बुधवार, 18 जुलाई 2018

किस्मत फडणवीस के साथ



महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडणवीस सही में किस्मत के धनी हैं। पार्श्व में जाने से पहले वर्तमान को देखें तो भी यह बात सौ फीसदी सच साबित हो रही है। लंबे अंतराल के बाद नागपुर मंे मानसून सत्र चल रहा है। सरकार नागपुर में है। आला प्रशासनिक अमला भी यहीं पर है और उधर मुंबई डूब रही है। मौसम विभाग अलर्ट पर अलर्ट जारी कर रहा है। फडणवीस फजीहत से साफ बच रहे हैं। मुंबई में मानसून सत्र चल रहा होता तो भारी किरकिरी का सामना सरकार को करना पड़ता। बारिश ने नागपुर में भी रंग जमाया, लेकिन सरकार बदरंग होने से बच गई। विपक्ष के मुद्दे प्रभाव नहीं छोड़ रहे हैं, भले आरोप लग रहा है कि मुख्यमंत्री फडणवीस ‘पैजामे का नाड़ा खोल देने की’ धमकी देकर अपना काम चला रहे हैं।
वर्ष 2017 में 25 मई का दिन फडणवीस भूल नहीं सकते। एक बड़ी दुर्घटना का शिकार होने से वह बच गए
 थे। दरअसल जिस हेलिकॉप्टर में वह सवार थे, उसकी लातूर में क्रैश लैंडिंग करानी पड़ी। पायलट की सूझबूझ के चलते वह और उनकी टीम के सदस्य पूरी तरह सुरक्षित रहे। इस वर्ष फडणवीस एक बार फिर हादसे का शिकार होते-होते बचे। पायलट की सूझ-बूझ से कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई। हेलिकॉप्टर में नितीन गडकरी भी थे।  हेलिकॉप्टर की लैंडिंग मुंबई के समीप भयंदर स्थित एक स्कूल में होनी थी। पायलट जैसे ही लैंडिंग के लिए हेलिकॉप्टर नीचे लेकर आ रहा था, तभी उसे मैदान के आस पास तारों का जाल फैला हुआ दिखा। उसने तुंरत हेलिकॉप्टर को ऊपर किया और वापस आसमान में ले गया। इससे पहले सीएम औरंगाबाद के लिए एक हेलिकॉप्टर से रवाना हुए जो कि ओवरलोडिंग के कारण नासिक से उतरने के तुरंत बाद भूमि पर वापस आने पर मजबूर हो गया। कोई दो राय नहीं, फडणवीस पर ऊपर वाले की मेहरबानी हमेशा रही।  
पार्श्व में जाएं तो किस्मत का खेल फडणवीस के हमेशा साथ रहा और महज 22 साल की उम्र में वह नागपुर स्थानीय निकाय से कॉरपोरेटर बन गए और 27 साल की आयु में 1997 में नागपुर के सबसे युवा मेयर चुने गए। कॉरपोरेटर से नागपुर के सबसे युवा मेयर बने देवेन्द्र फडणवीस महाराष्ट्र में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने राजनीतिक सीढ़ियां क्रमिक रूप से चढ़ी हैं। विधानसभा चुनाव में भाजपा के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बाद मृदुभाषी और युवा नेता फडणवीस इस शीर्ष पद के लिए स्पष्ट रूप से पसंदीदा नेता बने। यहां
 तक कि पार्टी की प्रदेश कमेटी के कई नेताओं ने भी काफी लॉबिंग की। वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के भी विश्वस्त माने जाते हैं। चुनाव रैली में मोदी ने उनके लिए कहा था, ‘देवेन्द्र देश के लिए नागपुर का तोहफा हैं।’जनसंघ से जुड़े रहे और बाद में भाजपा के नेता बने दिवंगत गंगाधर फडणवीस के बेटे देवेन्द्र युवावस्था में ही राजनीति में उतर गए थे, जब वह 1989 में आरएसएस की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हुए थे। गंगाधर को नागपुर के उनके साथी नेता और पूर्व पार्टी प्रमुख नितीन गडकरी अपना ‘राजनीतिक गुरु’ कहते हैं। हालांकि अपने गुरु के इस बेटे की उपलब्धि पर गडकरी को रस्क भी हुआ पर कभी कभी सामने नहीं आने दिया। फडणवीस के ‘राजनीतिक अश्वमेघ का घोड़ा’ सरपट दौड़ रहा है और हाशिए पर खड़े प्रतिद्वंद्वी उन्हें देखकर बस यही कह रहे हैं-किस्मत हो तो फडणवीस जैसी....।
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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

नागपुर में शिक्षा जगत का अब तक सबसे बड़ा घोटाला.....
संस्थान खोल पदों पर भर्ती किए ‘अपनों’ को
सरकार को अंधेरे में रख करोड़ों नहीं, अब तक ले चुके हैं अरबों
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सोमवार, 11 जुलाई 2016

