सुनीता विलियम्स ने कहा-धरती पर छोटी-छोटी बातों से हम चिढ़ जाते हैं, यह बेवकूफी है
हम पृथ्वी पर जीवन को कुछ ज़्यादा ही गंभीरता से लेते हैं। हम कुछ छोटी-छोटी, बेवकूफ़ाना चीज़ों से भी चिढ़ जाते हैं, जबकि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। यह मात्र चंद शब्द नहीं, धरती पर जिंदगी का वह फलसफा है, जिस सत्य का अनुभव सुदूर अंतरिक्ष से अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स ने महसूस किया। वह कहती हैं कि सर्वशक्तिमान ईश्वर या अलग शक्ति ने उनसे बहुत कुछ सार्थक कर्म करवा लिए।
संदेह की घटा छाती रही
सुनीता विलियम्स के इन शब्दों उनकी साहस परिलक्षित होती है। अपनी प्रचंड इच्छाशक्ति के आधार पर ही मात्र 7 दिनों के लिए अंतरिक्ष प्रवास पर गई यह एस्ट्रोनाट महिला 286 दिनों तक वहां रही और पृथ्वी की 4576 परिक्रमा कर डाली। कल्पनातीत है कि सुनीता विलियम्स और उनके साथी अंतरिक्ष यात्री बुच विल्मोर ने 1,21,347,491 मील का सफर तय किया। इन 9 महीनों के दौरान अनिश्चितता व संदेह की घटा छाती रही कि क्या सुनीता सकुशल पृथ्वी पर लौट पाएगी! रह-रहकर कल्पना चावला के साथ हुआ भयानक हादसा दिमाग के किसी कोने में कौंधता था।
चट्टानी मनोबल और जिजीविषा
सुनीता विलियम्स की अंतरिक्ष से वापसी की यह यात्रा तकनीकी दृष्टिकोण से जितनी महत्वपूर्ण थी, उतनी ही मानवीय दृष्टि से भी प्रेरणादायक रही। अंतरिक्ष अभियान निश्चित रूप में कठिन चुनौतियों और जोखिम के बीच तय किए जाते हैं. इनमें चट्टानी मनोबल और जिजीविषा का तत्व अंतरिक्ष यात्रियों को हर विपरीत स्थिति में ऐसी दृढ़ता देता है, जिसका कोई सानी नहीं है। भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अदभुत रिकॉर्ड बनाए हैं। उनकी वापसी की यह यात्रा न केवल एक मानवीय उपलब्धि थी, बल्कि अंतरिक्ष तकनीक और सहनशक्ति की एक जटिल, प्रेरक कहानी भी है।
मानव संकल्प की जीत
सुनीता विलियम्स की धरती पर सुखद वापसी एक तकनीकी चमत्कार और मानव संकल्प की जीत सिद्ध हुई। यह यात्रा नासा, स्पेसएक्स, और अंतरिक्ष यात्रियों की टीमवर्क का परिणाम थी। भविष्य में, यह अनुभव अंतरिक्ष मिशनों को और सुरक्षित और कुशल बनाने में मदद करेगा। सुनीता की यह कहानी न केवल विज्ञान की प्रगति को दर्शाती है, बल्कि मानव की जिज्ञासा और साहस को भी प्रेरित करती है।
अनूठे 150 वैज्ञानिक व तकनीकी प्रयोग
सुनीता विलियम्स पहली महिला एस्ट्रोनाट हैं जिन्होंने अंतरिक्ष स्टेशन के बाहर 62 घंटे से अधिक का स्पेसवाक किया। उन्होंने अपने साथी विल्मोर के साथ अनूठे 150 वैज्ञानिक व तकनीकी प्रयोग किए व 900 घंटे उद्देश्यपूर्ण अनुसंधान में बिताए। इनमें पौधों का अंतरिक्ष में विकास, स्टेम सेल तकनीक का समावेश था। आटोइम्यून बीमारियों, कैंसर, रक्त से जुड़े रोगों पर उनका अनुसंधान मील का पत्थर साबित होगा। माइक्रोग्रेविटी, फ्यूल सेल रिएक्टर पर भी प्रयोग किए।
…और धरती पर लौट आई अंतरिक्ष परी
