्र का भी मन ललचा उठा। इंद्रासन छोड़कर, सारे बंधन तोड़कर पहुंच गए मुर्गा बनकर गौतम ऋषि के आश्रम पर। ऐसी कुंकड़ूं-कूं करी कि भरी रात में ही अपने अंडर गारमेंट्स लिए बाबा गौतम पहुंच गए नदी पर नहाने। वहां आदमी-ना-आदमी की जात। समझ गए कि किसी ने अप्रैल फूल बना दिया है। मुंह फुलाए घर पहुंचे तो अपने डमी-डुप्लीकेट को बेडरूम से खिसकते पाया। अप्रैल फूल बनने की खुंदक शाप देकर वाइफ पर उतारी। शिला बन गई बेचारी। जब दैत्यों को भनक लगी कि स्वर्ग से आकर देवता अप्रैल फूल- अप्रैल फूल खेल रहे हैं तो उन्होंने भी देवताओं को अप्रैल फूल बनाने की ठान ली। सोने का हिरण बनकर, अपने पीछे दौड़ाकर जहां मारीचि ने श्रीयुत रामचंद्र रघुवंशीजी को अप्रैल फूल बना दिया, वहीं रावण ने साधु का वेश धारण कर सीताजी को लक्ष्मण-रेखा लंघवाकर हस्बैंड-वाइफ दोनों को अप्रैल फूल बना डाला। ये त्योहार है ही ऐसा। देवता और दैत्य सब एक-दूसरे से मज़ाक कर लेते हैं। फर्श ऐसा लगे जैसे पानी का सरोवर। महाभारत काल में ऐसे ही स्पेशल डिजायन के महल में दुर्योधन को बुलाकर द्रौपदी ने उसे अप्रैल फूल बनाया था। मगर दुर्योधन हाई-ब्ल्ड-प्रेशर का मरीज था। मज़ाक में भी खुंदक खा गया। और उसने अगले साल चीर हरण के सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिए द्रौपदी को अप्रैल फूल बनाने की रोमांचक प्रतिज्ञा कर डाली। मगर द्रौपदी के बाल सखा मथुरावासी श्रीकृष्ण यादवजी को भनक लग गई। ऐन टाइम पर साड़ी का ओवर टाइम उत्पादन कर के उन्होंने कौरवों की पूरी फेमिली को ही अप्रैल फूल बना दिया। मज़ाक को मजाक की तरह ही लेना चाहिए। अब हमारे नेताओं को ही लीजिए। पूरे पांच साल तक जनता को अप्रैल फूल बनाते हैं। कभी मूड में आकर कहते हैं कि हम भ्रष्टाचार मिटा देंगे। जनता तारीफ करती है। कि नेताजी का क्या गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर है। फिर नेताजी भ्रष्टाचार, घोटाले में फंस जाते हैं। जनता हंसती है- अब नेताजी कुछ दिन सीबीआई-सीबीआई खेलेंगे। हाईकमान ने तो क्लीनचिट देने के बाद ही घोटाला करवाया है, नेताजी से। सब अप्रैल फूल का मामला है। इसका अंदाज ही निराला है। पूरा जी स्पैक्ट्रमवाला है। कसम, कॉमनवेल्थ गेम की। हम सब भारतवासी खेल के नाम पर भी खेल कर जाने वाले खिलाड़ियों के खेल को भी खेल भावना से ही लेते हैं। अप्रैल फूल त्योहार की अपनी अलग कूटभाषा है। जिसने बना दिया वो सिकंदर जो बन गया वो तमाशा है। अप्रैल फूल, मूर्ख बनाने का मुबारक जलसा, जो भारत से ही दुनिया के दूसरे देशों में एक्सपोर्ट हुआ है। हमारे आगे टिकने की किसमें दम है। न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में दोपहर के १२ बजे तक ही अप्रैल फूल का मजाक चलता है। फ्रांस, अमेरिका, आयरलैंड, इटली, दक्षिण कोरिया, जापान, रूस, कनाडा और जर्मनी में यह पूरे दिन चलता है। मगर हमारे देश में यह मज़ाक जीवन पर्यंत चलता है। अप्रैल फूल के मजाक को याद करके हम भारतवासी मरणोपरांत भी हंसते रहते