एक पत्रकार की हकीकत 

सेवा में
श्रीमान नरेंद्र मोदी जी
प्रधानमंत्री
नमस्कार,
मैं आज एक विश्वास के साथ यह पत्र आप को लिख रहा हूँ कि अन्य विभागों की तरह लोकशाही के चार स्तंभ में से एक पत्रकारिता में युवाओ के रोजगार पर भी ध्यान देंगे। अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई से लेकर आज तक देश के विकास में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। समय के साथ पत्रकारिता में बदलाव आया है। जैसे कि आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता का उद्देश्य अंग्रेजों से कलम की लड़ाई थी लेकिन आज समय के अनुसार यह बदलकर व्यापार बन गया है। आज के युवा पत्रकारिता की डिग्री लेकर अपना भविष्य बनाने में लगे हैं। डॉ भीमराव आंबेडकर, लोकमान्य गंगाधर तिलक, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर आज के वरिष्ठ पत्रकारों को अपने आदर्श के रूप में देखते हुए युवा अपना भविष्य पत्रकारिता में बनाने के उद्देश्य से पत्रकारिता में आ रहे हैं।
मैं भी उन्हीं युवाओं की तरह पत्रकारिता में अपना भविष्य बनाने के उद्देश्य से पत्रकारिता की पढाई कर पत्रकारिता की शुरुआत की। पत्रकारिता में तो हमें बहुत कुछ पढ़ाया गया लेकिन वह सब पढाई तक ही अच्छा लगा। लेकिन पत्रकारिता की शुरुवात मैंने नवी मुंबई के वाशी से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक अखबार में 2006 से किया।
पहली बार जब उस अखबार में गया तो संपादक जी ने बकायदा मेरा इंटरव्यू लिया उसके बाद खबर लाने के साथ ही मुझे अखबार भी साथ में पकड़ा दिया कि इसे बाँटते जाना। खैर मुझे सीखना था इसलिए मैंने सोचा कि एकाध दिन कर देते हैं लेकिन बार बार अखबार बाँटने का काम दिए जाने के कारण मैंने वहां काम करना छोड़ दिया। उसके बाद मुंबई से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों में 2007 तक काम किया। इस दौरान कई जगह मेरा वेतन भी नहीं मिला। इस बीच 2007 में हमारा महानगर अखबार से जुड़ा और आज तक जुड़ा रहा। कंपनी के कुछ डायरेक्टरों ने मुझे और कुछ स्टाफ का ट्रांसफर कर दिया जिसके कारण हम मुंबई के बाहर ज्वाइन नहीं किये। 2006 से लेकर अभी तक मैंने जितने भी अखबारों में काम किया वहां पत्रकारों का कोई भविष्य नजर नहीं आया। हां इतना जरूर देखा हूं कि जो नेताओं, मालिकों की चापलूसी और पुलिस की दलाली कर सकता है वह सफल है। हम भी मालिक के कई काम किये लेकिन चापलूसी नहीं कर पाये जिसके कारण आज भी चाल में छोटे मकान में रह रहे हैं।
मोदी जी, आप के प्रधानमंत्री बनने के पहले से ही देश के अधिकतर युवाओं और नागरिकों को विश्वास था कि हर क्षेत्र में रोजगार के लिए कदम उठाएंगे। आप कर भी रहे हैं लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे युवाओं के लिए अभी तक कोई कदम नहीं उठाये हैं। पत्रकारिता की पढाई पूरी करने के लिए देश भर में रोज नए- नए, बड़े-बड़े कॉलेज इंस्टीट्यूट खुल रहे हैं। उन कॉलेजों इंस्टीट्यूट में युवाओं को पत्रकारिता के गुण सिखाये जा रहे हैं लेकिन रोजगार के लिए कोई मार्ग नहीं है। कुछ युवाओं का नसीब सही माना जाए या उनका भाग्य माना जाए जो सफल हो जाते हैं नौकरी पाने में लेकिन अधिकतर युवक नौकरी की तलाश में भटकते रहते हैं। नौकरी नहीं मिलने पर अपने आप को कोसते रहते हैं कि आखिर क्यों मैं अपना समय पत्रकारिता में गंवा दिए। लाखों की संख्या में देश के युवक आज अपने आप को उसी तरह कोस रहे हैं। जो नौकरी कर भी रहे हैं उसमें से बहुत कम ही हैं जिन्हें उनके मेहनत के अनुसार मेहनताना मिल पाता है वरना गधे की तरह मजदूरी कर इस उम्मीद में समय बिता रहे हैं कि आज ना कल कुछ अच्छा होगा।
मोदी जी, आप से भी यही उम्मीद है कि पत्रकारिता के क्षेत्र को मजबूत करें जिससे युवाओं को रोजगार मिल सके। अगर नहीं मजबूत कर सकते या पत्रकारिता में रोजगार नहीं उपलब्ध करा सकते तो पत्रकारिता के उन कॉलेजों और इंस्टीट्यूट को बंद कर दे जिससे उन युवाओं के साथ धोखा ना हो सके जो इस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने के उद्देश्य से आना चाहते हैं। मोदी जी आप के सामने मैं बहुत ही छोटा हु ।लेकिन उन लाखों युवाओं की तरफ से यह पत्र लिखा हूं। पता नहीं कि आप इसे पढ़ेंगे भी या नहीं? लेकिन हम उम्मीद लगाये हैं कि विदेश दौरे से वापस आने के बाद जरूर कोई ठोस कदम उठाएंगे ताकि युवाओं का सपना अधूरा ना रहे।
धन्यवाद
एक पत्रकार
नागमणि पाण्डेय

