रविवार, 25 जुलाई 2021

7 हजार ऐसी बीमारियां, जिनका इलाज संभव नहीं या फिर आम आदमी के बूते के बाहर

दुर्लभ बीमारियों की समस्या अक्सर पर्दे के पीछे छिपी रहती है। दुनिया भर में 7 हज़ार से ज़्यादा किस्म की बीमारियों को दुर्लभ रोगों की श्रेणी में रखा गया है। विश्व के करीब 35 करोड़ लोग इन बीमारियों की चपेट में हैं। इनमें से करीब 20 प्रतिशत मरीज़ अकेले  हिंदुस्तान में हैं। मतलब,  दुनियाभर में दुर्लभ रोगों से पीड़ित मरीज़ों की कुल संख्या संयुक्त राज्य अमेरिका की आबादी से भी ज़्यादा है। इसके बावजूद इन रोगों की ठीक से पहचान करने और उनका उचित इलाज करने को लेकर गंभीर प्रयासों का अभाव दिखाई देता है।  वह भी तब जब करीब 7 हज़ार दुर्लभ बीमारियों में से 5 फ़ीसदी से कम के इलाज मौजूद हैं। और अगर थोड़ी राहत मिलने की संभावना भी है, तो  चिकित्सा प्रक्रियाएं बेहद महंगी हैं। नतीजतन कुछ मुट्ठी भर लोग ही अपना इलाज करवा पाते हैं और बाक़ियों को तो किसी भी तरह की चिकित्सा मुहैया ही नहीं हो पाती। 

दुर्लभ बीमारियों से ग्रस्त मरीज़ों के परिजनों ने 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर संज्ञान लेते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को 31 मार्च 2021 तक दुर्लभ बीमारियों के बारे में नई राष्ट्रीय नीति को अंतिम रूप देकर उसे लागू करने को कहा था। 

दुनिया भर में एक साल की उम्र तक के बच्चों की मृत्यु के 35 फ़ीसदी मामलों के पीछे इन्हीं दुर्लभ बीमारियों का हाथ होता है। असामान्य बीमारियों से ग्रस्त करीब 30 प्रतिशत बच्चे अपना पांचवां जन्मदिन मनाने से पहले ही काल के गाल में समा जाते हैं।  भारत में भी कमोबेश हालात ऐसे ही हैं या फिर कुछ मामलों में इससे भी बदतर हैं। बाल मृत्यु दर पर इन दुर्लभ बीमारियों के गंभीर प्रभावों के बावजूद इनसे जुड़े सरकारी मसौदे में कोई नई सोच दिखाई नहीं देती। मसलन इन  दुर्लभ बीमारियों को सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना से जोड़ने का प्रयास मसौदे से पूरी तरह ग़ायब है।

दुर्लभ बीमारियों से ग्रस्त किसी भी मरीज़ का सफ़र बीमारी की पहचान से शुरू होता है। अमेरिका में ऐसे मरीज़ों के लिए अपनी बीमारी का सही निदान पाने में 8 वर्षों तक का समय लग सकता है। भारत में तो ये इंतज़ार और भी लंबा होता है। इसके पीछे टेस्टिंग का अभाव और दुर्लभ बीमारियों की समझ रखने वाले विशेषज्ञों तक सीमित पहुंच जैसी वजहें शामिल हैं। इतना ही नहीं मरीज़ के जीवन की गुणवत्ता पर दुर्लभ बीमारियों के प्रभाव को लेकर भी आम समझ बेहद कम है।   

दुर्लभ किस्म की कुछ बीमारियों के इलाज का सालाना ख़र्च 10 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपए तक हो सकता है। कई मामलों में ये इलाज आजीवन चलते और मरीज़ की उम्र के हिसाब से इनका ख़र्च बढ़ता जाता है। इलाज के ख़र्चे के अलावा कई तरह के ऊपरी ख़र्चे भी होते हैं। इनमें थेरेपी से जुड़ा ख़र्च, तीमारदारी करने वाले व्यक्ति के रोज़गार का नुक़सान, इलाज के लिए आने-जाने का ख़र्चा और मरीज़ के खान-पान की विशेष ज़रूरतें शामिल हैं। इलाज की कुल लागत में इनको भी शामिल करना ज़रूरी है। कुल मिलाकर ये ख़र्च इतना अधिक है कि दुर्लभ बीमारियों का इलाज करवा पाना एक औसत भारतीय परिवार की हैसियत के बाहर हो जाता है।