हैं। और जबतक ज़िंदा रहते हैं नमक और मिर्च को बांहों में बांहें डाले अपने ही जख्म के रेंप पर डांस करता देखकर बिलबिलाकर उनके साथ भरतनाट्यम करते हुए अप्रैल फूल –जैसे प्राचीन पर्व की आन-बान-शान को हम ही बरकरार रखते हैं। अप्रैल फूल त्योहार का कच्चा माल हम भारतीय ही हैं। अप्रैल फूल मनाने का ग्लोबल कॉपीराइट भारतीयों के ही पास है। क्योंकि सबसे पहले अप्रैल फूल बननेवाले इस दुनिया में ही नहीं जन्नत में भी हम भारतीय ही थे। शैतान के सेव के सनातन सेवक। वसुधैव कुटुंबकम.. सारी दुनिया हमारी ही फेमली है। और अप्रैल फूल हमारा ही फेमिली फेस्टिवल है।

शनिवार, 26 मार्च 2011

अलग-अलग तराजू क्यों

आजकल पूरा देश बेहिसाब भ्रष्टाचार से रूबरू है। सीजन की शुरुआत कॉमनवेल्थ गेम्स से हुई। इसके बाद 2 जी स्पेक्ट्रम, कर्नाटक का नाटक, आदर्श सोसायटी विवाद और अब एकदम ताजा विवाद चीफ विजिलेंस कमिश्नर थॉमस की नियुक्ति का है। अगर इन मुद्दों को एक साथ देखा जाए, तो साफ दिखता है कि समाज के हर वर्ग के लोग-राजनेता, ब्यूरोक्रेट्स, न्यूज मीडिया, जुडिशरी और उद्योगपति कमजोरियों से ग्रस्त हैं। टीका-टिप्पणी, आलोचना और बहसबाजी से पहले यह तय कर लिया जाए कि हम इस दौरान पक्षपात नहीं करेंगे। देखा यह जाता है कि हम अलग-अलग प्रफेशन के लोगों के लिए अलग-अलग नैतिक मूल्य निर्धारित करते हैं और उन्हें उसी हिसाब से अलग-अलग तराजू में तौलते हैं। हमारे तंत्र में पारदर्शिता लाने की राह में न केवल यह सबसे बड़ा रोड़ा है बल्कि हमारे लोकतंत्र के भविष्य के लिए भी यह बेहद खतरनाक है। पीजे थॉमस की नियुक्ति पर विवाद के विश्लेषण के समय एक अघोषित नियम जो देखा गया, वह था 'तब तक दोषी जब तक कि निर्दोष सिद्ध न हो।' इसी तरह सुरेश कलमाड़ी को भी लगातार राष्ट्रीय न्यूज चैनलों पर 'स्कैमस्टर' कहा जाता रहा, वह भी तब जबकि उन पर आरोप साबित नहीं हुए थे। सामाजिक जीवन में होने के नाते मैं यह मानता हूं कि दूसरों के मुकाबले हमारे प्रफेशन के लोगों से हाई मोरल वैल्यू की अपेक्षा की जाती है। दुनिया भर में यही होता है। लेकिन, जब 2 जी स्कैम में सरकारी खजाने को लाखों करोड़ों का चूना लगाने वाले बड़े बिजनेस हाउसों की जांच हो रही है, तो उन्हीं न्यूज चैनलों ने नैतिकता के दूसरे मानदंड अपनाए - 'तब तक निर्दोष जब तक कि दोष साबित न हो।' 2 जी के परिप्रेक्ष्य में देखें तो एक लॉबिस्ट की टेलिफोनिक बातचीत के सरकारी रेकॉर्ड के जाहिर होने से पता चला कि अनेक जर्नलिस्ट और संपादक उद्योगपति और राजनेताओं की तरह ही हैं। इससे ऐसे व्यवसाय की क्रेडिबिलिटी कम हुई जिससे निष्पक्ष होकर काम करने की अपेक्षा की जाती है। इस मुद्दे को उठाकर इसे एक सही नतीजे तक लाना मीडिया की जिम्मेदारी थी, लेकिन उन चैनलों ने मुद्दे को हलका बना दिया और धीरे-धीरे यह आम जनता के जेहन से उतर गया। हाल में दुनिया के अग्रणी बिजनेस कंसल्टेंट और मैकिंजे एंड मैकिंजे के पूर्व प्रमुख रजत गुप्ता को इनसाइडर ट्रेडिंग का आरोपी पाया गया। इस मुद्दे पर कॉरपोरेट जगत ने गुप्ता को नैतिक मूल्यों के अलग तराजू में तौलकर उनका बचाव किया और उन्हें निर्दोष घोषित किया जबकि जांच अभी जारी है। 