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

देवेंद्र पर इतराया नागपुर

 विधायक दल की बैठक में मंगलवार 28 अक्टूबर 2014 को भारतीय जनता पार्टी ने नया इतिहास बनाया है। पहली बार कोई भाजपाई महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में विपक्षी नेता एकनाथ खड्से ने फडणवीस के नाम का प्रस्ताव रखा और सुधीर मुनगंटीवार ने अनुमोदन किया। फडणवीस को 31 अक्टूबर को वानखेडे स्टेडियम में मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलायी जायेगी।
 महाराष्ट्र भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे  देवेंद्र फड़णवीस ने नागपुर के पार्षद से यहां तक का सफर तय किया है। उन्होंने राजनीति में शुरूआती 90 के दशक में कदम रखा। वे उसी समय पार्टी से जुड़े थे। साल 1992 में देवेंद्र नागपुर के सबसे कम उम्र में पार्षद बने थे। उन्हें 21 साल की उम्र में ये पद संभालने का मौका मिला और लगातार दो बार उन्होंने ये कुर्सी संभाली। यही नहीं, वो देश में सबसे कम उम्र में मेयर बनने वाले लोगों की सूची में दूसरे स्थान पर है। फडणवीस 1997 में 27 साल की उम्र में नागपुर के मेयर बन गये थे। साल 1999 से चार बार लगातार महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य रहे हैं। साल 1992 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के नागपुर अध्यक्ष बने और फिर 1994 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के स्टेट वाइस प्रेसिडेंट का पद संभाला। वर्ष 2001 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेशनल वाइस प्रेसिडेंट की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2010 में महाराष्ट्र भाजपा के सेक्रेट्री बने। इस प्रकार 2013 में महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष बन गए।
फडणवीस ने वर्ष 1986 में लॉ कॉलेज नागपुर से अपनी वकालत पूरी की थी। वो एबीवीपी के सदस्य भी थे। वकालत पूरी करने के बाद बिजनेस मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के साथ डीएसई, बर्लिन से प्रोजेक्ट मैनेजमेंट में डिप्लोमा कोर्स भी किया। फडणवीस का जन्म 1970 में नागपुर में हुआ था। उनके पिता जन संघ नागपुर से विधानपरिषद के सदस्य रहे हैं।
 देवेंद्र फडणवीस को राजनीति विरासत में मिली।  पिता गंगाधर राव फडणवीस नागपुर से एमएलसी थे। फडणवीस ने वार्ड स्तर से राजनीति शुरू की।  बीजेपी में वार्ड संयोजक से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक बनने का सफर तय किया। महज 27 साल की उम्र में नागपुर के मेयर बन चुके थे। फडणवीस की पहचान पढ़े लिखे नेता की है। बजट पर एक किताब भी वे लिख चुके हैं।
44 साल के देवेंद्र फडणवीस की छवि जमीन से जुड़े तेज तर्रार नेता की है।  उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। नागपुर की सभा में मोदी ने फडणवीस की खुल कर तारीफ की थी, मोदी ने फडणवीस को सक्रिय जनसेवक बताया था। वैसे फडणवीस की तारीफ उनके विरोधी भी करते हैं। चुनाव से ठीक एक दिन पहले महाराष्ट्र के पूर्व मुख्मयंत्री और कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने फडणवीस को मुख्यमंत्री पद का सबसे योग्य चेहरा बताया था।
 महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बात के पक्के माने जाते हैं। वह मात्र 44 साल की उम्र में राज्य के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। वह जब 22 साल के थे, तभी पार्षद चुने गए थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष फडणवीस को राज्य में जमीन से जुड़े नेता के तौर पर जाना जाता है।
शरद पवार के बाद फडणवीस महाराष्ट्र के दूसरे सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री होंगे। पार्टी के अंदर फडणवीस को अपनी बात पर टिके रहने वाले नेता के तौर पर और आर्थिक एवं वाणिज्यिक मामलों के विशेषज्ञ के तौर पर जाना जाता है।
फडणवीस ने प्रखर वक्ता के रूप में भी अपनी पहचान बनाई है। मराठा पहचान के इर्द-गिर्द सिमटी महाराष्ट्र की राजनीति में फडणवीस अपनी जातीय पहचान को दबाकर ही रखते हैं। फडणवीस का कहना है कि महाराष्ट्र इस तरह की चीजों से बाहर निकल चुका है। आज का युवा विकास और तरक्की चाहता है।
आरएसएस के गढ़ नागपुर में 1970 में जन्मे फडणवीस ने राजनीति में देर से प्रवेश किया, लेकिन पार्टी में उनकी तरक्की बेहद तेज रही। फडणवीस हालांकि कॉलेज में भाजपा की युवा इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भी जुड़े रहे। उन्होंने अपने विधायक पिता गंगाधर आर फडणवीस और विदर्भ हाउसिंग क्रेडिट सोसायटी की निदेशक रहीं अपनी मां सरिता से राजनीति का ककहरा सीखा।
 वक्तृत्व कला के धनी फडणवीस को कॉमनवेल्थ पार्लियामेंटरी एसोसिएशन द्वारा 2002-03 में सर्वश्रेष्ठ सांसद चुना गया। भाजपा के एक नेता ने कहा है कि फडणवीस सभी का सम्मान करते हैं और उन्होंने किसी के साथ कोई गड़बड़ी नहीं की। वह अपने साथी पार्टी सदस्यों से सुझाव लेते हैं, लेकिन अपने विवेकानुसार ही काम करते हैं। वह बहुत ही धैर्यशील व्यक्ति हैं ।
फडणवीस को उनकी क्षमता देखते हुए 2013 के मध्य में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वह सबसे कम उम्र में इस पद पर बैठे। फडणवीस के पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी ने मोदी लहर का पूरा लाभ उठाते हुए राज्य की 48 सीटों में से 23 पर जीत हासिल की। विधानसभा चुनाव के लिए मोदी की रैलियों के अतिरिक्त फडणवीस ने राज्य में 100 से अधिक चुनावी रैलियां कीं और पार्टी का बड़ा चेहरा बनकर उभरे।
सरकार, अब सरकार भी आपकी : अमरावती के चांदुर बाजार में नेताजी चौक स्थित मैदान पर तब चुनाव प्रचार के दौरान देवेंद्र फडणवीस ने अपने 20 मिनट के भाषण में  कहा था कि देश के सीमापर देश की सुरक्षा के दौरान अब तक सीमा पर जितने जवान शहीद नहीं हुए, उससे ज्यादा विदर्भ के किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा है। जिस तरह फसल को घास बर्बाद करता है, वैसा ही महाराष्ट्र को राष्ट्रवादी-कांग्रेस ने 15 साल में बर्बाद किया है। आसमानी संकट के बजाय सुल्तानी संकट के कारण ही महाराष्ट्र के किसानों ने आत्महत्या की है। विदर्भ के किसानों के लिए घोषित किये गए पैकेज का लाभ विदर्भ के किसानों के बजाय सत्ता धारियों ने ही लिया। 3 माह में 30 हजार करोड़ की बढ़ोत्तरी सिंचन व्यवस्था में की, ऐसे घोटालेबाज राज्य सरकार से हिसाब मांगा जाएगा। फड़णवीसजी अब सरकार आपकी है और हिसाब-किताब भी आपको ही लगाना है।  
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गुरुवार, 8 मई 2014