क्रू-9 मिशन, जो सितंबर 2024 में शुरू हुआ, में केवल दो अंतरिक्ष यात्री- नासा के निक हेग और रूस के रोस्कोस्मोस के अलेक्जेंडर गोर्बुनोव- शामिल थे, ताकि सुनीता और बुच के लिए वापसी की जगह बनाई जा सके। हालांकि, उनकी वापसी को फरवरी 2025 में निर्धारित किया गया था, लेकिन क्रू-10 मिशन की तैयारी में देरी के कारण यह मार्च 2025 तक टल गया। क्रू-10 मिशन 12 मार्च 2025 को फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से फाल्कन 9 रॉकेट के जरिए लॉन्च हुआ। इसमें चार अंतरिक्ष यात्री- नासा की ऐनी मैकक्लेन और निकोल आयर्स, जापान के तकुया ओनिशी, और रूस के किरिल पेस्कोव- शामिल थे। यह टीम आईएसएस पर क्रू-9 की जगह लेने के लिए पहुंची। क्रू ड्रैगन “एंड्योरेंस” ने 16 मार्च को आईएसएस के हार्मनी मॉड्यूल से सफलतापूर्वक जुड़ाव किया। इसके बाद, दो दिनों के हैंडओवर पीरियड के दौरान, सुनीता और बुच ने अपनी जिम्मेदारियों को नए क्रू को सौंपा। सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर की वापसी क्रू ड्रैगन “फ्रीडम” अंतरिक्ष यान के जरिए हुई, जो क्रू-9 मिशन का हिस्सा था। यह अंतरिक्ष यान 18 मार्च 2025 को आईएसएस से अलग हुआ और 19 मार्च को फ्लोरिडा के तट पर अटलांटिक महासागर में पैराशूट की सहायता से सुरक्षित रूप से उतरा।
आग के गोले की तरह उतर रहा था
नौ महीने के लंबे इंतजार के बाद धरती पर लौटने की खुशी से पहले कई घंटे ऐसे भी थे, जब सभी एस्ट्रोनॉट के साथ पूरी दुनिया ने अपने फिंगर्स क्रॉस कर रखे थे। धरती पर लौटने की यात्रा में स्पेसएक्स के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट का सबसे मुश्किल चरण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश के दौरान था। इस दौरान स्पेसक्राफ्ट की रफ्तार 28,800 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की थी, जिसके घर्षण के कारण स्पेसक्राफ्ट के बाहरी हिस्से का तापमान करीब 1,600 डिग्री सेल्सियस था। इतने ज्यादा तापमान होने के कारण स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी के वायुमंडल में एक आग के गोले की तरह उतर रहा था।
कल्पना चावला की घटना सिहरन पैदा करती रही
पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश के दौरान अंतरिक्ष यान ने लगभग 3,000 डिग्री फारेनहाइट (1,650 डिग्री सेल्सियस) के तापमान का सामना किया। इसका हीट शील्ड, जो सिरेमिक सामग्री से बना था, इस भीषण गर्मी से चालक दल की रक्षा करने में सक्षम था। आपको याद होगा कि कल्पना चावला को लेकर लौट रहा यान इसी प्रक्रिया में जलकर राख हो गया था।
ठान लें तो कुछ भी असंभव नहीं
उनकी कहानी हमें सिखाती है कि चुनौतियाँ चाहे जितनी भी बड़ी हों, यदि हमारे पास दृढ़ संकल्प और समर्पण है, तो हम उन्हें पार कर सकते हैं। उनका यह मिशन भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए कई महत्वपूर्ण संकेत देता है। सुनीता विलियम्स की यह उपलब्धि भारत और विश्वभर में युवाओं को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (स्टेम) के क्षेत्रों में करियर बनाने के लिए प्रेरित करती रहेगी। उनके संघर्ष और सफलता की कहानी यह संदेश देती है कि सीमाएँ केवल हमारे मन में होती हैं, और यदि हम ठान लें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। सुनीता विलियम्स की सुरक्षित वापसी पर हम गर्व और खुशी का अनुभव करते हैं। उनकी यह यात्रा न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह मानव आत्मा की अदम्य इच्छाशक्ति और अन्वेषण की भावना का उत्सव भी है। हम उनके साहस, समर्पण और योगदान के लिए उन्हें नमन करते हैं और आशा करते हैं कि उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेगी। पूरे 9 महीने 14 दिनों के अंतरिक्ष प्रवास के बाद उनका पृथ्वी पर उतरना पुनर्जन्म से कम नहीं!