2 जी स्कैम में फंसे कुछ उद्योगपतियों के मामले में भी कॉरपोरेट जगत का रवैया कुछ ऐसा था - ' सीबीआई जांच से भारत का व्यावसायिक वातावरण खराब हो रहा है। ' मैं जनता का पैसा हड़पने वाले किसी राजनेता या बाबू का बचाव नहीं कर रहा , लेकिन मुझे शिकायत है कि प्राइवेट सेक्टर और मीडिया ( जो कि स्वयं प्राइवेट सेक्टर का हिस्सा है ) भ्रष्टाचार के विश्लेषण के लिए अलग - अलग मानदंड रखता है। एक देश होने के नाते , अगर हम भ्रष्टाचार से लड़ने और इसका खात्मा करने के प्रति वास्तव में गंभीर हैं तो हमें अपने आप से यह वादा करना होगा कि हम अपनी आलोचना , जांच और अंतत : सजा में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करेंगे। कंगारू कोर्ट और ' बनाना रिपब्लिक ' जैसे जुमले असफल संस्थानों ( कई बार देशों के लिए भी ) के लिए प्रयोग किए जाते रहे हैं , जहां के कानून और नियम वहां के ताकतवर लोग अपने हिसाब से तय करते हैं। लेकिन हम उनसे अलग हैं। हममें से हर एक के पास वह ताकत है जो रोजमर्रा की जिंदगी में घुस आए भ्रष्टाचार से लड़ सके। घूस देना या ' चलता है ' का भाव रखना एक देश की सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन करना है। भारत को हमेशा सिद्धांतों और न्याय का देश माना जाता रहा है। यह हमारे हित में है कि हम देश की जड़ों में बसे इन मूल्यों का ह्रास न होने दें।

काफिला कहा लुटा"...

आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ. सुषमा जी ने प्रधानमंत्री की तरफ निशाना साधते हुए मन को मोहने वाले मनमोहन सिंह से कुछ शायराना अंदाज़ में मुखातिब हुईं....और .और एक सवालिया शेर मनमोहन की तरफ उछल दिया. मजमून कुछ इस तरह का था "तू इधर-उधर की ना बात कर, बता की काफिला कहा लुटा"...और बहस का सिलसिला आगे बढ़ चला...एक-एक वक्‍तव्‍यों पर हमारे टीवी चैनल ब्रेकिंग न्यूज़ की बड़ी बड़ी प्लेट चला रहे थे. हर वक्‍तव्‍य पर मीडिया कुछ इस तरह रियेक्‍ट कर रही थी जैसे आरोप-प्रत्यारोप के बदले संसद में मिसाइल चल रहे हों.
खैर, ये तो मीडिया वालों की मजबूरी है. टीआरपी लानी है, चैनल के मालिक को दिखाना है की जी हम नंबर 1 हैं. खैर बहस का सिलसिला आगे बढ़ता गया और बारी आई देश के सबसे भोले भाले सरदार की, जिन्हें कुछ पता नहीं होता. आज वो भी कुछ रंग में थे. मिजाज़ उनका भी शायराना था. सुषमा जी तरफ मुखातिब होते हुए उन्होंने ने भी कुछ इस तरह एक शेर दगा... माना की तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं....पर तू मेरा शौख देख, मेरा इंतज़ार तो कर... इकबाल की लिखी ये पंक्तियां शायद मनमोहन जी को किसी ने लिख कर दिया होगा. खूब तालियाँ बजी. हर खबरिया चैनल में जैसे भूचाल आ गया. भागम दौड़ मच गई, संपादक से ले कर ट्रेनी तक सरदार की पढ़ी इस शेर पर अपने विचार और उदगार व्यक्त करने लगे.