दम तोड़ती हड्डियों को संजीवनी

-ग्रामीण स्वास्थ्य शिक्षा अभियान में क्रांतिकारी पहल
-उपराजधानी के डॉ. संजीव चौधरी ने आस्टियोपोरोसिस के प्रति चेताया 
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नागपुर.
चटखती हड्डियों की वैश्विक गुहार से देश की ह्रदयस्थली में हुक उठी है। बिना किसी कारण हड्डियां जवाब दे रही हैं। 21वीं सदी के लिए अभिशाप बन रहे आस्टियोपोरोसिस नामक बीमारी को पनपते ही समाप्त करने के संकल्प के साथ गुरुवार को वैश्विक आगाज किया गया। नागपुर के एक होटल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान तकनीकी माध्यम से इसका प्रात्यक्षिक किया गया।
बैशाखी भी काम नहीं आएगा
वर्षों के अध्ययन एवं शोध के बाद उपराजधानी के जाने-माने अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ.संजीव चौधरी ने आस्टियोपोरोसिस नामक साइलेंट किलर रूपी बीमारी को मात देने के लिए साथ देने का अह्वान किया है। डॉ. चौधरी ने बताया कि विभिन्न देशों ने अपने यहां इसकी रोकथाम के लिए उपाय किए हैं। भारत जैसे देश में जनजागरुकता और संबंधित शिक्षा ही सर्वसुलभ माध्यम है और हमारे अभियान का मकसद भी उन्हीं विचारों को झंकृत करना है। वैसे तो बहुत देर हो चुकी है। आज भी अगर नहीं चेत पाए तो कलांतर में अपना ही भार उठाने से अपनी ही हड्डियां इनकार कर देंगी और फिर बैशाखियों का सहारा भी काम नहीं आएगा।
चेत जाएं
डॉ.चौधरी ने इस वैश्विक खतरे के प्रति आगाह करते हुए बताया कि हड्डियों की क्षणभंगुरता धीरे-धीरे अपना काम करती है। महिलाएं विशेष रूप से इसका शिकार बन रही हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के साथ विडंबना यह जुट गई है कि  अस्थियों को भरपूर ताकत यहां नहीं मिल पा रही। उम्र के लगभग संधिकाल में जब महावारी समाप्ति पर होती है, आस्टियोपोरोसिस सीधे मगर धीरे आक्रमण करता है और साल-दो-साल में यह पूरी तरह जकड़ लेता है। जागरुकता के अभाव में देश की एक तिहाई आधी आबादी स्थायी विकलांगता की ओर है। डॉ. चौधरी का मानना है कि मौजूदा हालात में लगभग 20 फीसदी महिलाएं इस बीमारी से मौत की गाल में समा रही हैं। मात्र 10 फीसदी वे खुशनसीब महिलाएं हैं, जो सामान्य हो पाती हैं। अन्यथा, 70 फीसदी महिलाएं अपंगता की हालत में आ जाती हैं। वे पल-पल मरतीं हैं।
हिटको एक  क्रांतिकारी पहल
डॉ. संजीव चौधरी ने आस्टियोपोरोसिस को मात देने के लिए हिटको (हेल्थ एजुकेशन एंड टेली कंस्लटेशन ऑन ऑस्टियोपोरोसिस) तंत्र ईजाद किया है। हिटको सम्मिलत रूप से वह क्रांतिकारी पहल है, जिसमें अंग्रिम पंक्ति में खुद हम ही हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों के अलावा अनेक स्वयंसेवी संगठन एवं प्रबुद्ध नागरिक इस पहल में साथ खड़े हो रहे हैं।
सॉफ्टवेयर कंसलटेंट डॉ. प्रसेनजीत भोयर, शब्बीर पठान, उर्मिला शेंडे, गिरीश धोटे, नीरज चावळा, नरेश चावळा, वेदांत चावळा, सोनू वैद्य सहित अन्य लोगों ने तीन महीने के अथक प्रयासों से इस मिशन को सफल बनाया है। सुधीरराव खंडार के नेतृत्व में शिशिर खंडार, राहुल मोहोड़, प्रदीप खंडार, सुदाम बाजमघाटे, संजय गउलकर एवं श्री बैगड़े ने कार्यक्रम स्थल का प्रबंधन किया।
 सफल प्रयोग
नागपुर से लगभग 50 किलोमीटर दूर मध्यप्रदेश के छिदवाड़ा जिले के सौंसर तहसील स्थि तायगांव खैरी गांव के लोगों से डॉ. संजीव चौधरी नागपुर स्थित अपने अस्पताल से ही मुखातिब हुए। लगभग 400-500 महिलाओं ने अपनी समस्याओं का निदान पाया। उत्साही लगभग 50 महिलाओं ने कैमरे के सामने आकर अपने सवाल पूछे। डॉ. चौधरी ने उनसे सीधा संवाद किया। श्री चौधरी ने बताया कि साल के अंदर च्ििहन्त लगभग 100 गांवों की पीडि़त महिलाओं से हम सीधे संवाद करेंगे और उनकी समस्याओं को हल करने की कोशिश करेंगे।
 क्या है आस्टियोपोरोसिस
उम्र के साथ-साथ हड्डियों का कमजोर होना सामान्य बात है। मगर जब यही हड्डियां इतनी कमजोर हो जाएं कि आसानी से टूटने की कगार पर पहुंच जाएं तो उस स्थिति को ऑस्टियोपोरोसिस कहते हैं। ऑस्टियोपरोसिस में हार्मोनल बदलाव से हड्डी का घनत्व और द्रव्यमान प्रभावित हो जाता है और फिर हड्डियों में फ्रैक्चर और जोड़ों के दर्द का खतरा बढ़ जाता है।  डब्ल्यूएचओ के अनुसार महिलाओं में हीप फ्रैक्चर (कुल्हे की हड्डी का टूटना) की आशंका, स्तन कैंसर, यूटेराइन कैंसर व ओवरियन कैंसर के बराबर है।    बीएमडी जांच   
डब्ल्यूएचओ के अनुसार ऑस्टियोपोरोसिस के टेस्ट के लिए बोन मिनरल डेंसिटी(बीएमडी) की जांच होनी चाहिए। बीएमडी टेस्ट हड्डियों के टूटने की आशंकाओं का पता लगा सकती है। ऑस्टियोपोरोसिस के उपचार का शरीर पर प्रभाव का भी पता लगा सकती है। हड्डियों के फ्रैक्चर से पहले ऑस्टियोपोरोसिस का पता लगाया जा सकता है। 