   


शनिवार, 24 जुलाई 2021

बिहार के दो अनमोल रतन, दोनों ही कर रहे ‘अपनी’ जतन

गोदी राजनीतिइस देश के माथे पर चस्पा किया हुआ कलंक है। जो इसे दूर करने के लिए पार्टी में सिर उठाता है, पार्टी से ही दूर हो जाता है। दूध में पड़ी मक्खी के समान उसे निकालकर बाहर फेंक दिया जाता है। यहांगोदी राजनीतिकी तासीर को समझना जरूरी है। तो यहपेटीकोटसोच की देन है और ही उत्तराधिकारी की लड़ाई। यह शुद्ध रूप से वर्चस्व का एक रूप है, जो कुछ समय के अंतराल पर अचानक राजनीतिक क्षितिज पर चमकता है और फिर लीप-ईयर की तरह गुम हो जाता है।

देश के अलग-अलग राज्यों की अपनी-अपनी कहानी है और सभी का अपना मापदंड। आज प्रसंगवश बिहार को रेखांकित करना समीचीन होगा। बिहार की राजनीति पिछले कुछ दशकों से लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड की दो पाटों के बीच हिचकोले खा रही है। 'लालटेन' के जरिए गरीब की कुटिया में रोशनी लाने का दावा करने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने 5 जुलाई 1997 को जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल  के नाम से नए दल का गठन किया। पार्टी गठन के समय लालू ने कहा था कि यह दल समाजवाद का नारा बुलंद करेगा। उस समय रघुवंश प्रसाद सिंह, कांति सिंह समेत लोकसभा के 17 सांसद और राज्यसभा के 8 सांसद लालू की नई पार्टी में गए। लालू यादव को पार्टी का संस्थापक अध्यक्ष बनाया गया। लालू यादव मार्च 1990 से लेकर जुलाई 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे।

23 सितंबर 1990 को लालू ने राम रथयात्रा के दौरान समस्तीपुर में लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया और खुद को एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में प्रस्तुत किया। चारा घोटाले में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद लालू ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर पत्नी राबड़ी देवी को राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया। वर्ष 2015 में हुए राज्य विधानसभा चुनाव में राजद ने नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के साथ गठबंधन किया और दोनों ने मिलकर 178 सीटों पर जीत हासिल की। राजद को 80 सीटें, जबकि जदयू को 71 और गठबंधन की तीसरी सहयोगी कांग्रेस को 21 सीटें मिलीं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने और लालू पुत्र तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम एवं बड़े बेटे तेजप्रताप स्वास्थ्य मंत्री बनाए गए, लेकिन जुलाई 2017 में यह गठबंधन टूट गया और नीतीश ने भाजपा के साथ मिलकर राज्य में नई सरकार का गठन किया।