देश की भोली भाली जनता को इस शेर के मायने समझाने लगे. भोली-भली जनता टीवी से नज़र गड़ाए टीवी पर ज्ञान बांटते तथाकथित पत्रकारों के ज्ञान सुनती रही और टीवी वालों को टीआरपी मिलती रही. पूरे दिन हंगामा चलता रहा पर किसी भी देशभक्त चैनल को ये याद नहीं आया कि आज शहीद दिवस है और आज के ही दिन आज़ादी के दीवाने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने देश पर अपनी जान कुर्बान कर दी थी, लेकिन आज उसी देश में अपने को पत्रकार और विद्वान कहलाने वाले बेशर्मी की हदें पार कर रहे थे. जहां बेहूदे शेरो-शायरी के लिए उनके पास वक़्त ही वक़्त था, वहीं आज़ादी के दीवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए उन के पास चंद लम्हें भी नहीं थे. शर्म आती है इस देश के नेताओं और चमचे पत्रकारों पर

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

धृतराष्ट्र अभी जिंदा हैं

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज दुहाई देते फिर रहे हैं कि भ्रष्टाचार के कारण भारत की छवि को नुकसान पहुंचा है। मगर, राजा पर आरोपों की बौछारें होती रहीं और बिना रीढ़ के समझे जाने वाले देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह इतना साहस नहीं जुटा सके कि वे राजा से तत्काल त्यागपत्र मांगकर उन्हें सीखचों के पीछे भेज सकें। यक्ष प्रश्न तो यह है कि अगर एक सौ छियत्तर लाख करोड़ रूपए का नंगा नाच नाचा गया तो वह पैसा गया कहां? राडिया मामले में अनेक मंत्रियों की गर्दन नपना अभी बाकी है। यही आलम कामन वेल्थ गेम्स का रहा। प्रधानमंत्री डॉ. सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की आंखों के सामने जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को हवा में उड़ा दिया गया, और ये दोनों चुपचाप ही बैठकर जनता के पैसे पर डलते डाके को देखते रहे। अनेक आरोप तो सोनिया गांधी के इटली वाले परिवार पर भी लगे हैं। राजा की गिरफ्तारी भारतीय लोकतंत्र के नस - नस में समाये भ्रष्टाचार की अमर बेल को को उखाड़ फेंकने का काम नहीं कर सकती, इस पूरे मामले में ईमानदार कार्रवाई तभी मानी जाएगी, जब उनको भी सजा मिले जिन्होंने इस महाघोटाले को अंजाम देने के लिए राजा की ताजपोशी का मार्ग प्रशस्त किया था। इस पूरे घोटाले ने एक बात और साबित कर ही दी है कि देश में बिना मीडिया के सहयोग के किसी भी बड़े घोटाले को सरंजाम दिया जाना संभव नहीं है, ये बात दीगर है कि बेहद कमजोर आत्मबल वाली सरकार और पैसा कमाने के लिए नंगई पर उतर चुके कार्पोरेट अखबारों और चैनलों के लिए मीडिया के इन चौधरियों के खिलाफ हल्ला बोलना बेहद कठिन है। पर क्या आगे यह संभव है? शायद हां।
नौकरशाहों ने पल्ला झाड़ा ---------
22, 000 हजार करोड़ का अनुमानित घाटा नौकरशाह अपना पिंड छुड़ाने में लग गए हैं। पूर्व टेलीकॉम सचिव सिद्धार्थ बेहुरा ने खुलासा किया कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में मंत्री के आदेश का पालन किया गया। बेहुरा ने बताया है कि वे लोग पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए. राजा के आदेश का पालन करते थे। दूसरी तरफ ए. राजा के वकील ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनके मुताबिक राजा और उनके दो सहयोगी ही नहीं बल्कि कई अन्य भी इस घोटाले में शामिल हैं। इस बीच, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के विशेष न्यायाधीश ओ.