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

डाक्टरी तमन्ना को मियादी

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) का एक निर्णय  चिकित्सा पेशे से जुडऩे वालों के लिए 'मियादी साबित हो रहा है।  एमसीआई के खिलाफ फिर लामबंदी होने को है। चर्चा तेज है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया एमबीबीएस कोर्स की अवधि 5.5 साल से 7.5 साल बढ़ाने को लेकर निर्णय लेने वाली है। इस मामले पर केंद्र सरकार भी बैकपुट पर है। लोकसभा चुनावों को देखते हुए खतरा मोल लेने की स्थिति में सरकार है भी नहीं। अगर एमसीआई ने कदम बढ़ा दिया तो फिर मेडिकल क्षेत्र औसत विद्यार्थियों के लिए कोसों दूर हो जाएगा। पहले से महंगी स्वास्थ्य शिक्षा को अपनाने के पहले कई बार सोचना पड़ेगा। दो साल की इस संभावित समयावधि को झेलने की दशा में हर परिवार सक्षम नहीं होगा। अभी तक एमबीबीएस की डिग्री साढ़े चार साल में पूरी होती है। इसके बाद एक साल मेडिकल कॉलेज में इंटर्नशिप को मिलाकर साढ़े पांच साल में एमबीबीएस की डिग्री मिल जाती थी।  एमसीआई साढ़े चार साल का कोर्स और एक साल की कॉलेज इंटर्नशिप के बाद ग्रामीण इलाकों में 2 साल की मेडिकल इंटर्नशिप भी अनिवार्य कर रहा है। इसके बाद ही विद्यार्थी एमडी की प्रवेश परीक्षा का पात्र होगा।
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बुधवार, 6 नवंबर 2013

सिद्धांतों पर आधुनिकता का भीषण बोझ

महात्मा गाँधी ने अपने जीवन के सत्याग्रह में जिन तीन बंदरों को जन्म दिया दरअसल वे तीन बंदर ही एक विस्तृत समाज व अहिंसा के सिद्धांत की सीढ़ियाँ कहे जा सकते हैं, लेकिन अफसोस कि महात्मा गाँधी के उन तीन बंदरों का अनुपालन करने का सामर्थ्य आज विश्व में किसी भी व्यक्ति के पास नहीं हैं। जिसके परिणाम स्वरूप विश्व में हिंसाशोषणअत्याचार व आपराधिक प्रवृत्तयों का कोप दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा हैं। यहां तक कि हमें जो सिद्धांत धरोहर के रूप में मिले वे आज आधुनिकता की बलि-बेदी पर बेड़ियों से जकड़े उन्हीं महापुरूषों की राह ताक रहे है, जिन्होंने उन्हें जन्म दियाउनका लालन-पालन कर उन्हें इस योग्य बनाया कि वे कुंठित समाज से एक सभ्य व नम्र समाज का खाका खींच सकें। पर इन सिद्धांतों पर हमने आधुनिकता का इतना भीषण बोझ रखा कि सभ्य समाज का सपना तो छोड़ो इन सिद्धांतों की परिकल्पना भी आज नहीं की जा सकती। शायद इसका एक कारण मानव का स्वार्थी होना भी रहा है। क्योंकि स्वार्थ ही वह बेड़ी है जो व्यक्ति को जकड़ कर उसे अपनों से दूर कर देती है फिर सिद्धांतों को यहाँ कहावतों के सिवाय और कुछ नहीं कहा जा सकता।
यही कारण है कि देश ही नहीं समूचे विश्व में नित नये अपराधों की उगाही से व्यथित हृदयों की पुकारें आज भी महात्मा गाँधी को रो-रो कर पुकारती हैं। इसका कारण अहिंसा के प्रति उनकी सत्यनिष्ठा ही कही जा सकती है। विश्व में शांतिसौहाद्रता व भाईचारा बने इसके लिये जरूरी है अहिंसा का वह नारा जिसे महात्मा गाँधी ने “अहिंसा परमो धर्मः” कह कर बुलन्द किया। जिसके लिये तीन सीढ़ियों को बनाया और उन्हें हिदायतें दी कि वे बुरा न देखें, ‘बुरा न सुनें और बुरा न कहें। लेकिन आज ये हिदायतें इस आधुनिकता के दौर में इतनी फीकी दिखाई देती है कि विश्व और देश तो छोड़ो इनका अनुपालन घर-परिवार में भी नहीं किया जाता। एक-दूसरे के प्रति बने आदरसम्मान व स्नेह को हमने इस कदर लताड़ दिया है कि वर्षो पुरानी सारी की सारी परम्पराएँधूमिल होती जा रही है। आधुनिकता का ढोंग और बढ़ती स्वार्थ प्रियता के कारण महात्मा गाँधी के उन तीन बन्दरों ने भी सख्त हिदायतों के बावजूद अपने आँखकान व मुँह पर बंधी पट्टियाँ खोल दी है। जिससे कि महात्मा गाँधी का सभ्य समाज के लिये देखा गया सपना भी चकना चूर हो गया हैं।
कुल मिलाकर हमने इन तीन बन्दरों को महज बन्दर ही मानालेकिन ये बन्दर बिना गोरे-काले का भेद किये प्रत्येक इंसान में समाये वे गुण हैं जिनसे एक शांतिमय वातावरण स्थापित किया जा सकता है। ऐसे में इन तीन बन्दरों का पतन सम्पूर्ण मानव जाति का पतन कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। मानव समुदाय से इन तीन गुणों के पतन के बाद समूचा विश्व न जाने किस ओर जायेगालेकिन महात्मा गाँधी के वे तीन बन्दर हमेशा याद किये जायेंगे