अंदरखाने जाते हुए तत्कालिक परिदृश्य का ही आकलन युक्तसंगत होगा। चारा घोटाले में जेल में रहे लालू यादव हाल ही में बाहर आए हैं। उनके कद्रदान पहले से और ज्यादा उतावले हुए। वातावरण तैयार किया और राजद के नए युग की शुरुआत के संकेत दिए, लेकिन लालू यादव सियासत की हर जुबान को समझते हैं। उन्होंने सबसे पहले मौके की नजाकत को भांपा और जातिगत समीकरणों पर ही ज्यादा भरोसा किया। दोनों बेटे में राजनीतिक विरासत बांट देने की मंशा जताई, तो कहीं से कोई कुलबुलाहट नहीं हुई। उल्टे जिंदाबाद के नारे लगे। वैसे बृषिण पटेल जैसे नेता जरूर कहते हैं कि राजद परिवार की पार्टी है, क्योंकि यहां परिवार वाली फिलिंग है। बिना पारिवारिक फीलिंग के दल चल ही नहीं सकता। दल का मतलब ही होता है परिवार। यहां सभी सदस्य आपस में परिवार की तरह हैं, क्योंकि यहां नेता और कार्यकर्ता में अंतर नहीं है। यहां कार्यकर्ता का रोआं भी टूटता है तो नेता को दर्द होता है। हालांकि इसदर्दको वे अच्छी तरह से जानते होंगे। परंपरा बोलने की रही है, तो बोलते हैं, कभी बिफरते भी हैं। रटंतु जुमला बोलते हैं कि भाजपा हमेशा समाज में बिखराव करना चाहती है। चाहे वह जाति की सोच हो या हिंदू-मुसलमान की। गैर बराबरी ही उनकी नियति बन गई है। भाजपा कुछ चहेते को ही  देना चाहती है और गरीबों का हक मारना चाहती है।  

दरअसल, बिहार की राजनीति को समझने के पहले वहां की मानसिकता को जानना जरूरी है। अगर आप किसी शहर में हैं, तो देख रहे होंगे कि विकास के तमाम दावों के बावजूद कुछ इलाके ऐसे होते हैं, जहां की सड़कें दुकानों से आबाद नहीं हो पाती। होती भी हैं, तो रौनक नहीं समेट पातीं। यह क्षेत्र विशेष का वैचारिकअभिशापहोता है। बिहार जैसे प्रदेश भी दशकों से वैचारिकअभिशापझेल रहे हैं। इससे आप जाति आधारित राजनीति कह कर पीछा छुड़ा सकते हैं, पर सच स्याह है और इसका कोई पक्ष उजास से नहीं भरा है। बिहार में राजनीतिक दल इसी बल पर पनपते रहे हैं। जातिगत राजनीति से उपजे नेताओं और उनके द्वारा गठित राजनीतिक दलों में उत्तराधिकारी अधिकतर परिवार से उपजते हैं। जहां ऐसा नहीं होता वहां उत्तराधिकार का संकट हमेशा ही बना रहता है, क्योंकि नेतृत्व के नीचे कोई बेल पनपने ही नहीं पाती। बिहार में जदयू फिलहाल ऐसी ही दुविधा से ग्रस्त है। 

सर्वेसर्वा बनकर स्थापित हो चुके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार संगठन में अपने उत्तराधिकारी की तलाश कर रहे हैं। नीतीश कुमार अपवाद हैं कि उन्होंने कभी भी अपने स्वजनों को तो राजनीति में सक्रिय किया और ही चुनाव या पिछले दरवाजे से सदन में भेजा। उनके साथ संयोग भी जुड़ा कि उनके पुत्र और भाई की राजनीति में रुचि ही नहीं रही और ही कुटुंब के लोग इधर-उधर परिचय देकर लाभ लेने की कोशिश करते नजर आए। नीतीश ने संगठन के उत्तराधिकारी के तौर पर अपने भरोसेमंद राज्यसभा सदस्य आरसीपी सिंह को जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। वे नीतीश के 23 साल पुराने सहयोगी हैं, उनके गृह जिले नालंदा से हैं, इसलिए सबसे ज्यादा भरोसा उन्हीं पर किया। अब आरसीपी सिंह केंद्रीय कैबिनेट में शामिल हो गए हैं। 