पी. सैनी ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ अभियोग है कि उन्होंने स्पेक्ट्रम लाइसेंस जारी करने के दौरान नियमों और प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया, जिसकी वजह से सरकार को 22 हजार करोड़ रूपये का अनुमानित घाटा हुआ। उन्होंने कहा कि तीनों आरोपियों के खिलाफ गंभीर मामले हैं। जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने 2जी आवंटन मसले पर याचिका दाखिल कर राजा को आरोपी बनाया था जिसे अब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला कहा जाता है। इस मसले पर सर्वोच्च न्यायालय में अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी। सर्वोच्च न्यायालय स्वयं इस मामले की जांच की निगरानी कर रहा है, जिसकी जांच कई एजेंसियां कर रही हैं. इस मामले में न्यायालय ने सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय से 10 फरवरी तक अपनी रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। हो न जाए कहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत में भी बगावत - अस्सी के दशक के उपरांत भारत गणराज्य में भ्रष्टाचार की जड़ें तेजी से पनपना आरंभ हुईं थीं। तीस सालों में भ्रष्टाचार का यह बट वृक्ष इतना घना हो चुका है कि इसकी छांव में नौकरशाह, जनसेवक और मीडिया के सरपरस्त सुकून की सांसे ले रहे हैं, किन्तु आम जनता की सांसे इस पेड़ के नीचे सूरज की रोशनी न पहुंच पाने के कारण मचे दलदल में अवरूद्ध हुए बिना नहीं हैं। भारत गणराज्य के अब तक के सबसे बड़े घोटाले अर्थात 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मुख्य आरोपी अदिमुत्थू राजा को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने तेरह महीने की लंबी मशक्कत और खोज के बाद गिरफ्तार कर लिया। राजा के खिलाफ सीबीआई ने 21अक्टूबर 2009 को 2जी मामले में जांच के लिए मामला दर्ज किया था। इसके बाद सहयोगी दलों के दबाव के चलते कांग्रेस नीत केंद्र सरकार ने इस मामले की फाईल को लटका कर रखा। विपक्ष ने जब संसद नहीं चलने दी तब कांग्रेस को होश आया और बजट सत्र में फजीहत से बचने के लिए सरकार ने सीबीआई को इशारा किया और तब जाकर कहीं राजा को सीखचों के पीछे ले जाया जा सका। तब से अब तक -टेलीकाम सहित सारे के सारे घपले घोटालों को इतिहास की पाठ्यपुस्तक के अध्याय के तौर पर ही समझा जाए। द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) कोटे के मंत्री दयानिधि मारन के त्यागपत्र के उपरांत 16 मई 2007 आदिमत्थू राजा को वन एवं पर्यावरण से हटाकर संचार मंत्री बना दिया गया। 25 अक्टूबर 2007 को केंद्र ने मोबाईल सेवाओं के लिए 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया। इसके उपरांत 15 नवंबर 2008 को तत्कालीन केंद्रीय सतर्कता आयुक्त प्रत्युष सिन्हा ने अपनी आरंभिक रिपोर्ट में इसमें अनेक खामियों का हवाला देतेह हुए दूरसंचार अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने की अनुशंसा की थी। जब घोटाला हुआ तब केंद्र की सरकार चिर निंद्रा में लीन थी। इसके बाद बरास्ता नीरा राडिया यह घोटाला प्रकाश में आया। 21 अक्टूबर 2009 को सीबीआई ने टूजी स्पेक्ट्रम मामले में जांच के लिए मामला दर्ज कर लिया। इसके अगले ही दिन 22 अक्टूबर को सीबीआई ने दूरसंचार महकमे के कार्यालयों पर छापामारी की। इसके एक साल बाद 17 अक्टूबर 2010 को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने दूरसंचार विभाग को अनेक नीतियों के उल्लंघन का दोषी पाया। नवंबर 2010 में विपक्ष ने एकजुट होकर दूरसंचार मंत्री ए.राजा को हटाने की मांग कर डाली। चारों ओर से दबाव में आई केंद्र सरकार को मजबूरन 14 नवंबर को राजा का त्यागपत्र मांगना ही पड़ा। 