फोकट में बोरियत भगाने का बेहतर संसाधन मॉल

मेरे शहर में भी आजकल एक विशेष टाईप की गंध पसरी हुई है ये गंध शहर के नवनिर्मित शॉपिंग मॉलों से निकल रही है। आदमीऔरतबच्चेबूढ़े सभी कस्तुरी मृग से मगन इसे सुंघते हुए मॉल के अंदर घूम रहे हैं। पहले शहर में एक मॉल खुला फिर खुलते चले गए लोग भी पहले एक में घुसे फिर बाकियों में भी घुसते चले गए। शॉपिंग मॉल की कुछ विशेषताएँ होती है जो लोगों को बेहद आकर्षित करती हैं। इसमें घूमने-फिरने हेतु पर्याप्त स्थान होता है पार्किंग शुल्क नहीं होता है ये वातानुकूलित होते हैं तथा अति महत्वपूर्ण यह कि वस्तु खरीदना कतई जरूरी नहीं होता है। शहरवासियों को फोकट में बोरियत भगाने का इससे बेहतर संसाधन कहाँ मिल सकता है। मॉल अर्थात् आधुनिकता का नवीनतम लबादा पहना हुआ मेला। मॉल हर दृष्टिकोण से मॉल ही होता है यहाँ सब्जी खरीदने से लेकर फिल्म देखने तक का इंतजाम होता है। मॉल चाहे पाश्चात्य सभ्यता से प्रेरित हो उसमें जाने वाला तो अपना देशी आदमी ही है। मॉल में घुसते ही वो मॉल के कल्चर (?)में ढलने का प्रयास करने लगता है तथा इस प्रयास में शनैःशनैः अपनी सहजता को खाने लगता है। भीड़ के भय से वो अपना बटुआ तो नहीं गिरने देता पर उसकी सहज़ता मॉल के बाहर गिर जाती है और उसे पता भी नहीं चलता। अपने इस असामान्य व्यवहार में मॉल के भीतर हर व्यक्ति यह बताने का प्रयास करता है कि वो यहाँ अनेकों बार आता-जाता रहता है तथा इस कल्चर” को खूब जानता है। मॉल में खाने हेतु कुछ विशेष प्रकार से निर्मित रेस्टोरेंट होते हैं। अमूमन यहाँ खाने हेतु जो भी मिलता है वो सामान्य रूप से घरों में न तो बनाया जाता है और न ही खाया जाता है। पिज्जा खाना मॉल में जाने-घूमने की अघोषित शर्त के समान होती है। जिनके बाप-दादाओं ने ना कभी पिज्ज़ा देखा हो या खाया हो वे अत्यन्त असहजता के साथ सहज पिज्जा को ऐसे देखते हैं मानो प्लेट में भूचाल आ गया हो। जिन लोगों ने समोसेकचैरी और आलू बड़े के स्वाद की व्याख्या और इन पर बहस – मूबाहिसों में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया हो वे पिज्जा के गुणों-अवगुणों पर चर्चा करने में अपने को सबसे पिछली कतार में खड़ा पाते हैं। अनेक अवसरों पर तो रेस्टोरेंट में दिए जाने वाले मैन्यू में लिखे नाम लोगों की सामान्य समझ से ही बाहर होते हैं पर जब सवाल पैसे चुकाने से जुड़ा हो तो व्यक्ति अपने आत्म सम्मान को क्षणिक रूप से खूंटी पर टांग कर पूछ ही लेता है कि इस आईटम में आखिर मिलेगा क्या और कितने लोग खा सकेंगे मॉल में बने रेस्तरां आमतौर पर वे स्थान हैं जहाँ खाने वाला स्वयं को बिना बात के गर्वित महसूस करता है हालांकि यह अलग बात है कि अधिकांश लोग बाद में यह समीक्षा करते पाए जाते हैं कि अगली बार यदि मॉल में चले तो घर से खा-पीकर ही चलेंगे।


बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

बाघों और इंसानों के बीच का द्वंद्व

नागपुर और आस-पास के घने वन में पाए जानेवाले बाघों की संख्या को ध्यान में रखते हुए नागपुर को टाइगर कॅपिटल बनाने की तैयारी जोरों पर है। नागपुर वह स्थान है जहां से सैलानी अपनी पसंद के किसी भी 8 बाघ परियोजनाओं तक पहुंच सकते हैं। अवैध शिकार के अलावा छोटी-मोटी खेती कर जंगल किनारे गुजर-बसर करने वाले ग्रामीण भी बाघ के उस समय तात्कालिक दुश्मन बन जाते हैं, जब उनके मवेशी (गाय-भैंस-बकरी आदि) कोई भूखा बाघ उठाकर ले जाता है। वे लोग बाघ को खत्म करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं।  केंद्र सरकार ने ऐसे मामलों में किसानों को मवेशियों के नुकसान की नगद भरपाई की व्यवस्था कर रखी है, फिर भी भी बाघों और इंसानों के बीच का यह द्वंद्व खत्म नहीं हो पा रहा है।  सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि 1973 में इंदिरा गांधी द्वारा व्यक्तिगत रुचि लेकर प्रारंभ किए गए प्रोजेक्ट टाइगर (राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण), प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाला राष्ट्रीय वन्य प्राणी बोर्ड एवं केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय मिलकर भी संयुक्त रूप से बाघ संरक्षण के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं कर पा रहे हैं? प्रकृति विनाश बनाम मानव विकास, यह पुरानी लड़ाई जनसंख्या वृद्धि के चलते और अधिक विकराल रूप ले रही है। बाघ बेवजह उसमें पिसकर दम तोड़ रहा है। विश्व वन्यजीव सप्ताह के तहत  इस बार तेजी से गुम होते जा रहे बाघों की रक्षा के लिए कुछ संस्थाओं ने कदम आगे बढ़ाया है। इनकी सुरक्षा को लेकर कई गैर सरकारी संगठनों ने भी चिंता जाहिर की है। गोंड मोहाड़ी पलसगांव रेज में शिकार हुए बाघों के शिकार के तरीकों को लेकर इन निजी संस्थाओं ने सवाल उठाए हैं। इन संस्थाओं के मुताबिक बाघों के शिकार के मामले में राज्य सरकार ने सीबीआई को जांच का जिम्मा सौंपा है। सीबीआई को स्थानीय शिकारियों के अलावा शिकार के लिए कुख्यात बहेलिया समुदाय के लोगों की संलिप्तता की जांच का भी सुझाव दिया गया है। गोंड मोहाड़ी के बाघों को न्याय देने की मांग को लेकर उमरेड़ की डब्लूएलसीडीसी, शंकरपुर के तरुण पर्यावरणवादी मंडल, मूल के संजीवन पर्यावरण संस्था व नागभीड़ की जेप पर्यावरण संस्था ने गोंड मोहाड़ी शिकार मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग के समर्थन में सांसदों, विधायकों व नगर सेवकों से निवेदन करने की मुहिम छेड़ी है। मुहिम के तहत ये संस्थाएं सोशल नेटवर्किंग साइट का भी सहारा लेंगी। फेसबुक के माध्यम से युवाओं को जोडऩे की पहल की जाएगी। इन संस्थाओं ने सीबीआई का ध्यान इस ओर आकृष्ट करने की कोशिश की है कि गोंड मोहाड़ी शिकार के लिए उपयोग में लाए गए बड़े शिकंजे केवल अंतरराष्टर्रीय शिकार गिरोह बहेलियाओं द्वारा ही उपयोग में लाई जाती है। सीबीआई ने जिन स्थानीय आरोपियों की धरपकड़ की है, उनके पास केवल छोटे शिकंजे ही पाए जाते हैं।