अब जदयू का संकट यही है कि उसमें आरसीपी के अलावा जातिगत समीकरणों में फिट बैठने वाला कोई भी ऐसा नेता नहीं पनपा जो उनकी जगह ले सके। इसलिए फिलहाल हाल ही में पार्टी में शामिल हुए नीतीश के पुराने साथी उपेंद्र कुशवाहा के नाम की चर्चा सबसे आगे है। वह जदयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। उपेंद्र का नीतीश से रिश्ता लोकदल के समय से हैं। इसे कैलेंडर के हिसाब से वर्ष 1985 से मान सकते हैं। यह रिश्ता इस बीच लगभग आठ वर्षो तक टूटा रहा। पिछले विधानसभा चुनाव में उपेंद्र की पार्टी रालोसपा (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी) भी उतरी थी, लेकिन एक भी सीट नहीं ला पाई। अलग दल बनाकर कोई राजनीतिक लाभ उठा पाने वाले उपेंद्र चुनाव बाद नीतीश के साथ गए और संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बना दिए गए। लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण के तहत उपेंद्र, नीतीश के हर समीकरण में फिट बैठते हैं। इसलिए नीतीश इन पर उम्मीद की राजनीतिक कर सकते हैं।   

यह बात और है कि बिहार की राजनीति में 16 वर्षों तक अपना दबदबा कायम रखने वाले नीतीश कुमार हर तरफ अब समझौते के मूड में नजर रहे हैं। जानकार मानते हैं कि समता पार्टी के गठन के बाद नीतीश कुमार ने शायद ही कभी समझौतावादी रुख अपनाया। नीतीश के साथ खड़े हर शख्स को नीतीश की शर्तों पर चलना पड़ा। जनता दल यूनाइटेड के गठन के बाद जॉर्ज फर्नांडीस और शरद पवार जैसे नेताओं को भी नीतीश कुमार की तमाम शर्तें माननी पड़ी, लेकिन 2020 विधानसभा चुनाव के बाद से हालात बदल गए हैं। आलम यह है कि अब नीतीश कुमार को उसी जनता दल यूनाइटेड के भीतर आंखें दिखाई जाने लगी हैं। याद कर लीजिए कैबिनेट मंत्री मदन सहनी का प्रकरण।  मन मुताबिक ट्रांसफर-पोस्टिंग होने पर बिहार में अफसरशाही हावी होने का आरोप लगाते हुए जिस तरह से मीडिया में उन्होंने अपने इस्तीफे की पेशकश की, दरअसल वह नीतीश कुमार के खिलाफ खुली बगावत ही तो थी।

 

 

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

जदयू के अंदरखाने में ‘लावा’ ...बदले जा सकते हैं अध्यक्ष

जनता दल यूनाइटेड की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक 31 जुलाई को दिल्ली में होने वाली है। यह बैठक इस बार खास है, क्योंकि पार्टी के नए अध्यक्ष का चुनाव इस दौरान किया जा सकता है। बताया जा रहा है कि पिछले साल 27 दिसंबर को जेडीयू के अध्यक्ष चुने गए आरसीपी सिंह पर अध्यक्ष पद को छोड़ने के लिए पार्टी के भीतर आवाज उठाई जा रही है। ‘एक आदमी एक पद' के सिद्धांत पर अमल करने की बात दोहराई जा रही है। आरसीपी सिंह 7 जुलाई को नरेंद्र मोदी कैबिनेट में शामिल किए गए हैं। 

जनता दल यूनाइटेड के अंदर चल रही दबाव की राजनीति रविवार को तब सामने आई, जब आरसीपी सिंह ने बिहार जदयू के पदाधिकारियों की एक बैठक को संबोधित करते हुए  कहा कि वह केंद्रीय मंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों के रूप में काम करने में सक्षम हैं।  लेकिन, अगर पार्टी फैसला करती है, तो मैं निश्चित रूप से एक 'मजबूत सहयोगी' को यह जिम्मेदारी दूंगा।' इस बयान को एक तरह से  टॉप लीडरशिप में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।    

सूत्रों ने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को आगामी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में एक नया पार्टी प्रमुख चुनने के लिए पर्याप्त संकेत दिए हैं। वहीं इस साल 14 मार्च को अपनी 8 साल पुरानी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी  का जदयू में विलय करने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी के अध्यक्ष के लिए रेस में माना जा रहा है। दरअसल ये कुशवाहा के लिए एक घर वापसी थी, जिन्होंने जनवरी 2013 में नीतीश के साथ राजनीतिक मतभेदों के बाद जदयू छोड़ दिया था और 3 मार्च, 2013 को रालोसपा का गठन किया था।