15 नवंबर को संचार मंत्रालय का कार्यभार कपिल सिब्बल को सौंप दिया गया। मुंह क्यों नहीं छिपाते - जब कामन वेल्थ गेम्स आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी पर आरोप लगे तो उन्होंने सरकार को हड़काया कि हमाम में वे अकेले नंगे नहीं हैं। फिर क्या था, कलमाड़ी पर शिकंजा ढीला कर दिया गया। आदर्श हाउसिंग सोसायटी में नाम आने के बाद भी विलासराव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे को सोनिया गांधी ने ए रैंक दिया है, जो आश्चर्यजनक है। सरकार में मंत्रियों के बड़बोलेपन का आलम यह रहा कि संचार मंत्रालय का भार संभालते ही मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने तो सरकार के अब तक निष्पक्ष रहे आडीटर कैग की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा डाले। देशवासी सकते में थे, कि आखिर हो क्या रहा है? क्या सरकारी तंत्र में खोट है या सरकार चलाने वाले नुमाईंदों की नजरों में? अंतत: राजा की गिरफ्तारी ने दूध का दूध पानी का पानी कर दिया। अब सिब्बल मुंह छुपाते घूम रहे हैं।अब जबकि राजा सीखचों के पीछे हैं तब केंद्र सरकार के नुमाईंदों पर जनता के धन के अपराधिक दुरूपयोग का मामला चलना चाहिए, क्योंकि सरकार के अडियल रवैए के चलते ही संसद का शीतकालीन सत्र बह गया और देश के गरीबों के खून पसीने के लाखों करोड़ों रूपए उसमें डूब गए। सरकार के नुमाईंदों का तो शायद कुछ न गया हो, उनकी जेबें पहले से अधिक भारी हो गई हों, पर इसका सीधा सीधा बोझ तो आम जनता पर ही पडऩे वाला है। शर्म मगर आती नहीं - इसके पहले आजाद भारत में अनेक मंत्रियों को सीखचों के पीछे भेजा जा चुका है। 1991 से 1996 तक संचार मंत्री रहे सुखराम इसकी जद में आ चुके हैं। पूर्व में 16 अगस्त 1996 में तत्कालीन केंद्रीय संचार मंत्री सुखराम के दिल्ली स्थित आवास पर सीबीआई ने छापा मारकर उनके पास से पौने तीन करोड़ रूपए नकद बरामद किए थे। इनके हिमाचल स्थित आवास से सवा करोड़ रूपए भी मिले थे। इन्हें 18 सितम्बर 1996 को गिरफ्तार किया गया था। तांसी जमीन घोटाले में तमिलनाडू की मुख्यमंत्री रह चुकी जयललिता को अक्टूबर 2000 में चेन्नई की एक अदालत ने सजा सुनाई थी। इसके अलावा अरूणाचल प्रदेश के सीएम रहे गेगांप अपांग को एक हजार करोड़ रूपए के पीडीएस घोटाले में गिरफ्तार किया गया था। झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा पर चार हजार करोड़ रूपयों के घोटाले का आरोप है। इन्हें सितम्बर 2009 में गिरफ्तार किया गया था, वे आज भी जेल में ही हैं। कोयला मंत्री रहे शिबू सोरेन को अपने ही सचिव के अपहरण और हत्या की साजिश रचने के आरोप में दोषी ठहराया था। सोरेन पर आरोप था कि उन्होंने अपने सचिव शशिनाथ झा के साथ यह सब किया था। अदालत के फैसले के बाद सोरेन को गिरफ्तार कर लिया गया था। बीसवीं सदी में स्वयंभू प्रबंधन गुरू बनकर उभरे लालू प्रसाद यादव ने तो कमाल ही कर दिया था। चारा घोटाले के प्रमुख आरोपी लालू यादव को 30 जुलाई 1997 को 134 दिनों के लिए,28 अक्टूबर 1998 को 73 दिनों के लिए, फिर पांच अप्रैल 2000 को 11 दिनों के लिए जेल भेजा गया था। इन पर आय से अधिक संपत्ति का मामला है। बावजूद इसके ये सारे नेता आज भी अपनी कालर ऊंची करके सरकार में शामिल होने लालायित हैं। कहने को तो देश की जांच एजेंसियां भ्रष्टाचारियों, कालाबाजारियों पर कड़ी कार्रवाई का दिखावा करती हैं। याद नहीं पड़ता कि सुखराम के अलावा किसी अन्य का प्रकरण परवान चढ़ पाया हो। एक दूसरे की पूंछ अपने पैंरों तले दबाकर रखने वाले सियासी दलों के नेताओं द्वारा जनता को इस तरह की कार्रवाईयों के जरिए भरमाया जाता है। केंद्र सरकार इस बात को समझ नहीं पा रही है कि भ्रष्टाचार से आम जनता भरी बैठी है। रियाया चाह रही है कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़े से कड़े कदम उठाए जाएं। अगर केंद्र या राज्यों की सरकारों ने भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाए तो भरी हुई जनता सड़कों पर उतर सकती है, और तब उपजने वाली स्थिति इतनी बेकाबू होगी जिससे निपटना किसी के बूते की बात नहीं होगी। सारी हदें पार करने