75 लाख की मांगी थी रिश्वत

मूलत: नागपुर निवासी आयकर आयुक्त हर्षवर्धन नानोटे व शराब व्यवसायी राजेंद्र जैस्वाल ने कमाल किया है।  केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने खामगांव के एक नामी डाक्टर से 75 लाख की रिश्वत मांगनेवाले आयकर अधिकारी हर्षवर्धन नानोटी (42) को गिरफ्तार कर लिया।  आयकर विभाग ने 10 सितंबर को खामगांव के डाक्टर सदानंद इंगले (45) के घर छापा मारा था। छापे में बेनामी संपत्ति व ज्ञात स्त्रोतों से ज्यादा संपत्ति का पता चलने का आरोप था। खामगांव के आयकर अधिकारी हर्षवर्धन नानोटी (42) ने सेटलमेंट के लिए डाक्टर से 75 लाख रुपए की रिश्वत मांगी थी। अकोला के शराब व्ययसायी राजेंद्र जैस्वाल बिचौलिए की भूमिका में थे। जैस्वाल के माध्यम से रिश्वत मांगने का आरोप है। मामले के सेटलमेंट के नाम पर यह रिश्वत मांगी जा रही थी। 12 सितंबर से यह सिलसिला चल रहा था। डा. इंगले ने इसकी शिकायत सीबीआई अधीक्षक संदीप तामगाडगे से की। आरोपों की पुष्टि होते ही सीबीआई ने मंगलवार को आयकर आयुक्त हर्षवर्धन नानोटे व शराब व्यवसायी राजेंद्र जैस्वाल के खिलाफ रिश्वत मांगने का मामला दर्ज किया। सीबीआई अधिकारियों ने आरोपी हर्षवर्धन व राजेंद्र के पांच ठिकानों पर छापामार कार्रवाई की। यह छापेमारी अकोला, खामगांव, मूर्तिजापुर रोड व नागपुर में एक साथ हुई। सीबीआई को आरोपी हर्षवर्धन के खामगांव व नागपुर निवास से संपत्ति के दस्तावेज मिले हैं। लॉकरों का भी पता चला है। दूसरे आरोपी राजेंद्र के निवास से 20 लाख रुपए, 20 किलो चांदी, 8 किलो सोना व संपत्ति के दस्तावेज मिले हैं। 

बदलाव का खास मतलब

एक प्रधानमंत्री के लिए इससे अजीबोगरीब स्थिति और क्या हो सकती है कि विपक्ष तो विपक्ष, अपनी पार्टी भी उसके निर्णय पर सवाल खड़े कर रही हो। शायद इस स्थिति को भांपकर ही यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि पूरी पार्टी मनमोहन सिंह के साथ खड़ी है। तिरुवनंतपुरम में दिए गए अपने एक भाषण में उन्होंने डॉ. सिंह के कामकाज की तारीफ करते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में जारी हुई स्कीमों से देश के लाखों जरूरतमंद लोगों को फायदा पहुंचा है। असल में कांग्रेस आगामी लोकसभा चुनाव में अपना एक नया चेहरा लेकर जाना चाहती है। लेकिन उसकी दुविधा यह है कि परिवर्तन की प्रक्रिया क्या हो? इतना तय है कि मनमोहन सिंह के बाद राहुल गांधी को नेतृत्व संभालना है, मगर पार्टी यह भी नहीं चाहती कि राहुल चुपचाप अपना काम संभाल लें। पार्टी राहुल को कुछ इस तरह प्रोजेक्ट करना चाहती है कि इस बदलाव का एक खास मतलब हो। वह सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, एक नई नीति और प्रोग्राम का आगमन लगे। इस तरह लोगों को नएपन का अहसास हो और पार्टी मनमोहन सरकार की तमाम कमियों और विफलताओं से पल्ला झाड़कर चुनाव में उतर सके। शायद इसी सोच के तहत राहुल गांधी ने सरकार के अध्यादेश को खारिज किया। यह दांव इस लिहाज से तो कारगर रहा कि दागियों को खुलेआम बचाने के कलंक से कांग्रेस खुद को बचा ले गई। पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख इस कदर कभी दांव पर नहीं लगी थी। इस दूसरे कार्यकाल के दौरान उनके कामकाज पर लगातार उंगलियां उठीं। उन्हें कमजोर और रिमोट कंट्रोल से चलने वाला पीएम बताया गया। लेकिन ये सारी बातें विपक्ष ने कही थीं।  सवाल अपनी जगह बचा ही हुआ है कि क्या अध्यादेश को लेकर पार्टी और सरकार में कोई संवाद ही नहीं था? और अगर अध्यादेश कांग्रेस पार्टी की समझ के तहत ही लाया गया है तो राहुल को इस बारे में जानकारी कैसे नहीं थी? राहुल की सार्वजनिक प्रतिक्रिया का तर्क चाहे जो भी क्यों न हो, व्यक्तिगत छवि या चुनावी लाभ के लिए प्रधानमंत्री की साख को दांव पर लगाना समझदारी नहीं कही जाएगी।
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शनिवार, 17 अगस्त 2013