विलय के फौरन बाद नीतीश ने कुशवाहा को जदयू के राष्ट्रीय संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया। इसके बाद कुशवाहा को पार्टी के चुनाव चिह्न पर एमएलसी बनाया गया और राज्य की राजधानी में एक बड़ा बंगला भी आवंटित किया। दूसरी तरफ, जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी ने बताया कि 'अभी तक, 31 जुलाई की बैठक के एजेंडे को अंतिम रूप नहीं दिया गया है, लेकिन पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं के बैठक में शामिल होने की उम्मीद है।'  उपेंद्र कुशवाहा ने कहा चूंकि अभी तक एजेंडा बहुत स्पष्ट नहीं है, इसलिए किसी भी मुद्दे पर चर्चा हो सकती है।  


जम्मू-कश्मीर अब सबका...लैंगिक असमानता दूर करने बड़ा फैसला

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के लागू होने के वक्त तक सिर्फ राज्य की महिलाओं को ही यहां का स्टेट सब्जेक्ट मानकर डोमिसाइल दिया जाता था। वहीं पुरुषों के साथ ये नियम नहीं थे।  जम्मू-कश्मीर के पुरुष अगर दूसरे राज्य की महिला से शादी करते थे तो उनके बच्चे राज्य के स्थायी निवासी कहे जाते थे। अब  प्रशासन ने कहा है कि वो लोग जिन्होंने जम्मू-कश्मीर की महिला से विवाह किया है, वह भी प्रदेश के स्थानीय निवासी बनने के पात्र होंगे।  ऐसे दंपति के बच्चे भी स्टेट डोमिसाइल लेने के योग्य होंगे।

जम्मू-कश्मीर में लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए सरकार ने एक बड़ा फैसला किया है। केंद्र शासित प्रदेश के डोमसाइल कानूनों में बदलाव करते हुए  20 जुलाई 2021 को जारी आदेश में कहा गया है कि अब दूसरे राज्यों में रहने वाले लोग, जिन्होंने कश्मीरी महिला से शादी की है, उनके बच्चे भी कश्मीर के स्थायी निवासी बन सकते हैं। जम्मू और कश्मीर में जब तक अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 ए लागू था, तब तक ऐसी दशा में सिर्फ महिला ही कश्मीर की स्थायी निवासी रहती, उसके बच्चों और पति को इस दायरे से बाहर रखा गया था।  

आर्टिकल 35-A जम्मू-कश्मीर विधानसभा को राज्य के 'स्थायी निवासी' की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। इसके तहत जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को कुछ खास अधिकार दिए गए हैं। साल 1954 में इसे राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया था। 1956 में जम्मू-कश्मीर का संविधान बनाया गया था और इसमें स्थायी नागरिकता की परिभाषा तय की गई थी।  इस अनुच्छेद की वजह से देश के कई कानून जम्मू और कश्मीर में लागू नहीं होते थे।  

अब वह लोग भी राज्य के स्थायी निवासी बन सकते हैं, जिन्होंने यहां कि किसी स्थानीय महिला से विवाह किया है। इस महिला के बच्चे भी राज्य के स्थायी निवासी बनने के पात्र होंगे। इसके लिए इन्हें सक्षम अधिकारी के समक्ष आवेदन करना होगा। स्टेट के डोमिसाइल सर्टिफिकेट को हासिल करने वाले ये लोग सरकारी नौकरियों में आवेदन के भी पात्र होंगे। इसके अलावा ये लोग यहां की संपत्तियों को भी खरीद और बेच सकेंगे। इनके अलावा डोमिसाइल कानूनों के तहत ऐसे पात्रों को कई अन्य सुविधाएं भी मिल सकेंगी।