वाले - अगर गहराई से देखा जाए तो राजा भ्रष्टाचार के इस ब्रेन गेम में सिर्फ और सिर्फ एक मोहरा थे, वो मोहरा जिसने अंधाधुंध पैसे कमाने के लालच में दिमाग का इस्तेमाल करना बंद कर दिया था ,वो मोहरा जिसका इस्तेमाल देश के उद्योगपतियों, मीडिया और कार्पोरेट जगत के दलालों ने अपनी झोली भरने के लिए किया और जब मामले खुला तो पहले गर्दन भी राजा की पकड़ी गयी। मगर बरखा दत्त और बीर संघवी जैसे पत्रकारों एवं टेलीकाम कंपनियों के उन मालिकानों से अभी तक पूछताछ किये जाने को लेकर कोई चर्चा भी नहीं हो रही जिन्होंने राजा को संचार मंत्री बनाने के लिए सारी हदें पार कर दी। अपनी करतूतों को ,अपने काम का हिस्सा बताने वाली बेशर्म बरखा दत्त के लिए राजा की गिरफ्तारी क्या एक सामान्य खबर की तरह ही होगी ?क्या उनकी आँखों में आधी रात के वो मंजर फिर से कौंधे होंगे जब वो नीरा से राजा की ताजपोशी के लिए निश्चिंत रहने की बात कह रही थी। क्या वीर संघवी को अपने लिखे वो शब्द याद आये होंगे जब उन्होंने नीरा से कहा था कि जैसा तुमने कहा मैंने वैसा ही लिखा था न? शायद नहीं। इसकी वजह भी है बरखा दत्त और वीर संघवी समेत इस घोटाले कि प्रस्तावना लिखने वाले मीडिया कर्मी और कार्पोरेट जगत के मठाधीश ये जानते थे कि इस लड़ाई में राजा अकेले भले पड़ जाए लेकिन वो अकेले नहीं पड़ेंगे क्यूंकि उनके पीछे उस बड़े समूह की ताकत जुडी है जो देश में राजनेताओं और राजनैतिक दलों का भविष्य बनाने - बिगाडऩे का मुगालता पाल रखे हैं। राजा मंत्री थे पद के दुरुपयोग का मामला उन पर ठोंक दिया गया ,निस्संदेह कांग्रेस इस एक कदम पर अपना सीना चौड़ा कर के कह सकेगी कि लीजिये हमने अपने ही मंत्री के खिलाफ कार्यवाही कर दिया, लेकिन हमने क्या किया ? चौंका देने वाला गठजोड़ -टेलीकाम घोटाले में मीडिया, महाजनों और माननीयों के गठजोड़ का जो चौंका देने वाला सच सामने आया था उसका आदि और अंत यहीं नहीं होता ,संचार मंत्रालय आज ही नहीं लम्बे समय से आर्थिक अपराध का केंद्र बना रहा है ,लेकिन ऐसे छोटे बड़े घोटालों की फेहरिस्त काफी लम्बी है जो अभी तक सामने नहीं आये हैं और अगर आये भी हैं तो उनमे मीडिया की भूमिका के बारे में सोचा भी नहीं जाता ,लेकिन अब हमें अपनी आँखों पर बंधी पट्टी खोलनी होगी ,मीडिया भी मीडिया के जेरे-गौर होनी चाहिए, राजा की गिरफ्तारी इस बात का प्रतीक है कि चाहते न चाहते हुए भी राजनीति में गलतियों की कोई माफ़ी नहीं होती ,सजा छोटी हो या बड़ी मिलती जरुर है। ठीक यही सिद्धांत पत्रकारिता पर भी लागू होता है ,हम लाख कोशिश करके भी अपने दागदार दामन को साफ नहीं कर सकते। वो बरखा जो एक व्यक्ति द्वारा बरखा दत्त डाट काम नामक वेबसाईट का रजिस्ट्रेशन कराने पर उसे अदालत में खिंच लेती है ,वही बरखा किसी गाँव कस्बे के आम पत्रकार के द्वारा गरियाये जाने पर भी होंठ सिले रखने को मजबूर है, वो वीर संघवी जिन्हें सुनना भी युवाओं के लिए फख्र की बात होती थी उनका जिक्र छिड़ते ही आवाज आती है -मारो दलाल है सा.......। स्पेक्ट्रम घोटालों के आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही देश में भ्रष्टाचार के उन्मूलन की प्रक्रिया का हिस्सा तभी बन सकती है ,जब हम उनको भी कानून के दरवाजे पर ला खड़ा करें जिनकी वजह से राजा जैसा धूर्त सिंहासन पर जा बैठा ,जनता के मन में गुस्सा जितना राजा के खिलाफ है उससे ज्यादा इन कार्पोरेट पत्रकारों के खिलाफ, ये सच हमें जान लेना चाहिए।