गोरा बनाने का काला धंधा

एक कालेज छात्र को गोरा बनने के चक्कर में तीन हजार रु. से चूना लग गया। क्रीम का स्कीन पर कोई असर नहीं होता देख छात्र ने संबंधित प्रोडक्ट कंपनी को लौटा दिए। हालांकि वादे के मुताबिक कंपनी ने अभी तक छात्र को रकम नहीं लौटाई।
हुआ यूं कि सेंट्रल एवेन्यू गीतांजलि निवासी इमरान हाशमी (काल्पनिक नाम) ने खबरिया चैनल पर एक इश्तेहार देखा, जिसमें तीन हजार रु का क्रीम पैकेज लेने पर काला व्यक्ति भी गोरा बनने के वादे किए गए।  इमरान ने दिसंबर के आखिरी सप्ताह इंदौर की इस कंपनी को क्रीम के लिए आर्डर दिया। कंपनी का डिलीवरी आफिस हिंगणा रोड पर है। कंपनी ने सारा पैकेज कुरियर से इमरान को भेजा। इन चीजों के बदले में इमरान ने तीन हजार रु. का भुगतान किया। इमरान शांतिनगर के एक कालेज में अंतिम वर्ष का छात्र है।  15 दिन बाद भी जब क्रीम ने असर नहीं किया तो इमरान ने कंपनी से संपर्क किया। कंपनी ने और कुछ दिन क्रीम रगडऩे की सलाह दी। फिर भी चेहरा गोरा नहीं हुआ। कंपनी को कुरियर से क्रीम व पाउडर वापस भेज दिए गए। अब इमरान पिछले दस दिनों से कंपनी से पैसे वापस करने की गुजारिश कर रहा है। कंपनी द्वारा दिए गए नंबरों पर वह लगातार संपर्क कर रहा है, लेकिन उसे कोई प्रतिसाद नहीं मिल रहा।
 कम्पीटिशन के इस दौर में गोरी, खूबसूरत और जवां दिखने की चाहत ने कई किस्म के उत्पादों का बढ़ावा दिया है। बिना ये जाने कि ऐसे उत्पादों में  पारे के अलावा स्टेरॉयड, हाइड्रोक्युनॉन और दूसरे खतरनाक रसायन भी मौजूद होते हैं, धड़ल्ले से इसका इस्तेमाल जारी है।  किडनी स्पेशलिस्ट के मुताबिक, गोरेपन की क्रीम में पारा मेन ऑब्जेक्ट के रूप में मौजूद होता है और जब लोग इसे स्किन पर लगाते हैं, तो इसका कुछ हिस्सा शरीर से होते हुए ब्लड में मिल जाता है। चूंकि, पारा और दूसरी जहरीली चीजों को शरीर से निकालने का काम किडनी करती है, लिहाजा  पारे को निकालते-निकालते किडनी कमजोर हो जाती है। स्किन स्पेशलिस्ट के मुताबिक  इनसे कई परेशानियां हो सकती हैं। मसलन, स्किन पर पपड़ी पडऩा, उसमें जलन होना आधि। खुजली और मुंहासे आम बात हैं। ऐसी उत्पाद दवाओं की श्रेणी में आते हैं, लिहाजा, बाजार में उतारने से पहले इन पर शोध होना चाहिए।  डॉक्टरों के मुताबिक इन प्रोडक्ट्स पर ध्यान देने की बजाय लोगों को अपने खान-पान पर ध्यान देना चाहिए। डॉक्टरों के मुताबिक स्किन की रिंकल्स को फेस लिफ्ट के जरिए छिपाया या मिटाया जा सकता है, लेकिन, जब चेहरे पर झुर्रियों की बहुत बारीक लाइनें हों या मुंहासे के दाग हों, तो उसे केमिकल फेस पीलिंग या लेजर से मिटाया जा सकता है। लेजर और फेस पीलिंग साथ-साथ या अलग-अलग की जा सकती है। अधिकतर साबुन में लगभग एक से तीन फीसदी मर्करी आयोडाइड होता है, जबकि क्रीम में एक से 10 फीसदी तक मर्करी अमोनियम होता है। इसलिए साबुन, क्रीम या दूसरे कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से पहले इनके पैकेट पर मर्करी की मात्रा की जांच करनी चाहिए।
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घर से शुरू हो आजादी

बस एक दिन शेष है। हमें स्वतंत्र हुए 66 साल हो जाएंगे। अनेक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। भ्रष्टाचार, अराजकता, बेरोजगारी, भूखमरी आदि-आदि को लेकर नारे गुंजायमान होंगे। पर खेद की बात है कि इतने वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी हम अपने सपने को साकार नहीं कर पाए हैं। वंदे मातरम् स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के सही मायने शब्दों तक सीमित हैं। व्यथा शब्दों के पार है। मुक्कमल आजादी अभी नहीं मिली है। देहरी के भीतर आधी आबादी सिसक रही है तो बाहर निकलने के बावजूद युवा-धार कुंद है। असमंजस की दीवार को पार कर पाने की सामथ्र्य विरलों में है। युवा दिग्भ्रमित हैं। पश्चिमी चकाचौंध अपनी ही अस्मिता को पहचानने से इनकार कर रही है। शार्टकट पर भरोसा जायज नहीं। वह भी तब जब, देश आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरोधाभासों के बीच सांसे ले रहा हो। हमारा कर्तव्य है कि देश के उत्थान के लिए ईमानदारी का परिचय दें। नागरिक कर्मठता का पाठ सीखें और चरित्र-बल को ऊंचा बनाएं। फिरंगी मानसिकता से हम मुक्त नहीं हो सके हैं। स्वतंत्रता और समानता दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। आखिर यह कैसी आजादी है? क्या आम आदमी को भय और भूख से मुक्ति मिली है? क्या आम आदमी को उसके जीवन की गारंटी दी जा सकी है? क्या नारी की अस्मिता सुरक्षित है? क्या व्यक्ति अपनी बात निर्भीकता से रखने के लिए स्वतंत्र है?  विडंबना यह है कि हम आजादी के पर्व पर इन तथ्यों पर जरा भी चिंतन नहीं करते। यह ऐतिहासिक दिवस भारतीय आत्मा का सबसे बड़ा पर्व है। यह महान पर्व हमारे राष्ट्रीय जीवन के पुनर्जन्म की सूचना देता है। गुलामी सारी तकलीफों का सबब है। गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।  स्वाधीनता बचानी है तो घर की देहरी से शुरुआत होनी चाहिए। इस बदले बयार की हलचल हर ओर हो। आइए, सत्य और ईमानदार संकल्प लें। हम राष्ट्र के ऋणी हैं और राष्ट्र आर्तनाद कर रहा है ठोस पहल के लिए।