सबक लोने की जरूरत-इसमें कोई दो राय नहीं कि मनमोहन सिंह के आर्थिक उदारीकरण ने गरीबों की कमर तोड़ दी है। हालात मिस्र से कम नहीं। आम आदमी को दो टाइम खाने के लिए नहीं है। लेकिन 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपये कुछ लोग ही खा गए। शासन को मिस्र के विद्रोह से सबक लेना चाहिए। देश के नेताओं, अधिकारियों को तुरंत जनता के हितों में कदम उठाना चाहिए। महंगाई और बेरोजगारी के कारण अगर भूखमरी बढ़ी तो आने वाले दिनों में भारत में भी वही होगा जो मिस्र और टयूनिशिया में हुआ। लोगों की भूख की चिंता नेताओं को नहीं, राजनीतिक दलों को नहीं। सिर्फ अपनी राजनीति और कुर्सी की चिंता है। तो फिर यह भी स्थिति आएगी कि सिंहासन खाली करो, जनता आती है। महंगाई ने लोगों के हालत खराब कर रखी है। लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। अभी भी सम्हलने का मौका है। दो बड़ी मोबाइल कंपनियों की तबाही तय- महीनों से सुलग रहे 2 जी स्पेक्ट्रम विवाद में आज पहली बार दो कंपनियों के नाम का खुलासा हुआ। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के सरकारी वकील ने यूनिनॉर (पुराना नाम यूनिटेक वायरलेस) और एतिसालात डीबी के नाम लिए और कहा कि ए राजा के संचार मंत्री रहते समय नए यूएएसएल लाइसेंस देने में इन कंपनियों को तरजीह दी गई थी। आरोप है कि राजा ने उन्हें दूसरी कंपनियों को हिस्सेदारी बेचते समय जबरदस्त मुनाफा कमाने का मौका दिया था। विशेष सरकारी वकील अखिलेश ने अदालत से कहा, स्पेक्ट्रम का आवंटन करते वक्त बेवजह पक्षपात किया गया। इन कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया और स्पेक्ट्रम तथा लाइसेंस बेहद कम कीमत पर दिए गए। नॉर्वे की कंपनी टेलीनॉर की यूनिनॉर में 67.25 फीसदी हिस्सेदारी है और कंपनी पहले ही 6,135 करा़ेड रुपये का निवेश कर लगभग 1.85 करोड़ ग्राहक बटोर चुकी है। एतिसालात ने भी एतिसालात-डीबी में 45 फीसदी हिस्सेदारी लगभग 90 करा़ेड डॉलर में हासिल की है। लेकिन उसके पास बमुश्किल एक लाख ग्राहक हैं। यूनिनॉर ने इस मसले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और एतिसालात के अधिकारियों से संपर्क नहीं हो सका। दोनों कंपनियों को विपक्षी दल पहले भी निशाना बना चुके हैं। उनका कहना था कि रियल्टी समूह यूनिटेक और डीबी रियल्टी ने भारी भरकम कीमत पर विदेशी साझेदारों को हिस्सेदारी बेचकर चोखा मुनाफा कमाया है क्योंकि राजा ने कीमती स्पेक्ट्रम उन्हें कौडिय़ों के भाव बेच दिया था। उन्हें स्पेक्ट्रम उसी भाव पर मिला था, जिस भाव पर उसे 2001 में कंपनियों ने खरीदा था। इसके बाद नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया। कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि यूनिनॉर और एतिसालात उन कंपनियों में शामिल हैं, जो अधिकृत शेयर पूंजी के आधार पर आवंटन के योग्य नहीं थीं और उन्होंने कई तथ्यों के साथ छेड़छाड ़की, जिसके बावजूद उन्हें यूएएसएल दे दिया गया। कैग ने कहा कि यूनिटेक समूह से संबंधित 6 नई कंपनियों ने 20 लाइसेंस हासिल करने के लिए 24 सितंबर 2007को आवेदन किए थे। उन्होंने आवेदन पत्र के साथ योग्यता के संबंध में दस्तावेज भी दाखिल किए गए थे। लेकिन पंजीकरण संबंधी विवाद के कारण बाद में इन कंपनियों ने नए नाम के साथ मई 2008 में पंजीकरण कराया। कैग के मुताबिक इस तरह कंपनियां सितंबर 2007 को दूरसंचार क्षेत्र में कारोबार के लिए पात्र ही नहीं थीं। इस बीच पूर्व वित्त सचिव और रिजर्व बैंक के वर्तमान गवर्नर डी सुब्बाराव 2जी स्पेक्ट्रम पर लोक लेखा समिति के सामने आज पेश हुए। उनके जाने के बाद समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि इस मामले में प्रधानमंत्री को भी बुलाया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि दूरसंचार विभाग के कुछ पूर्व निर्णयों पर वित्त मंत्रालय अपनी राय दे चुका है। उसी के सिलसिले में सुब्बाराव से बातचीत की गई। जोशी ने कहा कि कैग की रिपोर्ट पर आपत्ति जताने वाली यूनिनॉर और एतिसालात-डीबी को भी जरूरत पडऩे पर तलब किया जा सकता है।